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कोशकार अरविंद कुमार का प्रयाण: जाना एक शब्द-सहचर का

कोशकारिता के क्षेत्र में गए लगभग चार दशकों से कार्यरत अरविंद कुमार अब हमारे बीच नहीं हैं. वे शायद अकेले ऐसे कोशकार हैं जिन्होंने हिंदी कोशकारिता को अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया तथा अपने बलबूते वह काम कर दिखाया जो बड़ी से बड़ी संस्थाओं के वश का नहीं है.

अरविंद कुमारः एक शब्द मनीषी, जिसने हिंदी को समृद्ध किया अरविंद कुमारः एक शब्द मनीषी, जिसने हिंदी को समृद्ध किया

हिंदी की दुंदुभि पीटने में हम सबसे आगे हैं यद्यपि भारत की राजभाषा होते हुए भी भारतवासियों के हाथ यदि तंग हैं तो हिंदी में. आज भी हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए केंद्रीय सरकार के कार्यालयों, उपक्रमों, निकायों सहित हिंदी भाषी राज्यी सरकारों द्वारा कितनी ही राशि व्यय की जाती है किन्तु आज भी प्रयोग और प्रचलन की पायदान पर हिंदी की हालत दयनीय है. हिंदी दिवस-मास आते ही हिंदी के कार्यक्रमों-गोष्ठियों-समारोहों और गतिविधियों का मेला-सा लग जाता है और इन गतिविधियों के खत्म होते ही मेले की धूल भी तिरोहित हो उठती है. बस किया हुआ काम शेष रह जाता है. ऐसे धुनी कोशकारों संपादकों में कोशकारिता के क्षेत्र में गए लगभग चार दशकों से कार्यरत अरविंद कुमार अब हमारे बीच नहीं हैं. वे शायद अकेले ऐसे कोशकार हैं जिन्होंने हिंदी कोशकारिता को अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया तथा अपने बलबूते वह काम कर दिखाया जो बड़ी से बड़ी संस्थाओं के वश का नहीं है.  

हिंदी में शब्दकोशों की दुनिया में फादर कामिल बुल्के के बाद आदर से लिया जाने वाला नाम अरविंद कुमार का ही है. यद्यपि उनका पहला कोश छियासठवां साल पूरा करते-करते छपा. यानी साठ के बाद. लेकिन छपी तो वह इतिहास बन गई. यह युगांतरकारी किताब थी 'समांतर कोश'. इसके साथ शब्दावली, थिसारस और कोशकारिता की उनकी जो परियोजना अरविंद लिंग्विस्टिक्स शुरू हुई वह आज एक महान अभियान बन चुकी है. 'माधुरी' जैसी प्रतिष्ठित फिल्मी पत्रिका के संपादन से निवृत्त होकर उन्होंने यह काम पहले तो अकेले ही शुरू किया किन्तु बाद में इस अनुष्ठान में उनकी पत्नी कुसुम, बेटी मीता व पुत्र सुमीत ने भी पर्याप्त हाथ बंटाया तथा मैनुअल किए जाने वाली शब्द-संग्रहण की इस यात्रा को कम्‍प्‍यूटरीकृत कर शब्दों की छंटाई व अर्थच्छायाओं की प्रविष्टियों का काम आसान कर दिया. यही कारण है कि समांतर कोश से प्रारंभ यह यात्रा आगे चल कर अनेक कोशों में सुविस्तृत और परिवर्धित हुई.  

उत्‍तर प्रदेश के मेरठ जनपद में जनवरी 1930 में जनमे तथा 1943 में दिल्‍ली आ बसे अरविंद कुमार ने 1980 से 85 तक सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट और 1963 से 78 तक माधुरी का संपादन किया. इससे पूर्व वे दिल्‍ली प्रेस समूह की पत्रिका 'कैरेवान' में सहायक संपादक थे. 1945 से ही छापेख़ाने में बाल श्रमिक के रूप में, फिर प्रूफ रीडर से लेकर लिखने-पढने की दुनिया से आ जुड़े अरविंद कुमार ने अपने उत्तर जीवन में कोश और थिसारस तैयार करने का जो बीड़ा उठाया उसकी पहली फलश्रुति थी नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा दो खंडो में प्रकाशित समांतर कोश, जिसे उन्होंने 13 दिसंबर 1996 को राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को भेंट किया. 2,90,477 अभिव्य़क्तियों वाले इस कोश के बाद उनकी यात्रा थमी नहीं, वह द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस से होती हुई अरविंद वर्ड पावर: इंग्लिश-हिंदी (670,000 शब्द) से होती हुई अरविंद लेक्सिकन, शब्देश्वरी और तुकांत कोश तक आ पहुंची हैं. पत्रकारिता, कविता, कथा लेखन, फिल्म समीक्षा के विशद अनुभवों के कोश बन चुके अरविंद कुमार ने अपने अकेले के दम पर जीवन के सर्वोत्ताम चालीस साल लगाकर जो काम कर दिखाया है, वह बड़ी-बड़ी संस्थाओं के बूते का नहीं है. वे गए चार दशकों में एक ऐसे शब्द-सहचर के रूप में उभरे हैं जिन्‍होंने अंग्रेजी में उपलब्ध थिसारस की अवधारणा को हिंदी में मूर्त किया तथा अब तक पंद्रह से ज्यादा बहुउपयोगी कोशों का निर्माण किया है. इसके लिए उन्‍हें कई प्रतिष्‍ठित पुरस्‍कारों से नवाजा गया है.  

प्रस्तुत है, कोश की दुनिया के अकेले उल्लेखनीय भारतीय पुरुष अरविंद कुमार का स्मरण करते हुए उनसे भारत में संपन्न पिछले विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर भाषाविद् डॉ ओम निश्चल द्वारा की गयी बातचीत, जिससे अरविंद कुमार की जीवन यात्रा, उनका काम और अरविंद लेक्सिकन की यात्रा और संघर्ष उद्घाटित होता है.

- अरविंद जी. एक जमाना बीत चुका. लगभग चालीस सालों के परिश्रम से आपने शब्दकोश, थिसारस व लेक्सि‍कन के विशाल डाटाबेस का यह जो संसार निर्मित किया है, वह किसी मिशन से प्रेरित होकर किया या हिंदी में पेशेवर बनने की धुन भी कहीं मन में थी ?
शुरुआत में बस एक चाहत थी - हिंदी में भी रोजेट के थिसारस जैसी कोई किताब होनी चाहिए. इस से हिंदी लिखने वालों की क़लम को नई ताक़त मिल जाएगी. इस से आगे की कोई बात, कोई मिशन, मन में नहीं था. हिंदी में इस तरह की कोई किताब होनी चाहिए - सन 1953 में यह बस इच्छा भर ही थी. यह क़तई नहीं सोचा था कि वह मैं बनाऊं. (तब मैं कैरेवान पत्रिका में उप संपादक था. हिंदी से इंग्लिश में अनुवाद करने होते थे, और छपने वाली रचनाओं को संवारना भी होता था. किसी भाव विशेष के इंग्लिश के उपयुक्त शब्द पाने होते थे. तभी मैंने पहले पहल इंग्लिश थिसारस देखा और ख़रीदा था. और उस का दीवाना हो गया था.)

-जिस वक्त आप कोशकारिता की इस दुनिया में आए, तब हमारे कम्प्‍यूटर पर डाटा बेस तैयार करने काम कुछ कठिन था. शब्दकोशों के तैयार करने की विधियां बहुत पारंपरिक थीं. लिखित डाटा कार्ड के जरिए काम करना होता था. ऐसे हालात में यात्रा किस तरह शुरू की?
कोशकारिता की दुनिया में तो मैं 1973 के अंत में ही आ गया था. माधुरी का संपादन करते-करते यह बात दिमाग़ में कौंधी कि अरे बीस साल बीत गए, हिंदी थिसारस तो अभी तक नहीं बना. और फ़ैसला कर लिया कि मैं बनाऊंगा ही. तब कहीं कंप्यूटर थे ही नहीं. हिंदी इंग्लिश टाइपसैटिंग भी हाथ से या मशीनों से होती थी - चाहे किताब हो, अख़बार हो या कोश हो! तो हम ने कार्डों पर ही काम शुरू किया - 1976 में. एकमात्र यही रास्ता था तब. कंप्यूटर तो 1993 में आया हमारे पास.

- आपसे पहले तमाम कोश थे, हिंदी-हिंदी, हिंदी-अंग्रेजी, अंग्रेजी-हिंदी व केंद्रीय हिंदी निदेशालय, वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा बनाए गए तमाम तकनीकी-गैर तकनीकी पेशेवर व द्विभाषी कोश. आखिर इनकी क्या सीमाएं थीं कि आपको लेक्सिकोग्राफी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करना पड़ा?
कोशों की तो कमी नहीं थी. काशी नागरी प्रचारिणी सभा का ग्यारह खंडों का हिंदी शब्द सागर था. हिंदी साहित्य सम्मेलन का चार-पांच खंडों वाला कोश भी था. ये दोनों अपने बड़े साइज़ और कई खंडों की वज़ह से आम पाठक के काम के नहीं थे. ज्ञानमंडल लिमिटेड (वाराणसी) का बृहत् हिंदी कोश सब से काम का था. हिंदी-हिंदी, हिंदी-अंग्रेजी, अंग्रेजी-हिंदी व केंद्रीय हिंदी निदेशालय, वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा बनाए गए तमाम तकनीकी-गैर तकनीकी पेशेवर व द्विभाषी कोश थे. ये सब शब्दार्थ कोश थे. ये सिर्फ़ शब्द विशेष का अर्थ जानने के काम आ सकते थे. मेरी जुस्तजू थी एक ऐसा कोश जो किसी भाव के लिए कई शब्द देता हो. जो किसी लेखक को, अनुवादक को, अपनी भाषा संवारने में, किसी एक बात को कहने में विविधता दे सकता हो, कई विकल्प दे सकता हो. एक वाक्य में कहूं तो उन में से एक भी थिसारस नहीं था. यही इन की सीमा थी. मैं इस सीमा रेखा के पार कहीं बहुत दूर तक जाना चाहता था.
आम हिंदी वालों को इस बात की परिकल्पना ही नहीं थी कि कोई थिसारस भी होता है, या उस की आवश्यकता क्यों है. हां कई थे, जो इंग्लिश में काफ़ी आगे थे. वे जानते थे कि थिसारस क्या होता है, उस से कैसे काम लिया जाता है. लेकिन हिंदी में वह नहीं है, तो नहीं है. होना चाहिए, यह भी उन के मस्तिष्क में नहीं आता था. वे यथास्थिति से समझौता किए थे.
बस मेरी कोशकारिता का यही आधार मंत्र था. मैँ यथास्थिति से निकलना चाहता था.

- थिसारस की परंपरा अंग्रेजी में तो रही है जैसे रोजेट का थिसारस, पर हिंदी में बिल्‍कुल नई है. या यह कहूं कि हिंदी में थिसारस के प्रवर्तक आप ही हैं. आपसे पहले शायद ही किसी ने ऐसा काम किया हो. हिंदी में थिसारस का यह सपना आपने कब देखा?
जैसा कि अभी अभी मैं ने कहा कि 1953 में -तेईस साल की उमर में यह बात मेरे मन में आई और यह सपना नहीँ मात्र एक इच्छा थी.

-अंग्रेजी शब्दकोशों में अपडेशन होते रहते हैं. पर हिंदी में जब कायदे से शब्दकोश ही अगले दो साल में बासी पड़ जाते रहे हों, ऐसे में बिना कंप्यूटरीकृत डाटा बेस के शब्दावलियों या कोशों को संवर्धित करना या उन्हें अद्यतन करना कितना मुश्किल काम है. इन मुश्किलों का आपने कैसे हल निकाला?
अंग्रेजी शब्दकोशों में अपडेशन होते रहते हैं. सही है. जब डाटाबेस नहीं होते थे, तब भी उन कोशों के नए संस्करणों में नई शब्दावली जोड़ी जाती थी. तभी परिशिष्टों में. फिर कुछ साल बाद मुख्य ग्रंथ के अपने ढांचे में. प्रोन्नयन के, अधुनातन करने के रूप में. इस का मतलब होता था ँ पूरी किताब की नए सिरे से टाइपसैटिंग, चैकिंग, रीचैकिंग, प्रूफ़रीडिंग… बेहद महंगी और श्रमसाध्य प्रक्रिया. लेकिन इंग्लिश का बाज़ार (यानी किताबों के ख़रीददार) अकेले इंग्लैंड या अमेरिका में ही नहीं होते थे. पूरी दुनिया में उन के ग्राहक होते थे. उन तक पहुंचने की आशा में, और अपने सेल्स के तामझाम के आधार पर, वह ख़तरे मोल ले सकता था. उन के ग्राहक भी अधुनातन संस्करण ख़रीदने को तैयार रहते थे और हैं.
भारत में, विशेषकर हिंदी में, किताबों की बिक्री का कोई नियमित विधान, नेटवर्क नहीं है. अंग्रेजी किताबों की दुकानें होती हैं, हिंदी की नहीं. उच्च साहित्य भी नहीं मिलता. सस्ते जासूसी उपन्यास किराए पर देनी वाली दूकानें होती हैं, बस. तो ऐसे में हिंदी-हिंदी, हिंदी-इंग्लिश, इंग्लिश-हिंदी कोश की बिक्री का कोई जुगाड़ था तो आसफ़ अली रोड पर, या नई सड़क पर, या कमला नगर की किरोड़ीमल कालिज की तरफ़ वाली सड़क पर.

-आज भी भारतीय घरों में धार्मिक ग्रंथ भले मिल जाएं, शब्द-कोश नहीं मिलते. शायद इसकी जरूरत ही लोग नहीं महसूस करते. ऐसे में बाजार की जरूरतों का आपने किस तरह सामना किया?
आप ने सही कहा. धार्मिक ग्रंथ मिलते हैं, तो वो एक अनुभूत आवश्यकता का अपरिहार्य अंग हैं. आम आदमी धर्मपरायण है. अपनी आत्मा की मुक्ति की बात मानसिकता में गहरी पैठी है. दुनिया भर में. क़ुरआन, बाइबिल, गीता, रामायण, पुराण, गुरुग्रंथ साहब - ये सब से बड़ा बिज़नेस हैं, बिग बिजनेस! क़ुरआन एक्सपोर्ट करने वाले छापेख़ाने करोड़ों अरबों कमा रहे हैं. कल्याण प्रैस की किताबों की दुकान आप को पूरे हिंदी क्षेत्र में मिलेगी. उन के चलते फिरते बिक्री यान जहां तहां दिखते हैं.
किताबों की बिक्री का एक और स्रोत भी है. सरकारी ख़रीद या स्कूल कॉलेजों के पुस्तकालयों द्वारा ख़रीद. हमारे दस या अधिक प्रतिशत ऊपरी कमाई वाले देश में, हमारे पास वहां तक पहुंचने के संसाधन नहीं हैं. कभी होंगे यह भी संदेहास्पद है.
अपनी कंपनी में हम चार जन हैं. मैं प्रकाशनार्थ सामग्री मुहैया कराता हूं. 1978 से अवैतनिक हूं. गुज़ारा ठीक-ठीक चल जाता है. पत्नी कुसुम हैं. उन्होंने डाटाबेस बनाने में योगदान किया. मेरी तरह वह भी उम्र के उत्तरवर्ती हिस्से में हैं. जितना हो सकता है, काग़ज़ी काररवाई में मदद करती हैं. बेटा सुमीत हमारा प्रोग्रामर है. इंटरनैट पर अरविंद लैक्सिकन का भारी मासिक व्यय वही उठाता है. बेटी मीता है. उस के पति अतुल एक अच्छे पद पर हैं. इसलिए मीता के पास ड्राइवर भी है. वही हमारी कंपनी अरविंद लिंग्विस्टिक्स का संचालन करती है. किताबें छपवाने के लिए छापेख़ाने से (थामसन प्रैस से) संपर्क करती है. हिसाब किताब देखती है. हम सब कंपनी से कुछ लेने की हालत में नहीं हैं. हमारा कोई कर्मचारी नहीं है. कंपनी का कोई ओवरहैड ख़र्च नहीं है. इस लिए हम अपनी किताबों की क़ीमतें कम से कम रख पाते हैं. पुस्तक वितरक कंपनियां मुद्रित मूल्य के पचास से पचपन-साठ प्रतिशत वसूल करती हैं. वे भी हमें अभी मिली हैं. तो हम किताबों की क़ीमत कुल इतनी रखते हैं जितनी में हम पैकिंग पोस्टिंग आदि का ख़र्च निकाल कर दस-पंद्रह प्रतिशत बचा पाएं. जितनी छापते हैं, अभी तक तो उन में से कुल दस प्रतिशत ही बिकी हैं. जितना लगाया है, वह सब अपनी जेब से लगाया है. मुनाफ़ा होगा भी या नहीं - यह कहा नहीं जा सकता.
हमारे सामने बस एक रास्ता है. कोशिश करते रहो. कभी तो मिलेगी, कहीं तो मिलेगी - मंज़िल!

-आपने कहीं कहा है कि बीसवीं सदी से लेकर अब तक हिदी के विकास का इंजिन मीडिया रहा है. पर मीडिया तो हिंदी को विकृत भी कर रहा है. इस बात पर आप क्या कहेंगे?
पिछली सदी में हिंदी के अधुनाकरण और विकास में सब से बड़ा योगदान हिंदी के दैनिक पत्रों के लाखों सुनाम और अनाम पत्रकारों ने किया है. टेलिप्रिंटरों पर देश विदेश के समाचार आते थे. आज़ादी की लड़ाई के दौरान तरह तरह की शब्दावली आई. यह सब हर सुबह पाठकों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने नए हिंदी शब्द बनाए. भारतेंदु से ले कर आज तक जो हिंदी बढ़ी है उस में सब से बड़ा योगदान मीडिया का है - अख़बारों का, फ़िल्मों का, टीवी पर फ़ीचरों और समाचारों का.
अख़बार और टीवी हिंदी को बिगाड़ रहे हैं, मैं इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूं. वे नए नए प्रयोग कर रहे हैं. उन की कोशिश है बड़े शहरों के हिंग्लिश बोलने वालों तक पहुंचना. उन के द्वारा आयातित इंग्लिश शब्द कितने दूर तक प्रचलित होंगे, कहा नहीं जा सकता. भाषा बन रही है. कबूतरबाज़ी, मुंहनोंचवा जैसे और सूपड़ा साफ़ होना जैसे प्रयोग भी तो आ रहे हैं.

-शब्द कोश, थिसारस और शब्द - जिज्ञासा हिंदी के विकास के आयुध हैं. हम भारतीयों ने इस आयुध को कितना महत्व  दिया है?
हम ने इस आयुध को महत्व देना शुरू किया है. पिछली सदी से ही अनेकों कोश बनते आ रहे हैं. बिकते भी रहे हैं. थिसारस एक नई चीज़ है. धीरे-धीरे लोग इस समझ रहे हैं. इस क्षेत्र में एकमात्र काम हमारी टीम का ही है. समझदार वर्ग का हमें पूरा समर्थन मिल रहा है. मुझे जो कुछ सम्मान मिले और हाल ही का परम्परा से मिला ऋतुराज विशिष्ट सम्मान इस की गवाही दे रहे हैं. यह सही है कि हमारे थिसारस अभी तक मुख्य धारा का अंग नहीं बन पाए हैं. पर मुझे पूरा विश्वास है कि यह हो कर रहेगा. उम्मीद पर दुनिया क़ायम है.

- प्रजापति कश्यप, यास्क, अमर सिंह, मोनियर विलियम्स, फादर कामिल बुल्के, रामचंद्र वर्मा, हरदेव बाहरी और बदरीनाथ कपूर की इस परंपरा के आप आधुनिक उत्तराधिकारी हैं. मौजूदा कम्यूपटर फ्रेंडली पीढ़ी या कि मोबाइल-टैबलेट से जुड़ी पीढ़ी में थिसारस और कोश के प्रति कितनी जागरूकता है?
जिन ऐतिहासिक और वर्तमान महान कोशकारों ने काम किया, मैं उन का उत्तराधिकारी ज़रूर हूं, और अपने बाद के लिए तैयारी अभी से शुरू कर दी है. कम्यूटर फ्रेंडली पीढ़ी तक हम तेज़ी से पहुंच रहे हैं, मोबाइल और टेबलेट तक अभी नहीं पहुंच पाए हैं. वहां तक पहुंचना इन्हें बनाने वाली कंपनियों का काम है जिन तक हमारा संदेश नहीं पहुंचा है. जब आकाश की बात चल रही थी, तो हम ने कोशिश ज़रूर की संबंधित मंत्रालय उस पर हमारा हिंदी-इंग्लिश-हिंदी साफ़्टवेअर भी शामिल कर लें (नाममात्र की क़ीमत पर - जैसे पच्चीस पैसे प्रति आकाश कंप्यूटर) ताकि छात्रावस्था से ही बच्चे कोशप्रेमी हो जाएं. लेकिन हमारी बात अनसुनी ही रही.

- विश्व  हिंदी सम्मेलनों की क्या सार्थकता समझते हैं आप?
हिंदी सम्मेलनों का असली महत्व हर सम्मेलन जितना ही है. यह जन संपर्क का, दुनिया भर में फैले हिंदी-प्रेमियों को उत्साहित करने के नज़रिए से बड़े काम का है. कुछ प्रस्ताव पास कर के सरकार से हिंदी के विकास के लिए और फ़ंड जुटाने की रणनीति का अंग भी है.

-हिंदी के प्रसार में भारत सरकार लगभग सन् 1976 से लगी हुई है. तकनीक भी हिंदी के पूरे पक्ष में है. इसके बावजूद हिंदी में कामकाज का सम्यक् वातावरण क्यों नहीं बन पाया है?
हिंदी के प्रसार में अभी समय लगेगा. सरकारी कर्मचारी देश के हर कोने से आते हैं. हिंदी से उन का परिचय कम होता है, इसलिए हिंदी के प्रयोग से घबराते हैं. मैं बस इतना कहूंगा - सहज पके सो मीठा. जल्दबाज़ी हानिप्रद हो सकती है.

- आप धीरे धीरे वृद्ध हो रहे हैं. अपना यह महत उत्तरदायित्व किन मजबूत हाथो में देकर जाना चाहेंगे?
मैं उत्तराधिकारी तैयार करने में लगा हूं. किसी को वेतन पर रखना हमारी क्षमता से बाहर है - अभी तक. मेरी बेटी मीता ने कमर कस ली है यह दायित्व उठाने की. अगले महीने से उस की ट्रेनिंग शुरू हो जाएगी. हम अपने डाटा में नए से नए शब्द डालते रहते हैं. उस में आप को सैल्फ़ी भी मिलेगा, और भी ढेरों शब्द. हमारे किसी भी कोश के नए संस्करण में यह मिलेंगे.

-समांतर कोश, थिसारस निर्माण की यह यात्रा बेशक आपने अकेले शुरू की थी पर बाद में पत्नी कुसुम जी, बेटी मीता और बेटा डॉ. सुमीत इस महाअभियान में शामिल होते गए. एक तरह से यह एक पारिवारिक संकल्प की प्रतिश्रुति है. इस बारे में क्या कहेंगे?
यह मेरा सौभाग्य है कि मेरा पूरा परिवार मेरे साथ जुड़ता गया. पहले पत्नी कुसुम, बाद में बेटा सुमीत जिस ने कार्डों के कंप्यूटरण का सुझाव दिया, हम साधनहीनों को कंप्यूटर दिलवाया. डॉक्टरी के साथ साथ किताबें पढ़-पढ़ कर कम्प्युर प्रोग्रामिंग सीखी. डाटाबेस उस के बग़ैर बन ही नहीं सकता था. वह हमेशा हमारे साथ है. और फिर आई मीता. एक तरह से वह हमारे दिल्ली आने के कुछ साल बाद से ही मदद करने लगी. जब वह इर्विन कालिज में प्राध्यापक बनी, या बाद में अन्य नौकरियां करती रही, तो हमारे फ़ाइनेंस का वह महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई. समांतर कोश को द्विभाषी बनाने का आइडिया भी उसी का था. इस के लिए आरंभिक इंग्लिश शब्दावली भी उसी ने दी. अब वही हमारी किताबें छापने और हमारे काम का संदेश हर तरफ़ पहुंचाने में मुस्तैदी से जुटी है. हमारे भावी काम में वही नए शब्द जोड़ेगी, सुमीत प्रोग्रामिंग करता रहेगा.
अरविंद तुकांत कोश का भव्य स्वागत होने के बाद हम दोनों ने योजना बनाई है भारत को और दुनिया को पूरी तरह प्रमाणिक (तथ्याधारित तथा विश्वसनीय) हिंदी-इंग्लिश और इंग्लिश-हिंदी कोश प्रदान करने की. यही कोश बाद में आधार बनेंगे हिंदी-चीनी, या हिंदी-रूसी, या हिंदी-तमिल कोशों के.

-आपके थिसारस, कोश अब आनलाइन उपलब्ध हैं. अभी अरविंद तुकांत कोश रच कर आपने काव्य -रचना और विज्ञापन में दक्षता का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया है. अब तक की यह यात्रा आपको कैसी लगती है?
यह यात्रा अभी थमी नहीं है, हिंदी को भाषाई संसाधनों से लैस करने और हिंदी-विदेशी भाषाओं के कोशों के द्विभाषिक कोश तैयार करने की दिशा में अभी बहुत काम करना है. मंजिल पर पहुंचने का संतोष तो होता है. पर मेरी जुस्तजू अभी खत्म नहीं हुई है. जैसा, किसी शायर ने कहा है:
मंजिल मिले, मिले, न मिले, इसका ग़म नहीं.
मंजिल की जुस्तसजू में मेरा कारवॉं तो है.  

संपादक की ओर सेः यह बातचीत कुछ पुरानी अवश्‍य है पर अरविंद कुमार की पूरी कोश यात्रा को समझने के लिए पर्याप्‍त है. अब वे नहीं हैं तो देखना है कोश निर्माण एवं कोशों के विविधीकरण का यह कार्य आगे किस तरह प्रबंधित एवं संवर्धित होगा. किन्‍तु इस बात में संशय नहीं कि शब्‍दकोशों के क्षेत्र में अध्‍ययन अनुशीलन एवं उपयोग की दिशा में शब्‍द सहचर अरविंद कुमार के किये प्रयासों को भुलाया नहीं जा सकेगा.  
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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