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शीला संधूः मर्दों से भरी प्रकाशन दुनिया की अकेली औरत, जो कहती थीं- ज़िंदगी दुबारा मौक़ा दे तो फिर वही सब करना चाहूंगी

मैं अंधेरे में रास्ता ढूंढ़ते हुए वहीं से उल्टा सफ़र कर रही थी. मुझे न वह भाषा आती थी, न मैं लेखकों या उनकी सामाजिक रीतियों से परिचित थी. हिंदी की संकीर्ण परंपरा ने शुरू में मुझे स्वीकार नहीं किया. वजह यह थी कि मर्दों की दुनिया में मैं अकेली औरत थी- वह भी आधुनिका और पश्चिम के तौर-तरीकों में रची-बसी.

शीला संधूः जिनके प्रयासों से हिंदी साहित्य जगत समृद्ध हुआ [ फोटो सौजन्यः राजकमल प्रकाशन] शीला संधूः जिनके प्रयासों से हिंदी साहित्य जगत समृद्ध हुआ [ फोटो सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

हिंदी में स्तरीय साहित्यिक पुस्तकों के प्रकाशन के जरिये भारत के शैक्षिक-सांस्कृतिक क्षेत्र को समृद्ध करने वाली शीला संधू नहीं रहीं. राजकमल प्रकाशन समूह से उनका नाता किसी रोचक कथा से कम नहीं है. शीला संधू ने 1964 में राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक का दायित्व ग्रहण किया था और 1994 तक वह इस पद पर रहीं. तीन दशक में उन्होंने इस प्रकाशन की मजबूत नींव पर विशाल भवन तैयार किया. बहुत से नामचीन और नए लेखकों को इससे जोड़ा. पेपरबैक, रचनावालियों की शुरुआत की. उर्दू-हिंदी में एका के साथ पाठकों-लेखकों से एक अलग तरह का नाता जोड़ा. मंटो की रचनाओं का पांच भागों में संकलन दस्तावेज भी उनकी सूझ का परिणाम था. पत्रिका 'आलोचना' का प्रकाशन भी उनकी देन है. यही वजह है कि संधू के निधन पर राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने त्वरित टिप्पणी की, "मैं शीला संधू जी और निर्मला जैन जी के स्नेह के कारण ही राजकमल में आ सका, मैं आजीवन उनका ऋणी रहूंगा."

शीला संधू का जन्म 24 मार्च, 1924 को हुआ था और 1 मई, 2021 की सुबह उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा. पर इस बीच उनका जीवन किसी रोचक उपन्यास से कम नहीं था. एक ऐसी महिला जो हिंदी ही नहीं जानती थीं, ने न केवल देवनागरी में साहित्यिक पुस्तकों की छपाई के सबसे बड़े भारतीय प्रकाशन समूहों में से एक की लगभग तीन दशक तक अगुआई की, बल्कि इस कारोबार में कई ऐसे मानक स्थापित किए, जिन पर आज कई दूसरे समूह भी चल रहे. पर यह सहज नहीं था. संधू ने इसे बड़ी चुनौतियों के बीच खड़ा किया था. इस सिलसिले में वर्ष 2002 में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से छप कर आई रितु मेनन की अंग्रेजी पुस्तक 'Women Who Dared' का जिक्र बहुत जरूरी है. इसमें उन तमाम साहसी महिलाओं के जीवनानुभवों को शामिल किया गया था, जिन्होंने अपने जीवट से अपने समय को झकझोर कर एक मिसाल कायम की थी. इसी पुस्तक में शीला संधु का आत्मकथ्य 'Crossroads after Crossroads after Crossroads' नाम से शामिल किया गया था. इसे लिपिबद्ध किया था तानी भार्गव ने. हाल ही में हिंदी में इसका अनुवाद प्रतिमान के सहायक संपादक और हिंदी के कथाकार नरेश गोस्वामी ने 'चौराहे-दर-चौराहे जिंदगी' नाम से किया है.

साहित्य आजतक पर संधू को श्रद्धांजलि स्वरूप यह चयनित और संपादित संक्षिप्त अंश.  

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हिंदी के अजनबी इलाक़े में जब मैंने डरते-डरते क़दम रखा तो उसके पहरेदारों ने मुझे 'तेज़तर्रार और अक्खड़' या एक ऐसी 'परकटी' पंजाबन कहकर ख़ारिज कर दिया जिसे साहित्य का अलिफ़ भी नहीं आता. मुझे पता था कि मेरे बाल छोटे हैं, कि प्रकाशन-गृह का असली मालिक मेरा पति है और किसी ख़ास कोण से देखने पर मैं तेज़ और अक्खड़ नज़र आ सकती थी. लेकिन उन्हें मैं सिर से पांव तक असभ्‍य, आक्रामक और ग़ुस्सैल दिखाई देती थी. उनकी हिक़ारत में हैरत छिपी रहती थी. इतने अलग-अलग मिज़ाज के दो लोग कभी एक छत के नीचे नहीं रहे होंगे. क्या मुझे गोबर पट्टी में जन्म न लेने के कारण कभी माफ़ नहीं किया जाएगा? मेरे भीतर ग़ुस्से की लहर ज़ोर मारती कि इन अजनबी नामों वाले पान-चबाऊ लोगों को दुनिया के बारे में कई चीज़ें बता सकती हूं. आखि़र मेरा अध्ययन ठीक-ठाक था. मेरे पास ऊंची तालीम थी और मैं देश-विदेश घूम चुकी थी. मैं जिस दुनिया से आयी थी वहां कोई भी मेरी क़ाबिलियत पर इस हद तक और ओछेपन से नहीं थूक सकता था.

मैंने कुछ आसान और परिचित कि़स्‍म की कहानियां पढ़नी शुरू कीं. हिंदी साहित्य की जटिल दुनिया को मैंने नयी कहानियां की सौगात दी. मैं अंधेरे में रास्ता ढूंढ़ते हुए वहीं से उल्टा सफ़र कर रही थी. मुझे न वह भाषा आती थी, न मैं लेखकों या उनकी सामाजिक रीतियों से परिचित थी. इतना ही नहीं, मुझे यह भी मालूम नहीं था कि लोगबाग मुझसे क्‍या उम्मीद करते थे- कि मुझे उस भाषा के बड़े या उदीयमान लेखकों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए क्‍योंकि मैं इस भाषा में न पढ़ पाती थी, न उसमें लिख सकती थी और न उसमें क़ायदे से बोल पाती थी. विवादों से भरे इस माहौल में द्विवेदी जैसे संत लोगों ने मेरे सिर पर हाथ रखा और उस बीबी सुशील कौर से मुख़ातिब हुए जो मेरे अंदर दुबकी पड़ी थी. मेरे ऊपर उन लोगों का यह एक ऐसा क़र्ज़ है जिसे मैं आज तक अदा नहीं कर पायी. पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस के चंद दोस्तों, उर्दू के शायरों और पंजाबी के कुछ कहानीकारों ने मेरी हिम्मत बंधाए रखी. वक़्त के इस नाजुक मोड़ पर राजकमल और मेरे लिए बेमिसाल वक्‍ता और अध्यापक नामवर की सलाह बहुत काम आयी. लेकिन, इसी के साथ राजकमल में गुटबाज़ी और साहित्य की व्यक्तिवादी राजनीति का सिलसिला भी सतह पर आ गया.

राजकमल के पुराने सहयोगियों का मानना था कि वह भी जल्द ही पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस की नक़ल बनकर रह जाएगा. हमारे पुराने कॉमरेड कह रहे थे कि संधू परिवार अपना साम्राज्य बढ़ा रहा है. दोनों ही पक्ष मान कर चल रहे थे कि राजकमल का शीराज़ा जल्द ही बिखर जाएगा. लेकिन मैंने इन भविष्यवाणियों पर कान न देकर ऑफि़स के कामकाज पर ध्यान देना शुरू कर दिया. दरअसल, यही एक ऐसा काम था जिसे मैं अच्छी तरह कर सकती थी. मैंने काम की एक निश्चित प्रक्रिया तय की. उत्पादन के काम को व्यवस्थित किया और उन लेखकों से मिलना शुरू किया जो मेरी प्रति खुली शत्रुता नहीं रखते थे. राजकमल की सभी किताबें नवीन प्रेस में छपती थीं जिसका स्वामित्व हमारे ही पास था. प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच पहले से ही जंग चल रही थी. मैंने जीवन में कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन मुझे अपने ही घर के बाहर यह सब सुनना पड़ेगा: 'हाय, हाय! रण्डी हो गयी, शीला संधू, मुर्दाबाद'.

मेरी दुनिया तो जैसे उलट-पलट हो गयी थी. मैं घबराहट में हरदेव को बुरा-भला कहने लगी कि हम उसी की वजह से इस आफ़त में फंसे हैं. मैंने उससे कहा कि अगर मुमकिन हो तो नवीन प्रेस का सौदा कल ही कर दो. हरदेव का मानना था कि यह सब मेरी जि़द और तुनकमिज़ाजी के कारण हुआ है. उसका कहना था कि मैंने अपने व्यवहार के कारण उन लोगों को इस्तीफ़ा देने पर मजबूर किया जो इस काम को बेहतर ढंग से कर सकते थे. मैं हर तरफ़ से घिरा हुआ महसूस कर रही थी. निकलने का रास्ता दूर तक दिखाई नहीं दे रहा था. इस दौरान मेरे साथ केवल कॉमरेड जोशी का व्यवहार ही सौम्‍य रहा. उन्होंने कहा कि, 'तुम्हारी राजनीतिक और सांस्कृतिक भावनाएं एकदम दुरुस्त हैं, बस इन भावनाओं पर क़ायम रहो और अपना काम ईमानदारी से करती रहो.'

काम के सिलसिले में मैं बनारस, लखनऊ, इलाहाबाद और पटना जैसी अजनबी जगहों पर गई, जो तब मुझे चीन से भी दूर लगती थीं. जब मैं लेखकों से मिलती थी तो उनके सामने साफ़ बोल देती थी कि मुझे किसी भी व्यवसाय को चलाने या हिंदी में काम करने का अनुभव नहीं है, लेकिन मैं उन्हें यह भी कह देती थी कि अगर मैं चीनी भाषा में महारत हासिल कर सकती हूं तो चंद दिनों में हिंदी भी सीख जाऊंगी! मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि मैं यह पूरा काम साफ़ और पारदर्शी ढंग से करूंगी और राजकमल की परंपरा को शीर्ष पर ले जाऊंगी. मैंने उनसे गुज़ारिश की कि मुझे अपनी योजनाओं को ज़मीन पर उतारने के लिए वक़्त दिया जाए. मैं हिंदी के महान लेखकों से भी मिली और उन्हें भरोसा दिलाया कि मैं राजकमल पर ताला लगा कर मोटर के स्पेयर-पार्ट्स की दुकान खोलने नहीं आयी हूं. यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे पंतजी, बच्चनजी, निरालाजी, सुमनजी, बाबा नार्गाजुन और फणीश्वरनाथ रेणु जैसे दिग्गज लेखकों से मिलने का मौक़ा मिला. मुझे महादेवीजी और दिनकरजी से मिलने का अवसर मिला.

मैंने रूमान और रहस्य-रोमांच की पॉकेट बुक्स या पाठ्य-पुस्तक के ज़्यादा कमाऊ खेल में उतरने से परहेज़ किया और इस लक्ष्य को निगाह से ओझल नहीं होने दिया कि राजकमल की प्रतिष्ठा पर आंच न आये. मैंने उच्च-स्तरीय साहित्य के नियमित प्रकाशन के अलावा कभी अंग्रेज़ी-प्रकाशन की दुनिया में 'क़दम' रखने के बारे में नहीं सोचा. वक्‍़त के साथ लोग मेरे कडिय़ल व्यवहार को माफ़ करते गये.

धीरे-धीरे अपने हमउम्र रचनाकारों के साथ मेरा राबिता गहरा होता गया. बाद में यह भी पता चला कि उनके साथ दोस्ताना संबंध भी बन सकते हैं. धीरे-धीरे राजिंदर सिंह बेदी, अश्क, नेमिजी, भीष्म, भारत भूषण अग्रवाल, निर्मला, सुरेश अवस्थी, सर्वेश्वर, निर्मल, कुंवर नारायण, प्रयाग, रघुवीर सहाय, लीलाधर जगूड़ी, मनोहर श्याम जोशी, अब्दुल बिस्मिल्लाह और आखि़र में- लेकिन किसी भी तरह कमतर नहीं, श्रीलाल शुक्‍ल के साथ इसी तरह की दोस्ती परवान चढ़ी. मुझे याद है कि राही मासूम रज़ा का निकाह संसद भवन की छाया में खड़ी हरी मस्जिद में हुआ था और मैं वहां नामवरजी के साथ तांगे में बैठकर पहुंची थी.

कृष्णा सोबती मेरे लिए किसी चौराहे पर लगे मार्गदर्शक चिह्न की तरह थीं. हिंदी में उर्दू की संवेदनशीलता लाने वाली और पंजाबियत के ख़ास अक्खड़ अंदाज़ में लिखने वाली कृष्णा सोबती के साथ मैं सबसे ज़्यादा नज़दीकी महसूस करती थी. हालांकि मुझे इसमें ज़रा कम कामयाबी मिली, लेकिन मैंने यौवन और उत्साह से भरे नये लेखकों को समझने की कोशिश भी कि जो हमारी पीढ़ी की सूक्ष्म और एक हद तक भोली-भाली दर्जाबंदियों का प्रतिकार कर रही थी. क्या मेरे और अशोक वाजेपयी और मृणाल पांडे जैसे लेखकों के बीच पीढ़ीगत अंतराल का यही कांटा खड़ा था? मुझे उनसे और युवतर पीढ़ी के लेखकों- सत्येन कुमार, मंजूर ऐहतेशाम, पद्मा सचदेव, स्वदेश दीपक, गीतांजलि और पंकज बिष्ट आदि से भी प्यार मिला. आंद्रे ड्यूश प्रकाशन-गृह की डायना अथिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि प्रकाशक और लेखक की दोस्ती एक विरल घटना होती है, लेकिन वह असंभव भी नहीं होती. मैं इस मामले में ख़ुद को ख़ुशकिस्‍मत समझती हूं कि प्रकाशक और लेखक की दोस्ती की इस असहज विरासत के बावजूद और प्रेम और घृणा के झटकों के बीच लेखकों के साथ मेरी दोस्ती बरक़रार रही.

हमारा घर दुबारा कविताओं, नोकझोंक, गीतों, लतीफ़ों और बहस-मुबाहिसे की आवाज़ों से आबाद होने लगा. शायद ही कोई साल जाता था जब राजकमल के लेखकों को साहित्य अकादेमी न मिलता हो और इसके उपलक्ष में मुशायरे या रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन न किया जाता हो. यहां यह बताना ग़ैर-मुनासिब न होगा कि राजकमल के बीस लेखक साहित्य अकादेमी के पुरस्कार से नवाज़े जा चुके थे. मुलाक़ात करने के लिए बहाने बनाने की ज़रूरत नहीं रह गयी थी. इन महफिलों में हिंदी और उर्दू गलबहियां करती थीं. शुरू में हिंदी और उर्दू वाले एक-दूसरे के साथ बड़े औपचारिक ढंग से बैठते थे. उनके बीच जैसे दूर की रिश्तेदारी का संदेह और अविश्वास छाया रहता था. इसके बाद भले ही वे एक-दूसरे के काम और सोहबत से खिंचे-खिंचे रहते हों लेकिन धीरे-धीरे उनके बीच जमी बर्फ पिघलने लगी थी.

भारत के उर्दू शायरों के दीवान पाद-टिप्पणी सहित छापने की परंपरा सबसे पहले राजकमल ने ही शुरू की. हमने भारतीय शायरों के अलावा अपने शहर लाहौर के शायर फ़ैज़ साहब के कलाम को देवनागरी और उर्दू लिपि में पहली बार शाया किया. उनका यह दीवान न केवल ख़ूबसूरत और मौजूदा दीवानों से हट कर था, बल्कि उसमें हिंदी और उर्दू एक-दूसरे की बगल में बैठी थीं. मेरे लिए यह व्‍यक्तिगत तौर पर भी ख़ुशी की बात थी क्‍योंकि इन महफिलों में अब हरदेव भी शामिल रहने लगा था. वर्ना इससे पहले यह होता था कि जब बाक़ी लोग नागरी प्रचारिणी सभा के राजनीतिक दांव-पेंचों की चर्चा में मशगूल रहा करते थे तो वह मौक़ा मिलते ही ड्राइंग रूम से बाहर खिसक जाता था.
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राजकमल प्रकाशन द्वारा साहित्य की महान विभूतियों के रचना-समग्र को ग्रंथावलियों के रूप में प्रकाशित करने की पहल एक तरह से धार्मिक पोथियों के पुनर्मुद्रण की परंपरा का पुनराविष्कार था. इसके पीछे हमारा मक़सद हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले जीवित रचनाकारों की कृतियों का एक अभिलेखागार तैयार करना था. इस सिलेसिले की शुरुआत हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की ग्रंथावली से हुई. ग्रंथावली का संपादन उनके सुपुत्र मुकुंद ने किया था. लखनऊ में आयोजित एक सादे से समारोह में इसका लोकार्पण वीपी सिंह ने किया था. पंत रचनावली के लिए मैंने प्रकाशन से पहले ही अग्रिम ऑर्डर ले लिया था. तब लोगों को पता भी नहीं था कि अग्रिम ऑर्डर लेना किसे कहते हैं. हमारे लिए यह एक ज़बरदस्त कामयाबी थी. ग्रंथावली प्रकाशित करना एक महंगा सौदा था लेकिन पुस्तकालयों की ख़रीद ने मुझमें विकट जोश भर दिया. बाद में हमने परसाई, मुक्तिबोध, रेणु, बच्चनजी आदि पर भी ग्रंथावलियां प्रकाशित कीं. लेकिन, ज़हनी तौर पर मुझे सबसे ज़्यादा ख़ुशी सआदत हसन मंटो की संकलित रचनाएं छाप कर हुई. रिटायरमेंट के वक़्त मैं इस्मत चुग़ताई के संचयन पर काम कर रही थी.

राजकमल ने समकालीन रचनाओं के चुनिंदा संकलन भी प्रकाशित किये. इस श्रृंखला की किताबों का मूल्य बहुत कम रखा गया था. सच बात यह है कि हमारी हर पहल कामयाब हो रही थी. नयी कहानियां राजकमल के मुखपत्र जैसी थी. आज के अनेकानेक प्रतिष्ठित लेखकों की पहली कहानी इसी पत्रिका में छपी थी. यहां यह याद रहे कि मैं सातवें दशक में पत्रिकाओं के क्षेत्र में होने वाली उस क्रांति से पहले के दिनों की बात कर रही हूं जब हिंदी में धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, हंस, दिनमान और शायद गृहशोभा के अलावा पत्रिका के नाम पर कुछ ख़ास नहीं था.

हमने साहित्य के नोबेल-विजेताओं और अस्तित्ववादी साहित्य के अनुवाद का सिलसिला भी जारी रखा. यह इसी मुहिम का नतीजा था कि अब हिंदी के पाठक अल्बेर कामू को महज़ आठ रुपए में पढ़ सकते थे. यह सच है कि समाज-विज्ञान की किताबों के मामले में हमारी फ़ेहरिस्त बहुत ख़ास नहीं रही, लेकिन यहां भी हमने कभी उत्कृष्टता से समझौता नहीं किया. जहां तक मुझे याद पड़ता है, कोसंबी, रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, सुमित सरकार तथा रामशरण शर्मा सहित अन्य विद्वानों को सबसे पहले राजकमल ही हिंदी में लाया था. अंग्रेज़ी में पहले से प्रकाशित इन किताबों को हिंदी के पाठकों ने हाथों-हाथ लिया.

मैं इस बात को इसरार के साथ दोहराना चाहती हूं कि हिंदी के प्रकाशन जगत में अगर मेरा कोई भी योगदान है तो वह कुल इतना है कि मैंने राजकमल के पुराने मालिकों- देवराज और ओमप्रकाश द्वारा डाली गयी उत्कृष्टता और स्तरीयता की परंपरा का प्राणपण से निर्वाह करते हुए उसमें इज़ाफ़ा किया. राजकमल का विस्तार होने पर देवजी ने अमृतसर में कपड़ों का व्यापार कर रहे अपने भाई ओमप्रकाश को वहां का काम बंद करके दिल्ली कूच करने के लिए कहा. ओमप्रकाश दूरदृष्टा भी थे और सृजनशील भी. उन्हें जोखिम उठाना अच्छा लगता था. राजकमल को आज भी जिस गुणवत्‍ता के लिए जाना जाता है उसे क़ायम रखने तथा कई श्रृंखलाओं की शुरुआत करने का श्रेय उन्हीं को जाता है. मैं ओमप्रकाश जी द्वारा बनाई गयी लीक से कभी नहीं डिगी. जब ज़रूरी हुआ तो उसे आगे ज़रूर बढ़ाया. दुर्भाग्य की बात यही थी कि जब अमेरिकी पीएल-480 फंड का विवाद सामने आया तो अरुणाजी के साथ टकराने वाले ओमप्रकाश जी ही थे. हरदेव भी इसी समय विवाद में कूदा था.

मुझे अफ़सोस है कि मोहन राकेश से दोस्ती के बावजूद मैं राजकमल से उसकी केवल एक ही किताब प्रकाशित कर सकी. वैसे इसकी वजह यह थी कि मोहन राकेश किसी पुरानी दोस्ती के तकाज़े से बंधे थे. यही अड़चन वात्स्यायन जी के साथ आयी- राजकमल के सलाहकारों के वैचारिक रुझान के साथ उनकी भी पटरी नहीं बैठी. (मैं यह नहीं कह सकती कि कुछ लेखक राजकमल के साथ इसलिए नहीं आये क्‍योंकि उन्हें मेरी मौजूदगी अच्छी नहीं लगती थी. मुमकिन है कुछ और भी वजहें रही होंगी जिनके बारे में मुझे ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया.)

राजकमल के पास जब लोग नीलकमल और कटी पतंग जैसी किताबें छापने का प्रस्ताव लेकर आते थे और अपनी फज़ीहत करवा कर लौटते थे तो मैं ख़ुशी से झूम उठती थी. उन दिनों राजकमल में युवा फि़ल्मकार खूब आया करते थे और अपने झोलों में राग दरबारी, मित्रो मरजानी, तमस और नेताजी कहिन जैसी किताबों का ज़खीरा उठा कर ले जाते थे.

बुद्धिजीवियों के साथ वामपंथी दलों का संबंध हमेशा एक अजीब विकृति का शिकार रहा है. बुद्धिजीवियों के ऊपर इन दलों का शिकंजा कुछ इस तरह कसा रहता है कि उनकी बात पके-पकाये लोगों के दायरे से आगे नहीं जा पाती. यह एक जानी-मानी बात है कि इन दलों ने सार्थक मुद्दों के बजाय औसत लोगों, फूहड़ और अप्रासंगिक मुद्दों को बढ़ावा दिया है. इससे एक ऐसी संस्कृति को प्रश्रय मिला जिसमें नौकरीबाज़ी और निजी स्वार्थों का घटाटोप बढ़ता गया. मैं ख़ुद को भी इस चूक से बरी नहीं करती. यह जगजाहिर है कि अरुणाजी या मैं जिस लड़ाई को लड़ना चाहती थी, उसका वामपंथ ने कभी समर्थन नहीं किया.

यह देख कर गहरा दुख होता है कि वामपंथ को न यह पता है कि राजनीति क्‍या होती है और न इस बात का शऊर है कि साहित्य और कला के क्षेत्र में राजनीति कैसे की जाती है. मुझे नहीं पता कि वामपंथ अब प्रगतिशील साहित्य के प्रकाशकों के साथ किस तरह का सुलूक करता है या वे प्रकाशक ख़ुद उन ज़ख्मों को किस तरह देखते हैं जो उन्हें वामपंथ की स्थापित पार्टियों से मिले हैं. पता नहीं कि वे लोग अब भी दोस्तों से किनारा करते हैं या उनकी तरफ़ प्यार का हाथ बढ़ाते हैं! कभी सोचती हूं कि अगर कॉमरेड जोशी की ज़रा कम शुद्धतावादी लेकिन खुली और बहुलताओं से भरी सोच सफल हो पाती तो क्‍या यह मंज़र कुछ दूसरी तरह का नहीं होता!

बहरहाल, राजकमल की ताक़त यह थी कि साहित्य और उसके आलोचना-शास्त्र के प्रति उसका सरोकार कभी डगमगाया नहीं. साहित्य-आलोचना को समर्पित इसकी पत्रिका आलोचना चार दशकों तक चलती रही. इन बरसों में इसका सफ़र बेशक ऊबड़-खाबड़ रहा, लेकिन इसके संपादकों, सहयोगियों और ख़ुद प्रकाशक की साझी अनिश्चितताओं को देखते हुए इसका निकलते रहना ही कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी. अभी पिछले दिनों सुनने में आया कि इस पत्रिका की पारी दुबारा शुरू हो गयी है. हमारी आलोचना पुस्तक परिवार की योजना ख़ास कामयाब नहीं रही. हमने इसे अन्य भाषाओं में प्रचलित बुक क्लब के ढर्रे पर शुरू किया था. लेकिन, हिंदी-पाठकों की आदत बंगाली, मराठी और मलयालम के पाठकों से अलग थी.

हम अपनी मासिक गृह-पत्रिका प्रकाशन समाचार में विज्ञापित किताबों के ऑर्डर पर पाठकों को पैंतीस प्रतिशत छूट दिया करते थे.  इसके अंतर्गत हम पाठकों को हार्डबाउंड की सूची में शामिल किताबें पेपरबैक जि़ल्द में देते थे. यह एक ऐसा काम था जिसमें बिल बनाने की क़वायद बहुत टेढ़ी थी. राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और उत्‍तर प्रदेश के गांव-जवार में छोटे-छोटे मूल्य के पैकेट भेजना आफ़त भरा काम था. इस काम में डाक-विभाग और रेलवे के बाबुओं से बहुत चख-चख करनी पड़ती थी. लेकिन, जब भी हम इस दिमाग़ खाऊ योजना को बंद करने की सोचते तो हमें उन अनगिनत पाठकों के धन्यवाद से भरे पत्र याद आने लगते. इस योजना की तमाम ख़तोकिताबत और किताबें भेजने का काम रामगोपालजी के जि़म्मे था और योजना को बंद करने की बात उठते ही वे सत्याग्रह पर उतर आते थे. एक समय इस योजना के सदस्यों की संख्या एक हज़ार से ऊपर पहुंच गई थी. नये प्रबंधन ने आते ही सबसे पहले इसी योजना का ख़ात्मा किया. यह कभी भी मुनाफ़ा देने वाली योजना नहीं थी. उसे संभालना बहुत कसालत का काम था लेकिन राजकमल के लिए यह एक सरोकार था.
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जब भी सरकार की ओर से बड़ी ख़रीद का ऑर्डर आता तो न जाने कहां-कहां से दलाल और चालू पुर्जों की फ़ौज निकल आती. उनका काम सिर्फ़ पैसा कूटना होता था. मुझे याद है कि जब राजीव गांधी की सरकार ने ऑपरेशन ब्‍लैकबोर्ड शुरू किया तो हमारे पास भी एक ऐसा प्रस्ताव आया जिसमें ज़रा सी आपसी 'समझदारी' राजकमल को करोड़ों का मालिक बना देती. प्रस्ताव के तहत हमें कुछ ऐसी किताबों की डिलीवरी करनी थी जिन्हें छापने की ही ज़रूरत नहीं थी! उन्हें ऐसे स्कूलों में भेजा जाना था जिनका अस्तित्व ही नहीं था और उन्हें ऐसे बच्चों को पढ़ना था जो मौजूद ही नहीं थे! दलाल की बात सुनकर मैं ग़ुस्से से पागल हो गयी. मैंने मृदु स्वभाव के लिए जाने जानेवाले कांतिजी को घंटी बजाकर बुलाया और उनसे कहा कि मेरे सामने मेज की दूसरी तरफ़ बैठे उस आदमी को फ़ौरन बाहर का रास्ता दिखाएं! मेरी प्रतिक्रिया देख कर वह आदमी सकते में आ गया. जब बात समझ आयी तो वह अचकचा कर उठा और अपनी धोती संभालते हुए कहने लगा: '... आप काहे को इतनी परेसान हो रही हैं सीला जी?...आप कुछ ठीक नहीं समज पा रही हैं... कहें तो हम सत परकास जी से मिल लें?... राजकमल जैसी वरिष्ठ संस्था को हमारी जरूरत है ही नहीं तो फिर हम कहीं और जाते हैं.'  

जाते-जाते वह आदमी मेरे दफ़्तर के बाहर थूकना नहीं भूला. मैंने प्रधानमंत्री को उनकी योजना में चल रही इन धांधलियों की जानकारी देने के लिए उनसे मुलाक़ात तय की. जब मैंने उन्हें इस गोरखधंधे के बारे में बताया तो वे हमेशा की तरह मीठे और गबदू अंदाज़ में मुस्कुरा दिये.

बॉलपेन, डिजिटल घडिय़ों, भोजन बनाने के आधुनिक यंत्रों और वर्ड प्रोसेसर को लेकर मेरे मन में गहरा संदेह और लगभग लुड्डाइटों जैसी वितृष्णा थी. मैं उस आधुनिकता को अपने दफ़्तर में क़दम नहीं रखने देना चाहती थी जो जेस्टेटनर साइक्‍लोस्टाइल की जगह ज़ेरॉक्स और रेमिंगटन के द्विभाषी कीबोर्ड से निकलने वाले खट-खट-खटाक की आवाज़ को हजम कर उसकी जगह वर्ड प्रोसेसर रख देना चाहती थी (मानो लिखने का काम हाथ के बजाय पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक काम बनाया जा सकता हो!) हमने कभी हस्तलिखित पाण्डुलिपियों को स्वीकार करने से इंकार नहीं किया. अजीताजी इन पाण्डुलिपियों को जतन से टाइप करती थीं. फिर लेटर प्रेस में उनका प्रूफ़ चेक किया जाता था. इसके बाद टंकित की गयी पाण्डुलिपि लेखक को सौंप दी जाती थी.

हम किताबों के ब्‍लर्ब, प्रचार और आवरण का मसला तय करने से पहले हमेशा लेखक की राय भी लेते थे. जब प्रोडक्शन के बाक़ी पहलुओं पर लेखक से सलाह करने की स्थिति नहीं बन पाती थी तब भी मैं इस बात का ख़याल रखती थी कि लेखक जब चाहे अपनी किताब के प्रकाशन से जुड़ी हर संभव जानकारी लेता रहे. फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स की लंबे समय तक पहली और अकेली महिला सदस्य होने के दौरान मैंने कई दफ़ा यह मुद्दा उठाया कि लेखकों का भरोसा जीतने के लिए उनकी रॉयल्टी का बही-खाता पारदर्शी रखा जाना चाहिए. लेकिन लोगों ने मेरी बात पर कभी ध्यान नहीं दिया. ज़ाहिर है कि प्रकाशकों के फ़ोरम में इस बात को ज़्यादा तवज्जो नहीं मिलने वाली थी!

हमारी किताबें इलेक्ट्रॉनिक नहीं होती थी. वे अभी भी डिस्क के बजाय किराये के गोदामों में मीलों लंबी शेल्फों पर रखी जाती थीं. इन किताबों को सुरक्षित रखने के लिए हम हर छह महीने बाद 'कूची' फेरने और पन्नों के जोड़ पर चिपकी 'लेई' को चूहों से बचाने के लिए कीटनाशक छिडक़ाव का कार्यक्रम बनाते थे. आज यह बात कुछ अजीब और हास्यास्पद लग सकती है, लेकिन उन दिनों जब इस अभियान को पूरा करने के बाद सिर से पांव तक धूल में सने मिश्राजी गोदाम से छींकते और खांसते बाहर आया करते थे तो उन्हें देख कर लगता था कि जैसे हमारे सामने कोई भूकंप का मारा आदमी आ रहा है.

तीस से ज़्यादा कर्मचारियों के उस दफ़्तर में सत्‍तजी की मौजूदगी एक धीर-गंभीर, कमाऊ और अटल आदमी की हुआ करती थी. उनकी यह मौजूदगी दफ़्तर के रोज़मर्रा के तनावों पर हमेशा भारी पड़ती थी. कलकत्‍ता से आने के बाद मोहन गुप्त ने संपादन का काम इस तरह हाथ में लिया कि अंतत: संपादक-उत्पादन प्रबंधक की जि़म्मेदारी उन्हीं को दे दी गयी. मेरा मानना है कि हिंदी के प्रकाशन जगत में उन जैसा संपादक और प्रबंधक आज तक नहीं हुआ. उनमें कोई और दोष भले हो लेकिन उत्साह के मामले में वे बेमिसाल थे. उनके लिए दफ़्तर का समय काम बंद करने का समय नहीं होता था. विक्रय विभाग में काम करने वाले लोगों के साथ उनकी हमेशा ठनी रहती थी. संपादकीय विभाग की हर नयी पहल को विक्रय विभाग वाले बेकार और फालतू कह कर ख़ारिज कर देते थे. ऐसी किसी भी पहल को वे 'पत्थर का अचार' कह कर हवा में उड़ा देते थे.

मेरा सबसे गहरा अफ़सोस यह है कि उत्‍तर भारत के मध्यवर्ग के पास हिंदी की साहित्यिक संपदा तक पहुंचने या उसका सम्मान करने की क़ाबिलियत नहीं है. मेरे तीनों बच्चे भी इसका अपवाद नहीं रहे. उन्हें भी इस बात का इल्म नहीं है कि यह कमी उनके बौद्धिक और भावनात्मक जीवन को किस तरह एकांगी बना देती है. उनके पास हिंदी के प्रति मेरी भावनाओं में शामिल न होने का कोई न कोई कारण हमेशा मौजूद रहा. हमने उस वक़्त हाल-फिलहाल दिल्ली लौटी अपनी दूसरी बेटी पर दबाव बनाने की कोशिश की कि वह अपना पति ढूंढऩे तथा एक और डिग्री हासिल करने की अंतहीन खोज बंद करे और किसी भी ख़ुदमुख्‍़तार औरत की तरह अपने करियर पर ध्यान लगाए. वह जब बच्ची थी, तब भी इसी तरह उद्दंड थी. वह चीज़ों पर बेसाख्‍़ता और अपने हिसाब से राय दिया करती थी. मुझे उसका यह बर्ताव बर्दाश्त नहीं होता था. मैं यह बात बहुत जल्दी समझ गयी थी कि हम दोनों के मिज़ाज बहुत अलग तरह के हैं, इसलिए दरियागंज के दफ़्तर की राजनीति को देखते हुए उसका वहां आना नयी आफ़तों को बुलावा देना था.

मेरी अगर कोई चाहत थी तो केवल इतनी थी कि प्रकाशन जिंदाबाद रहे. उसका पूरा ध्यान पेपरबैक विभाग पर था. वह अपने पूरे जोशोख़रोश से राजकमल पेपरबैक के आवरण डिजाइन करने में मशगूल थी. पेपरबैक के आवरण का यह ख़याल उसने पेंगुइन क्‍लासिक्‍स से लिया था. हिंदी में प्रकाशित होने वाली किताबों के आवरणों पर मक़बूल फि़दा हुसैन, रामकुमार, स्वामीनाथन, अकबर पद्मसी, तैय्यब मेहता, फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा, कृष्ण खन्ना जैसे स्थापित चित्रकारों और नौजवान पीढ़ी के कुछ अल्पचर्चित चित्रकारों- मंजीत, अर्पिता, गुलाम, जोगेन, निलिमा, शमशाद, परमजीत, अमिताव, विवान और मृणालिनी को लाने का श्रेय उसी को जाता है.

राजकमल में गुज़रा वक़्त मेरे लिए एक बेहद समृद्धकारी अनुभव था. यह मेरे लिए एक ईनाम की तरह था. मेरी शिक्षा में जो कमी रह गयी थी, वह राजकमल में आकर दुरुस्त हो गयी. मैं जब तीस बरसों की तरफ़ पलट कर देखती हूं तो इत्मीनान और ख़ुशी से भर उठती हूं. मुझे किसी बात का अफ़सोस नहीं है. अगर जि़ंदगी दुबारा मौक़ा दे तो मैं फिर वही सब करना चाहूंगी.

हिंदी की संकीर्ण परंपरा ने शुरू में मुझे स्वीकार नहीं किया. वजह यह थी कि मर्दों की दुनिया में मैं अकेली औरत थी- वह भी आधुनिका और पश्चिम के तौर-तरीकों में रची-बसी. लेकिन फिर धीरे-धीरे मेरे साथ जुड़ा यह अनोखापन और कौतूहल ही मेरी ताक़त बनता गया.

# अनुवादक, लेखक नरेश गोस्वामी सीएसडीएस द्वारा प्रकाशित समाज विज्ञान की पत्रिका प्रतिमान में सहायक संपादक हैं. आपने अभय कुमार दुबे के संपादन में राजकमल से प्रकाशित समाज विज्ञान विश्वकोश में पैंसठ प्रविष्टियों का योगदान दिया है. भारतीय संविधान की रचना-प्रक्रिया पर केंद्रित ग्रेनविल ऑस्टिन की क्लासिक कृति 'द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन: कॉर्नरस्टोन ऑफ़ अ नेशन' का हिंदी अनुवाद 'भारतीय संविधान: राष्ट्र की आधारशिला' नाम से प्रकाशित.

 

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