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जयंती विशेषः ग़ज़ल की इन्‍कलाबी फसल पैदा करने वाले शायर अदम गोंडवी

अदम गोंडवी का होना शायरी के उस मिजाज़ का अवतरण है, जिसने सत्ता का कभी मुँह नहीं जोहा, जीवन में कभी समझौते नहीं किए. अदम की जयंती पर उनकी शायरी और शख्‍सियत पर एक तहरीर

अदम गोंडवी [ फाइल फोटो] अदम गोंडवी [ फाइल फोटो]

ग़ज़ल का ककहरा सीखने वाला भी ग़ज़ल की दुनिया में जिन दो नामों से पहले से ही वाकिफ़ होता है वे हैं दुष्‍यंत कुमार व अदम गोंडवी. दुष्‍यंत आपातकाल के दौर में लिखी अपनी ग़ज़लों से मकबूल हुए तो अदम आजादी के बरसों बाद आजादी की फसल काट रहे सरकारी कारिंदों और व्‍यवस्‍था पर करारा प्रहार करते हुए रातोंरात दुष्‍यंत की परंपरा के शायर बन बैठे. उनकी शायरी और शख्‍सियत पर डॉ ओम निश्‍चल की तहरीर.
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एक दौर था, ग़ज़ल के अंत:पुर में कोई नंगे और मटमैले पैरों से प्रवेश नहीं कर सकता था. पर एक दौर ऐसा भी आया कि ठेठ किसानी ठाट में कुर्ता पाजामा सदरी या स्वेटर पहने तथा सिर पर देसी साफा बांधे अदम जब मंच पर शायरी पढ़ने के लिए खड़े होते और सत्ता व्यवस्था को अपनी खुली और वेधक जबान में ललकारते तो लोग पूछते यह देहाती आदमी कौन है. उसके सवाल हिंदी के कवि धूमिल की तरह इतने तीखे होते जिनके जवाब आसानी से नहीं ढूढे जा सकते थे. अदम गोंडवी मंच पर खड़े होकर स्वस्ति वाचन नहीं करते थे. उन्हें अपनी शायरी का कार्यभार पता था. इसीलिए प्राइमरी तक की तालीम के बावजूद अदम ने जो लिखा उसके मंतव्यों की पड़ताल के लिए आज जगह-जगह शोध हो रहे हैं. वे धरती की सतह के शायर थे. उनकी बात को काटा नहीं जा सकता था. वे नेताओं की हकीकत जानते थे तभी दावे से कहते थे-
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़ा झूठा है ये दावा किताबी है
जनसेवकों की शाल और माला पहनने की लत उनसे छुपी न थी. उन्होंने इस लत को एक ग़ज़ल में ढाल कर यों कहा-
एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छै चमचे रहें, माइक रहे, माला रहे.

बीते सालों में पंचायती राज को चाहे जितना लोककल्याणकारी बनाने की कोशिशें की गयी हों, वे जानते थे कि परधानी के चुनावों ने क्या बवाल काटा है. हिंसा की बुनियादी सीख इन्हीं चुनावों ने दी है. गोंडा की कच्ची ज़मीन ने उन्हें जीवन की दुश्वारियों से लड़ना सिखा दिया था. ऐसे जनसेवकों के लिए उनके मन में नफरत भर चुकी थी. वे कहा करते थे-
जितने हरामखोर थे कुर्बो जवार में
परधान बन के आ गए अगली क़तार में.
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दुष्‍यंत की परंपरा के शायर
अदम गोंडवी ने चुनिंदा कोई सौ ग़ज़लें लिखीं पर मिलते-जुलते महज दो संकलनों के बलबूते ग़ज़ल के नामचीन हस्ताक्षरों के बीच अपनी जगह बनाई. उनका होना शायरी के उस मिजाज़ का अवतरण है, जिसने सत्ता का कभी मुँह नहीं जोहा, जीवन में कभी समझौते नहीं किए. दुष्यंत कुमार के बाद ग़ज़लों की दुनिया में ऐसी कोई शख्सियत नहीं थी जो उनकी जगह ले सके. इसीलिए बरसों बाद जब ग़ज़ल की दुनिया में अदम का आगमन हुआ तो उन्हें दुष्यंत की परंपरा का शायर और धूमिल की परंपरा का कवि मानने की वजह थी. अदम ग़ज़लों में उसी साफगोई के साथ अवाम के नाम एक नया पैगाम लिख रहे थे, जिस तरह धूमिल हिंदी कविता में अपने नाराज़ तेवर के साथ आए, तो अकविता की अराजक मुद्राओं से आच्छादित हिंदी कविता की धारा ही लगभग बदल गयी. धूमिल के बागी तेवर ने कविता को एक विस्फोटक की तरह रचा जहां किसी भी तरह के मानवीय अपकर्ष के विरुद्ध कविता के नए मुहावरे में वे लोकतंत्र की गड़बड़ियों की मुखर आलोचना कर रहे थे. अदम की शायरी को पढ़ते हुए धूमिल के तेवर का हल्का सा आभास मिलता है. लगता है अदम अपनी शायरी में धूमिल की 'पटकथा' का मिजाज पैदा कर रहे हैं. दुष्यंत ने कई विधाएं आजमायीं, उपन्यास, कहानी, कविता, गीत और ग़ज़ल. लेकिन मकबूलियत उन्हें लगभग 64 पेजी गजलों के संकलन 'साये में धूप' से ही हासिल हुई. उनकी तुलना में मामूली पढ़े-लिखे अदम ने केवल ग़ज़ल का दामन थामा और थोड़े ही दिनों में दुष्यंत की तरह उनकी भी कई ग़ज़लों के अशआर जबान पर चढ़ गए. आपातकाल की जमीन पर लिखी दुष्यंत की ग़ज़लें जैसे आम आदमी की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गयीं, वैसे ही अदम की ग़ज़लों में इस मुल्क की लुटी-पिटी तस्वीर साफ दिखाई पड़ती है.

आज से लगभग दो दशक पहले अदम गोंडवी की कुछ ग़ज़लें पढ़ने को मिली थीं. गोंडा के एक छोटे से गांव से ऊपर उठ कर अदम का यश भूमंडलव्यापी हो उठा था. कोई नहीं जानता था कि खसरा खतौनी में रामनाथ सिंह के नाम से जाना जाने वाला यह शख्स ग़ज़ल के आँगन में आग बिखेरने वाला अदम गोंडवी है. उनकी मकबूलियत का आलम यह है कि सियासत से लेकर अदब से ताल्लु़क रखने वालों तक की जबान पर अदम के शेर विराजते रहे हैं. ग़ज़ल की परंपरा में दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें एक मोड़ मानी जाती हैं तो अदम की ग़ज़लें एक दूसरा मोड़ अख्ति़यार करती हैं, जिसमें एक साथ वे स्थानीयता से लेकर बाजारवाद और भूमंडलीकरण तक से संवाद करते हैं.
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ग़ज़ल की इन्कलाबी फसल
अदम गोंडवी का बुनियादी काम यों तो खेती-किसानी रहा है किन्तु इस काश्तकार ने ग़ज़ल की भी एक इन्कलाबी फसल बोई है, जिसके चाहने वाले पूरे देश में फैले हैं. दशकों पहले से उनकी गजल के इस इन्कलाबी मिसरे-
काजू भुने है प्लेट में व्हिस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में’
- ने अचानक उन्हे सियासतदां और अदबी इलाके में चर्चा में ला दिया था. अदम अभावों की धूसर दुनिया से वाबस्‍ता ऐसे नागरिक थे जिन्हें देखकर आप यह मान ही नहीं सकते थे कि वे ही हमारे समय के अविस्मरणीय कवि अदम हैं. अपने तआरूफ में सरस्‍वती के इस गंवई कवि ने यही लिखा कि:
फटे कपड़ों में तन ढाँके गुजरता हो जहाँ कोई
समझ लेना वो पगडंडी अदम के गाँव जाती है.’
 
आजादी के इतने  दशकों बाद भी गावों के हालात नहीं बदले है. पूंजीपतियों व सरकारी कारिन्दों की दया से मुल्क में रिश्वत और कमीशनखोरी भी उत्तरोत्तर परवान चढ़ी है. इस पर अदम का कटाक्ष देखें-
जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे.
‘आजादी की व्यर्थता पर अदम पूछते हैं-
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखके हाथ कहिए देश क्या आजाद है?

आजादी को लेकर अस्सी के दशक के प्रारंभ में ऐसे ही जलते हुए सवाल धूमिल और लीलाधर जगूड़ी ने उठाए थे. सरकारी विज्ञापनों की भाषा उस प्रसाधन की तरह है जो भले ही मुल्क की झुर्रियों को कास्मेटिक्स के मुलम्मे से ढंकने का विफल प्रयास करता है, किन्तु अदम जैसा शायर इस रंग-रोगन को पहचान ही लेता है. उनकी ग़ज़लों में जो आग है, इन्कलाबी तेवर है, वह इसी समाज और व्यवस्था की खराबियों की देन है. अदब से महज किताबी रिश्ता न रखने वाले अदम गोंडवी की ग़ज़ल गरीबी, बेरोजगारी, भूख और आम आदमी के पक्ष में आवाज उठाती है. वह जिले के बड़े से बड़े हाकिम की कारगुजारियों से लेकर बड़े ओहदेदारों और सरमायेदारों तक से नहीं घबराती और गांव के सामंतवादी रवैये को ‘चमारों की गली’ जैसी ऐतिहासिक नज़्म में शब्द बद्ध करती है. दलितोत्पीड़न की इससे बड़ी मारक कविता शायद ही मिले, लेकिन विमर्शों की विलासिता में खोए रहने वालों को शायद ही इसकी परवाह हो.
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जबान पर अदम के अशआर
अदम गोंडवी 22 अक्‍तूबर, 1947 को उत्‍तर प्रदेश के ग्राम आटा परसपुर गोंडा में जन्‍मे तथा महज 64 साल की उम्र में बीमारी से लड़ते हुए संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्‍थान लखनऊ में 18 दिसंबर, 2011 को हमारे बीच से सदा के लिए रुखसत हुए तो अदब की दुनिया में जैसे सन्नाटा-सा खिंच गया. किसानों, मजदूरों, मजलूमों और जन सरोकारों से जुड़े सवाल उठाने वाला शायर सदा के लिए इस धरती से उठ गया. ठेठ किसानी चेतना की वजह से समकालीन शायरों के बीच वे अलग से पहचाने जाते थे. उनके महज दो संग्रह छपे. एक 'समय से मुठभेड़' नाम से, दूसरा 'धरती की सतह पर' नाम से. पर सच पूछा जाय तो दोनों संग्रहों की ज्‍यादातर गजलें एक ही हैं. 'समय से मुठभेड़' वाणी से आया तो गोंडा से प्रतापगढ़ आते जाते अनुज प्रकाशन के आग्रह पर दूसरा संग्रह दिया जो 'धरती की सतह पर' के नाम से 1987 में आ चुका था, पर बरसों से अप्राप्य था. पुन: वह 2010 में अनुज प्रकाशन प्रतापगढ़ से नए कलेवर में छपा और अब यह यश पब्लिकेशंस और अनुज प्रकाशन के संयुक्‍त सहकार में छपा है. ग़ज़ल जिस रवायत में पली और ढली है, अदम गोंडवी की ग़ज़ल ने उससे हट कर रास्ता अख़्तियार किया. यह दुष्यंत और अदम गोंडवी की गजलों का संक्रमण ही है कि राजनीति के दिग्गज अपनी राजनीतिक सभाओं में और बौद्धिक जन अदबी महफिलों में उनकी ग़ज़लें अक्‍सर उद्धृत करते देखे जाते हैं. कहना न होगा कि मुक्तिबोध और धूमिल ने कविता की जनवादी तहरीर लिखने का काम किया, तो ग़ज़ल में दुष्यंत और अदम ने. उन्‍हें 1998 में दुष्‍यंत कुमार अलंकरण से नवाजा गया तथा समय-समय पर अन्‍य पुरस्‍कारों से. उनके लड़के आलोककुमार सिंह गांव में खेतीबारी संभालते हैं तो उनके ही एक भतीजे दिलीप कुमार सिंह 'चंद गोंडवी' के नाम से शायरी के पथ पर अग्रसर हैं.  

प्रकृति के सुरम्य परिवेश में भले ही कहीं वर्ड्सवर्थ और सुमित्रानंदन पंत जैसे कवि पैदा होते हों, किन्तु जिसके गांव का परिवेश संतप्त हो और आम जनता भुखमरी की धूप में संतप्त हो, ऐसे परिवेश में राग और रोमान की बातें करने वाला कवि पैदा नहीं हो सकता था. जिन्होंने गांव का परिवेश शीर्षक उनकी नज्म पढ़ी है उन्हें बताने की जरूरत नहीं कि अपने छल बल से गांव के गरीबों का शोषण करने वाली शक्तियों एवं धार्मिक पाखंड के नाम पर भयादोहन करने वाले पंडे-पुरोहितों के विरुद्ध उनकी नज्मे इन्कलाब का आह्वान करती हैं. वे कहने के लिए क्षत्रिय थे पर जब 'चमारों की गली' नामक नज़्म लिखी तो अदब की दुनिया में जैसे हंगामा सा मच गया. अपने ही गांव परिवेश के ठाकुरों की बदमिजाजी पर चोट करते अदम को तनिक भी संकोच न हुआ. वे कवि होने के कारण जातीय स्वाभिमान से ऊपर उठ चुके थे. यह नज़्म अपनी ही बिरादरी से दुश्मनी मोल लेने के लिए काफी थी. लेकिन अदम को इसकी परवाह न थी. आज भी दलितों के शोषण और बलात्कार पर इतनी तेजाबी नज़्म शायद ही किसी अन्‍य दलित-ललित कवि-शायर ने लिखी हो.
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हक़ीकत से मुठभेड़
अदम सपने देखने वाले कवि नहीं थे. वे हकीकत की जमीन पर खड़े होकर बात करते हैं.  वह भोग और ऐश्वर्य को पीठ दिखाने वाले कवियों में हैं. उनके सरोकारों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे खुद पूछ लेते हैं-
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है...
अदम उस भोली भाली दुनिया के नागरिक थे जो खेती किसानी में रमा रहता है. देश के योजनाकारों से होती हुई कोई योजना उसके गांव तक पहुंचती भी है तो इतने बंदरबाट के बाद रुपये में दस पैसे ही पहुंच पाते हैं. इसीलिए शायद अपने पिछड़े जनपद के धूलधूसरित गांव में रहते हुए उन्होंने जो भी लिखा उसमें हमारे समय के विचलनों की सच्ची तस्वीर नुमायां है. देश के जननायकों का हाल उनसे छुपा न था. यह उनकी दृष्टि में चमचों, माइक और मालाओं से घिरी रहने वाली कौम है. लिहाजा इन सबके लिए उनके मन में कोई आदर न था. उनकी आवाज में जनता जनार्दन की आवाज़ सुनाई पड़ती है.

जिस देश में इतनी दुरवस्थाएं हों, आर्थिक परतंत्रता से बाहर आने की जनता में अनवरत तड़प हो, हाथ में छाले और पैरों में बिवाई हो, फाके में गुजरती शामें हों, ऐसे ही हालात में मुक्तिबोध, धूमिल, दुष्यंत, पाश, गोरख पांडे और अदम गोंडवी जैसे कवि पैदा होते हैं. अपनी ग़ज़लों में उन्होंने इसलिए अपनी परंपरा और सरोकारों के पक्षधर कवियों को याद किया है. कबीर की भाषा उन्हें जुलाहे की कमान सी तनी नजर आती है तो वामपंथी नागार्जुन उन्हें भीतर से उद्वेलित करते हैं. अदीबों की नयी पीढ़ी से वे धूमिल की विरासत को करीने से सहेजने की गुजारिश करते हैं. ऊपर से देखने पर अदम की गजलों की थीम में एक तात्कालिकता-सी दिखती है किन्तु अपने समय के सच को लिखने वाला कवि ही जनता में समादृत होता है. कबीर ने अपने समय के पाखंड को लिखा तो मुक्तिबोध ने अपने समय के पाखंड को. दुष्यंत की ‘जलते हुए वन का वसंत’ की कविताएं नहीं, ‘साये में धूप’ की ग़ज़लें मकबूल हुईं क्योंकि आपातकाल की तल्खी उनकी गजलों में मुखरित हुई है.

अदम गोंडवी ने भी राजनीति और आम आदमी की नियति को अपनी शायरी के केंद्र में रखा. पर पता नहीं क्यों वे अपने आखिरी दिनों में राजनीतिक मुद्दों पर बात करने में कतराते थे. एक बातचीत की मुसल्सल कोशिश में वे मुझसे लगातार यही कहते रहे कि अब राजनीति पर बहुत हो चुका, अब साहित्यिक मुद्दों पर बात करें. बातचीत अंतत: किसी कारणवश नहीं हो सकी यह बात और है पर लगता है वे अब अपने आजमाए हुए रास्ते से अलग चलना चाहते थे. वे जीवित होते तो निश्चय ही ग़ज़लों की मौजूदा तासीर बदल चुकी होती.

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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि-आलोचक व भाषाविद हैं. तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित. हिंदी अकादमी दिल्ली के युवा कविता पुरस्‍कार, उ.प्र. हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्का‍र, विचारमंच कोलकाता के प्रो. कल्याणमल लोढ़ा साहित्य सम्मान एवं जश्ने अदब के शाने हिंदी खिताब से समादृत हैं. संपर्क: जी-/506 ए, दाल मिल रोड, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059. मेल: dromnishchal@gmail.com

 

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