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जयंती विशेषः अटल बिहारी वाजपेयी का प्यार, जीवन और कविता

जननायक अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती ठीक क्रिसमस के दिन आती है, यानी 25 दिसंबर को. किंशुक नाग की यह किताब अटल जी के जीवन के कई पहलुओं को उजागर करती है. उसी पुस्तक से उनके प्यार, जीवन और कविता का यह अंश

जननायक अटलजी पुस्तक का कवर [ साभारः प्रभात प्रकाशन ] जननायक अटलजी पुस्तक का कवर [ साभारः प्रभात प्रकाशन ]

जननायक अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती ठीक क्रिसमस के दिन आती है, यानी 25 दिसंबर को. सहृदय-दूरदर्शी राजनेता, संवेदनशील कवि. मित्रों और विरोधियों द्वारा समान रूप से चाहे जानेवाले अटल बिहारी वाजपेयी सच में एक जननायक हैं. राजनीतिक सफर का प्रारंभ भारतीय जनसंघ के सबसे पहले सदस्यों में से एक के रूप में किया. फिर 1960 के दशक के आखिर में वाजपेयी एक प्रमुख विपक्षी दल के सांसद के रूप में निखरकर सामने आए. थोड़े समय के लिए सत्ता में आई जनता सरकार में विदेश मंत्री बने और 1999 में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व किया, जिसने अपना कार्यकाल पूरा किया. यह उपलब्धि और विशिष्ट बन जाती है, क्योंकि एक गठबंधन सरकार ने ऐसा कर दिखाया था. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय जैसे जनसंघ के दिग्गजों के शिष्य रहे वाजपेयी जवाहरलाल नेहरू की प्रशंसा के पात्र बने; जिनसे उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने सलाह-मशवरा किया; जिनकी आलोचना करने में वह कभी पीछे नहीं रहे; और उग्र मजदूर संघ के नेता जॉर्ज फर्नांडिस से दोस्ती की, जो आगे चलकर उनके सहयोगी भी बने. इस प्रकार उन्होंने सभी प्रकार के राजनीतिक विचारों को साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता प्रदर्शित की. उन्हीं के नेतृत्व में राजग सरकार ने छह साल में भारत के नवनिर्माण की नींव रखने का काम किया. वरिष्ठ पत्रकार किंगशुक नाग ने 'जननायक अटलजी' पुस्तक में भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस जाज्वल्यमान नक्षत्र के संपूर्ण व्यक्तित्व एवं कृतित्व को रेखांकित किया है. अटल जी की जयंती पर प्रभात प्रकाशन से छपी उसी पुस्तक का यह अंश.

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प्यार, जीवन और कविता

हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू,
हाथ से छूके इसे रिश्तों का इल्जाम न दो.
सिर्फ एहसास है, ये रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो...गुलजार की कलम से निकली फिल्म ‘खामोशी’ की इन अविस्मरणीय पंक्तियों से अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन से जुड़े अत्यंत महत्त्वपूर्ण पहलू की व्याख्या उपयुक्त रूप से की जा सकती है. भले ही उनके सहयोगियों के लिए यह अनजान न रहा हो, फिर भी अटल की जीवन-यात्रा के इस अहम पक्ष को सार्वजनिक चर्चा से दूर रखा गया है.
मई 2014 में जब राजकुमारी कौल की मृत्यु हुई, तब कई अखबारों में यह खबर छपी थी. जो रूढ़िवादी थे, उन्होंने कहा कि वे अटल के घर की एक सदस्य थीं, लेकिन टेलीग्राफ में लिखते हुए केपी नैयर ने कहा, ‘श्रीमती कौल को कई वर्षों तक उन्हें जाननेवाले एक शर्मीली, स्पष्ट रूप से निःस्स्वार्थ एक ऐसी अर्धांगिनी के रूप में याद रखेंगे, जिनका सौभाग्य कभी अटल को नहीं हुआ, जबकि वह हमेशा उनके साथ रहीं. तब तक जब तक कि वह बीमार नहीं पड़ गईं और दिल के दौरे से उनकी मृत्यु नहीं हो गई.’

रिडिफ डॉट कॉम के लिए लिखते हुए पत्रकार गिरीश निकम ने वाजपेयी और श्रीमती कौल को लेकर अपने अनुभव साझा किए, जो रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी निभाने के दौरान (उन दिनों की बात कर रहे थे, जब अटल प्रधानमंत्री नहीं बने थे) अटल के संपर्क में थे. उन्होंने स्मरण किया कि कैसे जब भी वह अटल के घर फोन करते, तब दूसरी तरफ से श्रीमती कौल फोन उठाया करती थीं.
श्रीमती कौल फोन उठाते ही स्वतः कहा करती थीं, ‘मिसेज कौल हीयर.’
एक बार निकम ने, जो श्रीमती कौल की आवाज को पहचान चुके थे, उन्होंने मिसेज कौल के उन शब्दों को जैसे ही सुना तो कह दिया, ‘यस आई नो.’
श्रीमती कौल ने विनम्रता से पलटकर कहा, ‘आप नहीं जानते, मैं कौन हूँ?’
मजबूरी में निकम को कहना पड़ा, ‘नो मैडम.’
श्रीमती कौल ने तब उत्तर दिया, ‘मैं मिसेज कौल हूँ, राजकुमारी कौल. वाजपेयीजी और मैं लंबे समय से, करीब चालीस साल से दोस्त हैं. क्या आप यह नहीं जानते?’
निकम किसी तरह इतना ही कह सके थे, ‘ओह, मुझे माफ कीजिए, मैं नहीं जानता था.’
मिसेज कौल तब हँसने लगी थीं और बताया था कि कैसे इतने वर्षों से वाजपेयी उनके तथा उनके पति प्रोफेसर कौल के साथ रह रहे थे.
बस एक बार शर्मीली सी श्रीमती कौल ने प्रेस को इंटरव्यू दिया और यह 1980 के दशक के मध्य की बात है. वह इंटरव्यू भी एक महिलाओं की पत्रिका को दिया गया था. जब इंटरव्यू लेनेवाले ने उनसे उनके और अटल के बारे में पूछा, तब श्रीमती कौल ने कहा कि एक बार जब गंदी अफवाहें (एक ही घर में साथ रहने को लेकर) फैलनी शुरू हो गईं, तब उन्हें और अटलजी को कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई कि वे श्री कौल को अपनी सफाई दें. उन्होंने कहा कि अपने पति के साथ उनका संबंध इन बातों के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत है.
सुनीता बुद्धिराजा, जो जनसंपर्क से जुड़ी अधिकारी, कवि और लेखिका थीं और अटल के साथ ही श्रीमती कौल को भी अच्छा तरह जानती थीं, उन्होंने बताया कि इंटरव्यू पढ़ने के बाद उन्होंने श्रीमती कौल को फोन लगाया था, लेकिन फोन अटल ने उठाया और तब सुनीता ने कहा कि वे उन्हें और श्रीमती कौल को उस बेबाक इंटरव्यू के लिए बधाई देना चाहती हूँ.
अटल ने कहा, ‘आप खुद ही यह बात उन्हें बताएँ,’ और फोन पास खड़ी श्रीमती कौल को दे दिया.
सुनीता, जो कभी श्रीमती कौल के करीब थीं, लेकिन बाद में उनसे अलग हो गईं, उन्होंने बताया कि एक दिन किसी सोच में डूबी श्रीमती कौल ने उन्हें अटल से अपने रिश्ते के बारे में बताया था. दोनों ही एक ही समय में ग्वालियर में एक ही कॉलेज में पढ़ते थे. यह 1940 के मध्य की बात है और वह जमाना रूढ़िवादी था, जब लड़कों और लड़कियों की दोस्ती को सवालिया नजरों से देखा जाता था. इस कारण ज्यादातर लोग, जो प्रेम करते थे, अपनी भावनाएँ व्यक्त नहीं करते थे. बताया जाता है कि युवा अटल ने लाइब्रेरी में एक किताब में राजकुमारी के लिए एक चिट्ठी रख दी थी, लेकिन उन्हें उस चिट्ठी का कभी जवाब नहीं मिला. वास्तव में राजकुमारी ने भी जवाब लिखा था, लेकिन वह जवाब कभी अटल तक पहुँच नहीं सका. समय के साथ राजकुमारी (जिनके पिता एक सरकारी अधिकारी थे) की शादी एक युवा कॉलेज शिक्षक बृज नारायण कौल से कर दी गई.
‘असल में वह अटल से शादी करना चाहती थी, लेकिन उसके घर में इसका भारी विरोध हुआ. भले ही अटल भी ब्राह्मण थे, लेकिन कौल अपने आपको उच्च वंश का मानते थे,’ यह कहना है संजीव कौल का, जो दिल्ली के एक कारोबारी हैं और जिनका श्रीमती कौल से पारिवारिक रिश्ता है.
उनका कहना है कि श्रीमती कौल की परवरिश पहले पुरानी दिल्ली के चितली कब्र इलाके में अपने चचेरे भाई-बहनों के साथ हुई और फिर वे ग्वालियर चली गईं. वहाँ उन्हें उनके घर में बुलाए जानेवाले नाम ‘बीबी’ से पहचाना जाता था. श्रीमती कौल के पिता गोविंद नारायण हक्सर सिंधिया घराने के शिक्षा विभाग के कर्मचारी थे. श्रीमती कौल की भतीजी कामिनी कौल को, जो उम्र में उनसे थोड़ी ही बड़ी थीं, उन्हें अपनी बहन बीबी की सगाई याद है.
कामिनी कहती हैं, ‘यह 1947 की बात है, जब देश का बँटवारा हुआ था और पुरानी दिल्ली में जहाँ हम रहते थे, वहाँ भी दंगे हुए थे, लेकिन बीबी बहन की माँ उन्हें आनन-फानन में दिल्ली लेकर आई थीं तथा कॉलेज के एक युवा लैक्चरर से उनकी सगाई कर दी. शादी बाद में ग्वालियर में हुई थी.
वह कहती हैं कि बृज मोहन कौल बहुत विनम्र व्यक्ति बहुत सीधे भी थे.’
अटल ने इस बात को भुला दिया, लेकिन कभी शादी नहीं की और पूरा समय राजनीति में देने लगे. दोनों की मुलाकात एक बार तब हुई, जब अटल सांसद बने और राजकुमारी दिल्ली आ गई थीं, जहाँ उनके पति दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में दर्शनशास्त्र पढ़ा रहे थे.
भारत सरकार से सचिव के रूप में रिटायर हुए एस.के. दास को अच्छी तरह याद है कि अटल रामजस कॉलेज स्थित श्रीमती कौल के घर में रहा करते थे.
उन्होंने कहा, ‘प्रोफेसर कौल रामजस कॉलेज होस्टल के वार्डन थे, जहाँ मैं 1965 से 1967 के बीच एक छात्र था और होस्टल में ही रहता था.’
उन्होंने कहा, ‘प्रोफेसर कौल बेहद सख्त थे और शाम को होस्टल में आ धमकते थे. हम युवा छात्र थे और अपनी नई-नई आजादी का मजा उठाना चाहते थे, कभी-कभार शराब के एक या दो पैग लगाकर. ऐसे में उनकी मौजूदगी अखर जाती थी.’
दास कहते हैं कि समान सोच रखनेवाले होस्टल के कुछ साथियों से चर्चा के बाद उन्होंने श्रीमती कौल से ‘शिकायत’ करने का मन बनाया, जो काफी उदार दिखती थीं. उन्होंने जब उनकी ‘शिकायतें’ सुनीं, तो मुसकराने लगीं और कहा, ‘जब मेरे पति तुम्हारे होस्टल जाते हैं, तब तुम लोग मेरे घर क्यों नहीं आ जाते?’
युवा छात्रों ने इस सुझाव को गंभीरता से ले लिया और अकसर शाम को उनके घर पहुँचने लगे. वहाँ उन्होंने पाया कि अटल बिहारी वाजपेयी अकसर आते-जाते रहते हैं.
अटल इन युवाओं का स्वागत किया करते थे और उनके साथ चर्चा किया करते थे. वहीं श्रीमती कौल उन्हें कभी मिठाई खिलातीं तो कभी उनके लिए ठंडाई बनाया करती थीं. दास के अलावा, अन्य लड़कों में शामिल थे—अशोक सैकिया, वह भी एक IAS अफसर बने तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव रहे, जब अटल प्रधानमंत्री थे; बी.पी. मिश्रा, वह भी IAS अफसर बने और नई दिल्ली म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन (एन.डी.एम.सी.) के चेयरमैन बने; एम.एल. त्रिपाठी, जो भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुए और मॉरीशस तथा बँगलादेश में भारत के उच्चायुक्त रहे.
दास कहते हैं, ‘उन दिनों कोई अंदाजा नहीं था कि अटल और राजकुमारी के बीच कोई मित्रता थी और बरसों बाद जब हमने कहानियाँ सुनीं, तब दोनों के बीच आने और कबाब में हड्डी जैसा बनने का बड़ा मलाल हुआ.’
उन्होंने यह भी कहा कि अटल को कभी उनकी मौजूदगी खलती नहीं थी, बल्कि वे उन्हें बातचीत के लिए उत्साहित करते थे तथा उनके भविष्य के विकल्पों को लेकर सुझाव भी देते थे.
दास उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ‘वास्तव में वे कहते थे कि शिक्षा का क्षेत्र अच्छा है और हमें उसमें भी कॉरियर बनाने की बात सोचनी चाहिए. उन्होंने नौकरी दिलाने में मदद की बात भी कही थी. जनसंघ की उन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय पर मजबूत पकड़ थी.’
दास और उनके दोस्तों के साथ अटल की बातचीत तब हुआ करती थी, जब वे जनसंघ के नेता और राज्यसभा सांसद थे. उनकी भाषण-कला का भी सबने लोहा मान लिया था.
दास कहते हैं कि कॉलेज के बाद और फिर IAS अधिकारी बनने पर कर्नाटक कैडर मिल जाने से अटल से उनका संपर्क टूट गया; हालाँकि 1978 में, जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री देवराज उर्स के सचिव थे, तब बिना पहले से समय लिये कोई अचानक उनसे मिलने उनके बैंगलोर स्थिति ऑफिस पहुँचा. यह उनके पुराने वार्डन बृज नारायण कौल थे.
प्रोफेसर कौल ने कहा, ‘अटलजी तुम्हें याद कर रहे हैं और श्रीमती कौल भी. तुम्हें उनसे दिल्ली जाकर जरूर मिलना चाहिए.’
उस वक्त अटल मोरारजी देसाई की जनता सरकार में विदेश मंत्री थे.
इंदिरा गांधी के करीबी मुख्यमंत्री के साथ तैनात होने के कारण दास थोड़ी हिचकिचाहट के साथ दिल्ली गए. वे जब लुटियन में अटल के आवास पर उनसे मिलने पहुँचे, तो दास ने देखा कि मिस्टर और मिसेज कौल अपनी दो बेटियों के साथ वहाँ रह रहे थे. दास जब कॉलेज की पढ़ाई खत्म कर निकल गए थे, उसके कुछ समय बाद ही अटल कौल परिवार के साथ रहने लगे थे, जबकि वे रामजस कॉलेज के वार्डन के क्वार्टर में रह रहे थे.
कामिनी कौल कहती हैं, ‘हाँ, हमें याद है कि अटलजी वहाँ रहते थे और जब हम जाते थे, तब उनसे हमारी मुलाकात होती थी. वास्तव में श्रीमती कौल की माँ भी बुढ़ापे में उनके साथ ही रहने लगी थीं.’
1968 में, जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष, दीनदयाल उपाध्याय की अचानक मृत्यु के बाद अध्यक्ष पद के लिए अटल के नाम पर विचार किया जा रहा था. हालाँकि पार्टी में अटल के सामने एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी थे- बलराज मधोक. मधोक का दावा था कि वे पार्टी की कमान सँभालने के लिए बेहतर नेता हैं, विशेष रूप से तब, जब उनके नेतृत्व में 1967 में लोकसभा के लिए कराए गए आम चुनावों में पार्टी ने पैंतीस सीटों पर जीत दर्ज की थी. यही नहीं, वे पार्टी के सबसे वरिष्ठ उपाध्यक्ष भी थे. मधोक ने संघ के सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर को अपने पक्ष में लाने का प्रयास शुरू कर दिया, जिनका पार्टी पर जबरदस्त प्रभाव था. अन्य बातों के साथ ही मधोक ने अटल की अनैतिक जीवनशैली की चर्चा की और दावा किया कि महिलाएँ उनसे मिलने आती हैं. इस बात की भी चर्चा की कि श्रीमती कौल कभी-कभी अटल के घर आती हैं. अटल के घर में जनसंघ के कुछ और नेता भी रहते थे. हालाँकि इन शिकायतों का कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि गोलवलकर ने उन्हें खारिज कर दिया.
अटल की गैर-परंपरागत जीवनशैली और कौल परिवार के साथ उनके रहने को लेकर दिल्ली के राजनीतिक हलकों में चर्चा होती थी. हालाँकि प्रेस ने कभी इसे बड़ा मुद्दा नहीं बनाया और अटल का निजी जीवन कभी पड़ताल के दायरे में नहीं आया.
श्रीमती कौल की मृत्यु के दिन ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने लिखा, ‘दोनों ने ही (अटल और श्रीमती कौल) कभी अपने रिश्ते को कोई नाम नहीं दिया और कानाफूसी से फैलती अफवाहों के बावजूद उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर भी नहीं किया गया.’
वास्तव में प्रेस के कुछ हिस्सों में श्रीमती कौल की मौत पर छपी खबर में उन्हें अटल के घर का एक सदस्य बताया गया. इस खबर के पीछे अटल के घर से जारी किया गया एक प्रेस रिलीज था, जिसमें उन्हें यही बताया गया था. चूँकि अटल स्वयं अल्जाइमर से पीड़ित हैं, इस कारण इस रिलीज में उनकी कोई भूमिका नहीं हो सकती है.
‘यह उनके विषय में एक गलत जानकारी थी, जिसे श्रीमती कौल जीवित रहतीं तो सबसे पहले वही खारिज कर देतीं. अफसोस कि दुःख की उस घड़ी में भी किसी ने मूर्ख की तरह उन्हें महज अटल के घर की एक सदस्य कह दिया. वास्तव में वह अटल के जीवन को दिशा देनेवाली थीं, वह जिनके भावनात्मक सहयोग के बिना, शायद यह आदमी उस स्तर तक कभी नहीं पहुँच पाता, जहाँ तक वह पहुँच सका.’ यह एक ऐसे व्यक्ति का कहना है, जो दोनों को करीब से जानता है; लेकिन अपनी पहचान बताने को राजी नहीं हुआ.
बेशक, राजनीतिक हलकों ने श्रीमती कौल के महत्त्व को पहचाना. भले ही उनकी मृत्यु तब हुई, जब 2014 के आम चुनावों के लिए जारी प्रचार अपने चरम पर था, फिर भी बी.जे.पी. के शीर्ष नेता; जैसे एल.के. आडवाणी, राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज ने अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया हालाँकि नरेंद्र मोदी, देश में कहीं और व्यस्त थे. यह भी अहम है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी उनकी मृत्यु पर शोक जताने के लिए चुपचाप अटल के घर पहुँची थीं, यहाँ तक कि जिस सिंधिया घराने का उन दिनों ग्वालियर पर शासन था, जब अटल और राजकुमारी कौल वहाँ कॉलेज में पढ़ रहे थे, उसके वारिस ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अंतिम संस्कार में पहुँचे थे.
अटल के सहयोगी सुधींद्र कुलकर्णी ने श्रीमती कौल के निधन के बाद लिखे गए शोक संदेश में उन्हें श्री अटलजी की गोद ली गई पुत्री नमिता की माँ, ‘राजकुमारी कौल’ के नाम से संबोधित किया.
वास्तव में, कौल परिवार के साथ रहने के कुछ ही दिनों बाद अटल ने परिवार की दोनों बेटियों नमिता और नम्रता को गोद ले लिया. कई वर्षों तक अटल के साथ रहनेवाले कुलकर्णी श्रीमती कौल के घर तब से आते-जाते रहे, जब अटल प्रधानमंत्री नहीं बने थे. उन्होंने श्रीमती कौल को एक दयालु महिला बताया, जिनकी सूरत और जिनका हृदय मातृत्व से भरा था.
कुलकर्णी ने कहा, ‘जिसने भी उनसे बातचीत की है, उन्हें काफी सुसंस्कृत पाया, उनमें काफी गहरी और बहुआयामी सोच-समझ थी.’
के.पी. नैयर ने टेलीग्राफ में लिखा, ‘आजादी के बाद से लेकर अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों के घर में आंटी (उनके लिए, जिन्हें उनके घर तक जाने का सौभाग्य प्राप्त था) को सबसे कम महत्त्व दिया गया, जबकि उनका महत्त्व वे लोग समझते थे, जिन्हें अटल के निजी जीवन के संबंधों की जटिलताओं का ज्ञान था.’ उन्होंने यह भी कहा कि श्रीमती कौल की मृत्यु से, भारतीय राजनीति की सबसे महान् प्रेम कहानी धीरे-धीरे उसी प्रकार सदा के लिए समाप्त हो गई, जिस प्रकार वह कई दशकों में परवान चढ़ी थी और जानकारी में होने के बावजूद लोगों की उत्सुकता का विषय बनी रहती थी.
कुछ इसी अंदाज में दिल्ली की राजनीति पर पैनी नजर रखनेवाले वरिष्ठ पत्रकार पंकज वोहरा ने मुझे बताया, ‘श्रीमती कौल वह आधार थीं, जिनके चारों ओर अटल का घर चलता था. अटल जब प्रधानमंत्री बने, तब रामजस कॉलेज के जिन लड़कों से उनका परिचय पहले से था, उनकी किस्मत चमक उठी. वास्तव में दिल्ली में उन दिनों रामजस क्लब काफी मशहूर हुआ था, लेकिन एक बात याद रखिए कि ये लड़के अटल की तुलना में श्रीमती कौल के ज्यादा करीब थे. उन्हें श्रीमती कौल की वजह से ही पहचान मिली.’
इस विचार की पुष्टि एस.के. दास भी परोक्ष रूप से करते दिखते हैं, जब वे कहते हैं, ‘हममें से भी जो लोग दिल्ली के बाहर रहते थे, लेकिन राजधानी आने पर अटल के घर जाते थे, उनमें से अधिकांश की दिलचस्पी अटल से कहीं ज्यादा श्रीमती कौल से मिलने में रहती थी.’
अटल जब प्रधानमंत्री बने, तब उनके पहले निजी सचिव शक्ति सिन्हा थे, जो केंद्र शासित क्षेत्र कैडर के एक IAS अधिकारी थे. सिन्हा की पत्नी भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी थीं और वे श्रीमती कौल की भतीजी थीं. सिन्हा तब से अटल के सचिव थे, जब वे विपक्ष के नेता हुआ करते थे. इत्तेफाक से जब सिन्हा को वर्ल्ड बैंक में मिली, जिम्मेदारी के लिए अपनी नौकरी छोड़ी, तब उनके जूनियर वी. आनंदराजन को पदोन्नत कर उनकी जगह बिठाया गया. उस समय आनंदराजन काफी जूनियर IAS अधिकारी थे, उन्हें उनकी साधारण सी नौकरी से उठाकर प्रधानमंत्री कार्यालय में केवल इस कारण ले आया गया, क्योंकि वे पहले से शक्ति सिन्हा को जानते थे. आनंदराजन की पत्नी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में शक्ति सिन्हा की पत्नी को रिपोर्ट करती थीं.
पंकज वोहरा ने कहा, ‘इस प्रकार श्रीमती कौल का एंगल अटल के शासन में काम करता था. ऐसा ही उदाहरण, एक और IAS अफसर पी. के. होता का है, जो अटल के शासनकाल में महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे. वह रामजस कॉलेज से नहीं थे; लेकिन पास के ही किरोड़ीमल कॉलेज के हॉस्टल में रहते थे और उन लड़कों से उनकी दोस्ती थी, जो रामजस क्लब के खास सदस्य थे.’
अटल के घर में 1980 के दशक की शुरुआत में एक बदलाव आया, जब उनकी गोद ली हुई बेटी (और श्रीमती कौल की अपनी बेटी) नमिता ने रंजन भट्टाचार्य से शादी की. रंजन पटना के रहनेवाले थे, जो दिल्ली में ओबेरॉय होटल में काम करते थे. 1980 के दशक की शुरुआत में यहीं उनका प्यार नमिता के साथ परवान चढ़ा. उसने दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज से पढ़ाई पूरी की थी और उस समय मौर्य होटल में काम कर रही थी. उनकी मुलाकात पहले 1977 में यूनिवर्सिटी के दिनों में हुई थी. जल्दी ही उनका आना-जाना अटल के घर में होने लगा, लेकिन अटल ने उनसे एक दूरी बनाए रखी, जबकि डाइनिंग टेबल पर सब साथ ही बैठा करते थे. रंजन और नमिता ने एक-दूसरे को अपना दिल दे दिया था, लेकिन रंजन को एक कड़ा इम्तिहान पास करना बाकी था. इससे पहले कि वह घुन्नु (नमिता के घर का नाम) से शादी करते, उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी का दिल जीतना था. जैसा कि आगे चलकर रंजन ने एक इंटरव्यू में बताया कि जब भी अटल उनसे मिलते तो उनका नाम भूल जाते थे और कभी बनर्जी, कभी मुखर्जी तो कभी बंगाली बाबू जैसे नामों से बुलाया करते थे. कहने की आवश्यकता नहीं कि मार्केटिंग के बुनियादी उसूलों में पक्के, वाकपटु रंजन ने अटल की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली और उस घर का हिस्सा बन गए. शादी के बाद वह भी उसी घर में रहने लगे, जिसका कारण कुछ हद तक यह था कि रंजन खाते-पीते घर से थे; लेकिन एक के बाद एक उन्होंने अपने माता-पिता को तभी खो दिया था, जब वे बीस की आयु के आसपास थे. अपनी पत्नी की तरह ही रंजन भी अटल को बापजी कहने लगे और हकीकत में उनके काफी करीब आ गए. 1987 में रंजन ने अपनी नौकरी छोड़ दी और कारोबारी बन गए. उन्होंने मनाली में एक होटल बनाया और कुछ वर्षों तक उसे चलाते रहे. बाद में उन्होंने एक मार्केटिंग कंपनी बनाई, जो अमेरिकी कार्लसन होटल्स में दुनिया भर में आरक्षण उपलब्ध कराती थी. उसके बाद रंजन कंट्री डवलपमेंट एंड मैनेजमेंट सर्विसेज के मैनेजिंग डायरेक्टर बन गए, जो कार्लसन और चाणक्य होटल्स का साझा उपक्रम था तथा जो विभिन्न स्थानों पर बजट होटल उपलब्ध कराता था. निश्चित रूप से गोद लिये गए दामाद का कॉरियर बापजी के परिवार का हिस्सा बनने के बाद फलने-फूलने लगा, वहीं बापजी खुद भी रंजन पर काफी भरोसा करने लगे थे. इसका प्रमाण तब मिला, जब 1996 में अटल पहली बार प्रधानमंत्री बने थे. उनकी सरकार महज तेरह दिनों तक चली; लेकिन उस दौरान भी अटलजी ने रंजन को अपना ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (ओ.एस.डी.) नियुक्त किया था. अटल के आगे आनेवाले प्रधानमंत्रित्वकाल में, जिसमें 1999 से 2004 का कार्यकाल शामिल है, रंजन के पास कोई आधिकारिक पद नहीं था; लेकिन उन्हें दिल्ली के राजनीतिक और कारोबारी हल्के की प्रभावशाली हस्ती माना जाता था. मीडिया में ऐसी खबरें लगातार आती रहती थीं, जिनमें कथित तौर पर रंजन की ओर से सौदे कराने की बातें होती थीं, जबकि घर के दामाद हमेशा उन्हें खारिज कर देते और यह कहते कि उनका सरकार से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने यह माना कि वह प्रधानमंत्री के साथ उनके सरकारी आवास में रहते हैं, लेकिन उनके मुताबिक उसमें कोई गलत बात नहीं है. वैसे भी वह अटल के साथ 1983 से ही रह रहे हैं और इस कारण बापजी के पी.एम. बनने के बाद उनका उनके आवास में साथ रहने चले आना कोई गलत बात नहीं. मीडिया में छपे इंटरव्यू में रंजन को ऐसा कहते हुए दिखाया गया था. रंजन ने कहा कि वह ग्रेटर कैलाश में अपने ऑफिस से अपना बिजनेस चलाते हैं, न कि प्रधानमंत्री के रेसकोर्स रोड स्थित घर से. श्रीमती कौल की बड़ी बेटी नम्रता एक डॉक्टर बनी और फिर न्यूयॉर्क चली गई, जहाँ वह आज भी रह रही है. उनके पिता बृज नारायण कौल ने उन्हीं के साथ अपने अंतिम दिन बिताए. वे अपनी बेहतर चिकित्सा के लिए वहाँ गए थे. यह अटल के प्रधानमंत्री बनने से काफी पहले की बात है.
के.पी. नैयर ने ‘द टेलीग्राफ’ में श्रीमती कौल के शोक संदेश में लिखा, ‘वाजपेयी से उन्होंने केवल एक चीज माँगी थी और वह थी कि जब वे न्यूयॉर्क में यू.एन. की वार्षिक महासभा में हिस्सा लेने गए, तब उन्हें अपनी यात्रा की तारीख इस तरह रखने का आग्रह किया कि वे नम्रता के जन्मदिन पर अमेरिका में रह सकें.’ नैयर ने यह भी लिखा, ‘श्रीमती कौल का नाम कभी पी.एम. की प्रोटोकॉल बुक में सरकारी कार्यक्रमों की मेजबान के तौर पर नहीं आया और वह वाजपेयी के साथ विदेश दौर पर भी नहीं जाती थीं, लेकिन इन सारे दौरों में उनकी अनदेखी मौजूदगी स्पष्ट थी.’ उन्होंने आगे कहा, ‘भट्टाचार्य, जो लगभग हर दौरे में अटल के साथ विदेश दौरे पर नमिता समेत जाते थे और दोनों का जिक्र प्रोटोकॉल बुक में होता था, उन्हें श्रीमती कौल सेलफोन पर याद दिलाया करती थीं कि वाजपेयी को कब कौन सी दवा लेनी है.’
अटल बिहारी वाजपेयी एक सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार से हैं. भले ही उन्होंने राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल कर लिया, लेकिन उनके भाई-बहन अपना ही मध्यम वर्गीय जीवन जीते रहे. अटल के बड़े भाई अवध बिहारी मध्य प्रदेश सरकार से 1997 में उप-सचिव के पद से रिटायर हुए. उनके एक और भाई सदा बिहारी ग्वालियर में किताबों के प्रकाशन का कारोबार चलाते थे. हालाँकि उनकी बेटी करुणा शुक्ला ने बी.जे.पी. की सदस्यता ली और विधायक भी बनीं. प्रेम बिहारी, जो अटल के सबसे करीब थे, वे मध्य प्रदेश सरकार के सहकारिता विभाग में शामिल हुए और बिलासपुर में तैनात थे. अटल जब प्रधानमंत्री बने, तब प्रेम बिहारी के पुत्र नवीन ने दिल्ली में बरसों पहले बिताई एक छुट्टी का अनुभव रिडिफ डॉट कॉम से साझा किया. उन्होंने बताया कि जब वे दिल्ली पहुँचे और ट्रेन से उतरे, तब नवीन के पिता ने नवीन के बड़े भाई को अटल के घर यह देखने के लिए भेजा कि वे घर पर हैं या नहीं. उस समय तक अटल एक विख्यात राजनेता बन चुके थे. बाकी परिवार स्टेशन के रिटायरिंग रूम में ही रुका रहा. अटल को जब पता चला कि उनके भाई और उनका परिवार दिल्ली आया है, तो वे भागे-भागे खुद ही स्टेशन चले आए और उन्हें घर ले गए. नवीन को याद है कि कैसे जब उन्हें टैक्सी में अपने साथ लाया मटका रखने में संकोच हो रहा था, तब अटल ने, जो अपने भतीजों के छोटे चाचाजी थे, यह कहते हुए सबको सहज कर दिया कि मटका फ्रिज से ज्यादा अच्छी तरह पानी को ठंडा करता है और खुद ही टैक्सी तक उस मटके को उठाकर ले गए.
उसी इंटरव्यू में अटल के दूसरे भतीतों ने बताया कि उनके चाचा परिवार के काफी करीब थे और शादी-ब्याह जैसे महत्त्वपूर्ण मौके पर मौजूद रहना नहीं भूलते थे. हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि अपने परिवार के सदस्यों की मदद के मामले में अटल ने कभी पद का दुरुपयोग नहीं किया. ऐसा बताया जाता है कि जब मध्य प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार मध्य प्रदेश का शासन चला रही थी, तब प्रेम बिहारी ने अपना ट्रांसफर रुकवाने का प्रयास किया था. संबंधित विभाग के मंत्री आरिफ बेग बी.जे.पी. के ही थे, लेकिन अटल ने दखल देने से इनकार कर दिया. उसी इंटरव्यू में अटल की बहन उर्मिला मिश्रा याद करते हुए कहती हैं कि तमाम लोग मदद माँगने आते थे और इस कारण वे उन्हें बस अपना अनुरोध भेज दिया करते थे, न कि उनके पीछे पड़े रहते थे. कई अनुरोध पासपोर्ट बनवाने या नई दिल्ली के एम्स जैसे अस्पताल में दाखिले से जुड़े होते थे. उर्मिला के बेटे अनूप राजनीति में शामिल हुए और बी.जे.पी. के सांसद बने. 2014 के आम चुनावों में वे चुनाव हार गए. हालाँकि अनूप लगातार अटल के करीब बने रहे, यहाँ तक कि जब वे प्रधानमंत्री बन गए, तब भी अटल अपने छोटे मामाजी से मिलने चले आते थे और कई बार मैंने उन्हें 3 आर.सी.आर. में नाश्ता या रात का खाना खाते देखा है, यह बात अटल के एक करीबी ने बताई, जब अटल प्रधानमंत्री थे.
अटल जब पहली बार 1950 में दिल्ली आए, तब वे कहीं भी रहने के लिए तैयार थे. बेशक, वे उस वक्त एक अनजान व्यक्ति थे और शहर में जहाँ चाहे, वहाँ घूम सकते थे. ऐसी सुनी-सुनाई बात है कि उन्होंने वह रात इंडिया गेट के करीब के उद्यान में गुजारी थी. सांसद बनने के बाद अटल बी.जे.पी. कार्यकर्ताओं के लिए एक घर में रहने लगे. बाद में वह दीनदयाल उपाध्याय, जगदीश प्रसाद माथुर और दत्तोपंत ठेंगड़ी के साथ रहने लगे. ये सभी जनसंघ के नेता थे, जिनकी पृष्ठभूमि संघ की थी. चूँकि यह एक प्रकार का सामुदायिक जीवन था, जिसमें सभी अविवाहित थे, इसलिए घर का काम सबके बीच बँटा हुआ था. अटल के जिम्मे रसोई थी, क्योंकि उन्हें पकाने और खाने का शौक था. वे खिचड़ी और खीर बनाने में माहिर थे. कई वर्षों बाद एल.के. आडवाणी ने एक इंटरव्यू में बताया कि जब अटल पी.एम. थे और वे डिप्टी पी.एम., तो कैसे उन दिनों, यहाँ तक कि 1970 के दशक के मध्य तक, वे फिल्में देखने एक साथ रीगल सिनेमा जाया करते थे. फिल्म के बाद वे अकसर पानी-पूरी खाते थे.
यदि अटक राजनेता नहीं बनते, तो एक बेहतरीन कवि बन गए होते. जैसा कि उन्होंने अपने काव्य-संग्रह ‘मेरी इक्यावन कविताएँ’ के परिचय में लिखा है. उनका राजनीतिक कार्य और उससे पहले पत्रकारिता से जुड़े कार्य उन्हें उस लगन के साथ कविता नहीं लिखने देते थे. जैसा कि वे चाहते थे.
उसी परिचय में अटल ने लिखा कि अपने घर (उनके पिता की लिखी कविताओं को ग्वालियर के स्कूलों में होनेवाली प्रार्थना में शामिल किया गया था) के साहित्यिक माहौल में वे अपने बड़े भाइयों के साथ, काफी कम उम्र में ही कवि सम्मेलनों में जाने लगे थे. अटल ने कहा कि उन्होंने अपनी पहली कविता (या शायद उनकी याददाश्त के मुताबिक) ताजमहल पर लिखी थी. यह न तो ताजमहल की खूबसूरती पर, न ही मुमताज महल के लिए शाहजहाँ के प्यार पर आधारित थी, बल्कि उन श्रमिकों के शोषण पर आधारित थी, जिन्होंने उस भव्य निशानी का निर्माण किया था. कविता की पहली कुछ पंक्तियाँ इस तरह थीं-
ये ताजमहल, ये ताजमहल,
यमुना की रोती धार विकल,
कल-कल चल चल,
जब हिंदुस्तान रोया सकल,
तब बन पाया ताजमहल,
ये ताजमहल, ये ताजमहल.
उनकी सबसे जानी-मानी कविताओं में से एक ‘ऊँचाई’ तब लिखी गई थी, जब उन्हें 1992 में ‘पद्म विभूषण’ सम्मान मिला था. इसका समापन इन पंक्तियों से हुआ था-
मेरे प्रभु,
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
गैरों को गले लगा न सकूँ,
इतनी ऊँचाई मत देना.
अटल की कविता का उड़िया में अनुवाद करनेवाले जाने-माने लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता सीताकांत महापात्र कहते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री एक शानदार कवि भले ही न हों, लेकिन वे बहुत अच्छे कवि तो निश्चित तौर पर थे. महापात्र कहते हैं, ‘अपने बेहद व्यस्त राजनीतिक जीवन के कारण वे अपने कौशल को माँज नहीं सके अन्यथा वे एक बेहद मशहूर कवि बन गए होते; लेकिन इसमें शक नहीं कि वे एक संवेदनशील कवि हैं.’
सुनीता बुद्धिराजा कहती हैं कि कवि के रूप में उनकी लोकप्रियता सीमित थी, क्योंकि वे राष्ट्रभक्ति की कविताओं में विशिष्टता रखते थे. आजादी के बाद इस तरह के विषय कारगर नहीं रहे, यह कहने के साथ ही वे जोड़ना नहीं भूलतीं, यदि वे हास्य कवि होते या प्रेम जैसे विषयों पर लिखा होता तो उनकी गिनती चोटी के कवियों में होती.
अटल ने स्वयं भी कई बार कहा है कि उनका राजनीतिक कार्य उनके अंदर के कवि के लिए बाधा बन जाता था. ‘आप की अदालत’ के एक एपिसोड में प्रधानमंत्री बनने से पहले उन्होंने अपने कवि के अंदाज में एक प्रभावी टिप्पणी की, ‘राजनीति के रेगिस्तान में कविता की धारा सूख गई.’ दिलचस्प रूप से उसी कार्यक्रम में अटल ने खुलासा किया कि कभी-कभी उन्हें लगता है कि उन्हें पूरी तरह से एक कवि बन जाना चाहिए, लेकिन कंबल छोड़ता ही नहीं.
‘कौन कौरव, कौन पांडव?’ नाम की अपनी कविता में अटल पूछते हैं कि नैतिक और अनैतिकों की सेनाओं के बीच कोई कैसे भेद करे? शकुनि के भ्रष्टाचारी विवेक का इस्तेमाल दोनों ही पक्षों की ओर से समान रूप से किया जा रहा है. धर्मराज युधिष्ठिर, जो न्यायपरायण हैं, वे आज भी पासे के गुलाम हैं और हर सभा में द्रौपदी का चीरहरण आज भी हो रहा है. महाभारत का होना निश्चित है. इस बार यह भयंकर युद्ध भगवान् के बिना, रक्षक कृष्ण के बिना लड़ा जाएगा. कविता इस बात पर जोर देती है कि जीत किसी भी पक्ष की हो सकती है, लेकिन नुकसान केवल सामान्य आदमी का ही होगा.
एक और कविता है, जिसमें वे चिंतन की मनःस्थिति में दिखते हैं. ‘क्या खोया क्या पाया जग में, मिलते और बिछुड़ते मग में, मुझे किसी से नहीं है शिकायत, यद्यपि छला गया पग पग में, एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें.’
अटल की सबसे विख्यात कविताओं में से एक है ‘गीत नया गाता हूँ.’ कविता की शुरुआत जब होती है, तब नायक का मन बुझा-बुझा सा है, गीत नहीं गाता हूँ और बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं, टूटा तिलिस्म आज, सच से भय खाता हूँ, गीत नहीं गाता हूँ.’ दूसरे छंद में, नायक का आत्मविश्वास लौट आया है और वह कहता है, ‘गीत नया गाता हूँ, टूटे हुए तारों से, फूटे वासंती स्वर, पत्थर की छाती में उग आए नव अंकुर.’ और अंत में, ‘काल के कपाल पर लिखता हूँ, मिटाता हूँ.’
उनके कुछ छंदों को गजल सम्राट् जगजीत सिंह ने ‘संवेदना’ नाम के एलबम में सँजोया हैं, जिसे 2002 में रिलीज किया गया था और उसमें उनकी कुछ दिलचस्प कविताएँ शामिल हैं. एक कविता इमरजेंसी का एक साल पूरा होने पर लिखी गई थी, ‘एक बरस बीत गया’. दूसरा है, ‘जीवन बीत चला,’ जिसे उन्होंने अपने जन्मदिन पर लिखा था. वे जब एम्स में भरती थे, तब एक बार मरीजों की मृत्यु पर उनके परिजनों को रोते सुना और ‘दूर कोई रोता है’ कविता लिख डाली.
अटल को कविताएँ लिखने के लिए पर्याप्त समय भले ही न मिलता हो, लेकिन उन्हें कवि-गोष्ठियों में जाने का बड़ा शौक था. बुद्धिराजा कहती हैं कि राजनीतिक विचारधारा और पार्टी से जुड़ाव प्रतिद्वंद्वी दलों की ओर से आयोजित काव्य-पाठ के सत्र में जाने से अटल को नहीं रोक पाते थे. ‘उन्हें इन काव्य-पाठ के सत्रों में जाने के लिए बस कहने भर की देर हुआ करती थी और मैंने उन्हें भागवत झा आजाद तथा गिरिजा व्यास जैसे कांग्रेसियों या फिर लाडली मोहन निगम जैसे समाजवादियों के घर भी देखा है. उनके लिए कविता राजनीति से ऊपर थी.’
अटल ‘धर्मयुग’ के संपादक धर्मवीर भारती से लगातार जुड़े रहे. वे भी एक जाने-माने लेखक थे. जिन्होंने अटल को कविता का पाठ करते सुना है, वे कहते हैं कि बी.जे.पी. के आला नेता एक महान् वक्ता थे, लेकिन उनका कविता सुनाने का अंदाज उससे भी बेहतर था. ‘वह अपने कविता पाठ में ऐसा भाव ले आते थे कि सामग्री की खामियाँ उनमें छिप जाती थीं. उनके हाव-भाव और विराम इतने उपयुक्त स्थान पर होते थे कि कविता में जान डाल देते थे. हरिवंश राय बच्चन या सुमित्रानंदन पंत जैसे भले ही न हों, लेकिन वे एक महान् कवि थे. यह कहना है एक कवि का, जिन्होंने अटल की कविता की समीक्षा की है; लेकिन अपना नाम नहीं बताना चाहते.
उनकी कविता की खासियत यह थी कि वह सीधे निकलती थी. उनकी कविताएँ काल्पनिक नहीं होती थीं. उनकी आशावादिता उनकी कविताओं में झलकती थी और एक या दो पंक्तियों में निराशावाद रहता भी था, तो अगली ही पंक्ति आशावाद से भरी होती थी, ऐसा कवि सुरेंद्र शर्मा कहते हैं, जिन्होंने निजी और सार्वजनिक गोष्ठियों मंि अटल के साथ कविता पाठ किया है, जिनमें अटल मुख्य अतिथि हुआ करते थे. शर्मा कहते हैं, ‘वह कवि गोष्ठियों में निजी श्रोताओं के बीच कविता का पाठ करते थे और उनमें किसी सार्वजनिक हस्ती के रूप में नहीं, बल्कि एक आम आदमी की तरह आते थे.’
अटल न केवल दूसरों द्वारा लिखी अच्छी कविता की सराहना करते थे, बल्कि उन कवियों को बधाई देने के लिए भी तत्पर रहते थे. सुनीता बुद्धिराजा को याद है कि कैसे ‘धर्मयुग’ के जिस संस्करण में उनकी कविता छपी थी, उसी में अटल की कविता भी छपी थी. वे कहती हैं, ‘मुझे गर्व महसूस हुआ और वह और भी बढ़ गया, जब उन्होंने मुझे फोन किया व बताया कि उन्होंने मेरी कविता पढ़ी और उन्हें अच्छी लगी.’
वर्ष 2004 की शुरुआत में बी.जे.पी. नेता और प्रधानमंत्री कार्यालय में तब राज्य मंत्री रहे विजय गोयल ने अपने बॉस के पसंद की एक सूची तैयार की. उस सूची में अटल के पसंदीदा कवियों में हरिवंश राय बच्चन, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, बालकृष्ण शर्मा नवीन, शिवमंगल सिंह सुमन और फैज अहमद फैज शामिल थे. अटल ने कहा कि उन्होंने जो बेहतरीन फिल्में देखीं हैं, उनमें ‘देवदास,’ ‘बंदिनी,’ ‘तीसरी कसम,’ ‘मौसम,’ ‘ममता और आँधी’ तथा जो अंग्रेजी फिल्में देखी थीं, उनमें जो सबसे अच्छी लगी, वह थी—‘ब्रिज ओवर द रिवर क्वाई,’ ‘बॉर्न फ्री’ और ‘गांधी’.
कविता के अलावा अटल को शास्त्रा्य संगीत भी बहुत अच्छा लगता था, विशेष रूप से भीमसेन जोशी, अमजद अली खान और हरि प्रसाद चौरसिया का. सीताकांत महापात्र बीते दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि कैसे वे अटल द्वारा अपने आवास पर आयोजित गायन के एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे. महापात्र कहते हैं, ‘यह पारंपरिक संगीत के प्रति उनके प्रेम को ही दरशाता है.’
अटल ने स्वयं भी साक्षात्कारों में शास्त्रीय संगीत के प्रति अपने प्रेम की चर्चा कर बताया कि कैसे मीरा के भजन उन्हें भाव-विभोर कर देते हैं. उनके एक सहयोगी का कहना है कि उन्हें कुमार गंधर्व का गायन बहुत अच्छा लगता था.
अटल पैदाइशी शाकाहारी थे, लेकिन जीवन में आगे चलकर उन्हें मांसाहारी और चीनी व्यंजनों का जायका अच्छा लगने लगा; हालाँकि खिचड़ी, पूरी-सब्जी और दही-पकौड़ी जैसे पारंपरिक भारतीय व्यंजन भी उन्हें रुचिकर लगते थे. ‘वे अच्छे खाने के शौकीन हैं,’ उनके एक पूर्व सहयोगी कहते हैं. एस.के. दास बताते हैं, ‘मिठाई देखकर उनके मुँह में पानी आ जाता था और मुझे याद है कि जब हम सारे छात्र पचास वर्ष पहले उनसे मिलने पहुँचे थे तो उन्हें मिठाई पर टूट पड़ते देखा था.’
विजय गोयल की ओर से तैयार संग्रह में खीर, मालपुआ और मंगौड़ी को अटल के पसंदीदा व्यंजनों में शामिल किया गया था. निश्चित रूप से, उम्र बढ़ने के साथ ही उनका भोजन कम होता गया, क्योंकि वे स्वास्थ्य का खयाल करने लगे. अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में अटल व्हिस्की के शौकीन थे और शराब पीने की बात छिपाते नहीं थे. जब वे प्रधानमंत्री बने, तब तक उनकी उम्र तिहत्तर वर्ष हो चुकी थी और वे शराब पीना छोड़ चुके थे.
वे लोग जो अटल को करीब से जानते हैं, उनका कहना है कि उनमें काफी गहराई है और अकसर उनके भाषणों तथा उनकी कविताओं में विचारों की गहराई की झलक मिलती है. इसका एक अच्छा उदाहरण यह है कि जब बी.जे.पी. अस्तित्व में आई, तब अटल ने कमल के फूल को पार्टी के चिह्न के रूप में चुना. जिस प्रकार कमल कीचड़ में पैदा होता है, लेकिन वह अपने आसपास के कीचड़ से अछूता रहता है, उसी प्रकार वे चाहते थे कि बी.जे.पी. एक ऐसी पार्टी बने, जो राजनीति के कीचड़ से ऊपर हो.

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