scorecardresearch
 

होली 2021 विशेष: राग-रंग की ऋतु है फागुन, आया मौसम मस्ती का

होली केवल रंग, अबीर, पिचकारी और गुलाल का ही नाम नहीं है, यह फगुनहटी बयार और कवियों के कवित्‍त की मस्‍ती में भी ध्‍वनित होता है.

होली के रंग, प्रतीकात्मक चित्र [सौजन्य: Getty Images] होली के रंग, प्रतीकात्मक चित्र [सौजन्य: Getty Images]

होली के दिन पास आते हैं तो जैसे मौसम भी बावरा हो उठता है. होली केवल रंग, अबीर, पिचकारी और गुलाल का ही नाम नहीं है, यह फगुनहटी बयार और कवियों के कवित्‍त की मस्‍ती में भी ध्‍वनित होता है. फागुन और होली पर लिखी कविताओं का जायज़ा लें तो क्‍या खूब छंदों की छटाएं मिलती हैं और क्‍या बॉंकी अदा कहन की कि मन रीझ उठे ऐसे कवियों पर. यहां होली के रंगों में सराबोर होने के बाद भी मन नहीं भरता तभी तो पदमाकर की एक गोपी कृष्‍ण पर अबीर की झोरी उड़ेल कर और पूरी गत बना कर आंखों को नचाते और मुस्‍कराते हुए कहती है: "लला फिर आइयो खेलन होरी!''  यह जो होली की मस्‍ती है वह किसी और त्‍योहार में नहीं है. बसंत भले कुछ दिनों के लिए हो, फागुन दो दिन के लिए किन्‍तु होली रंगभरी मस्‍ती इस मौसम का जैसे उपसंहार है, फलश्रुति है.

भारत ऋतुओं का देश है. एक से एक मनमोहक ऋतुएं. तभी तो कालिदास ने ऋतुओं की महिमा गाई है. यह और बात है कि भारत किसानों मजदूरों का देश है, गांवों में वैसी सुविधाएं नहीं हैं जैसी विदेशी गांवों में पाई जाती हैं इसलिए अति वर्षा, अति सर्दी और अति गर्मी तो सभी को दुखदायी होती है. पर यह जो छह ऋतुओं का समागम है ऐसा समागम शायद धरती पर कहीं और नहीं है. भारत का किसान और मजदूर थोड़े में खुश होना जानता है. वह प्रकृति के प्रकोप सहता हुआ भी जहां जरा सी उत्सवता की आहट मिली, उसका चित्त प्रसन्न हो उठता है. गांव में पंखा नहीं, बिजली नहीं कोई बात नहीं है, वह पेड़ की छाया और जरा सी हवा की हल्की बयार में अपना पसीना सुखा लेता है. शहरों में भले हर दिन किसी के लिए उत्सव और त्योहार का दिन लगता हो पर गांवों में आज भी त्योहार की आभा अलग ही होती है. यह दिन अन्य दिनों से भिन्न होता है. इस एक दिन के त्योहार की लोग बाट जोहते हैं. यह दिन पकवान का होता है. होली है तो गुझिया, खीर, पूड़ी, कचौड़ी, सब्जी , नमकपारे, दही बड़े- गांव की औरतें अपनी हैसियत के हिसाब से होली के व्यंजन तैयार करती हैं. गुझिया इतनी कि पूरे महीने चलें, हुरिहारों की टोली के लिए अलग से स्वागत में गुझिया, अबीर और गुलाल . शौकीन परिवारों में ठंडई का चलन भी है. भांग की गोलियां खाकर हुरिहारों की टोली निकलती है तो पूरी धरा जैसे सुहागन हो उठती है.

फागुन की ऋतु ऐसी ही ऋतु है जब खेतों में बालियां पक रही होती हैं, आमों में बौर आ चुके होते हैं, टिकोरे लग रहे होते , महुआ कूच रहा होता है और तड़के टपकता भी है. सुबह बाग में जाकर देखों तो लगता है ज़मीन पर किसी ने महुए के फूल बिछा दिए हों. उसे नबेर कर खाने का मजा ही और है. महुए के टपकने की गंध पूरी आबोहवा में मह मह बहने लगती है. कहीं बौर-कहीं टिकोरे, सारा मौसम फागुन की उत्सवता से भींग उठता है. ऐसी ही किसी गंवई मस्ती में हरिवंशराय बच्चन ने यह गीत लिखा था :
महुआ के नीचे मोती झरे.
             महुआ के.
घड़ियाँ सुबरन,
दुनियाँ मधुबन,
उसको जिसको न पिया बिसरे.
                   महुआ के,
महुआ के नीचे मोती झरे,
                  महुआ के.
सब सुख पाएँ,
सुख सरसाएँ,
कोई न कभी मिलकर बिछुड़े.
                  महुआ के,
महुआ के नीचे मोती झरे,
                  महुआ के.

यों तो शिशिर से ही फागुन और वसंत की थोडी थोड़ी आहट मिलने लगती है. गुनगुनी धूप सुहावनी लगने लगती है. मौसम में उत्सवता का प्रवेश होने लगता है. यही वह ऋतु है जब आमों में टिकोरे आने लगते हैं: "कहूँ बौरे सरस रसाल बन बागन में, सुखद सुगंध चाह अमित बढावै है". यही वह मौसम है जब होली का त्योहार मनता है:  "लीन्हैं भरि झोरी पिचकारी रंग बोरी आजु होरी, आजु होरी, बरसाने आजु होरी है." बरसाना और ब्रज ही क्या, पूरा का पूरा हिंदुस्तान फागुन के रंग में रंग जाता है. अबीर गुलाल की जुगलबंदी थिरकने लगती है. फागुन के कवित्त लिखने में पदमाकर का कोई सानी नहीं. वे ब्रज की होली का एक मनमोहक चित्र अपने कवित्त में खींचते हैं.
बानगी देखिए वे क्या लिखते हैं-

फागु के भीर अभीरन में गहि, गोविंदै लै गयी भीतर गोरी
भाय करी मन की पदमाकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी
छीन पितंबर कमर में, सु बिदा दई मीड़ि कपोलन रोरी.
नैन नचाइ कह्यौ मुसक्याइ, लला! फिर खेलन आइयो होरी.

 

कवियों ने फागुन और होली की क्या ही खूब महिमा गाई है. यही तो कृष्ण और गोपियों के राग-रंग में बंधने का मौसम है. यही वह ऋतु है जब कृष्ण को रंगने गोपियों की टोलियां रणनीति बनाती हैं और कृष्ण इतने में औचक आकर जब हँस कर गोपी का आंचल पकड़ लेते हैं और कह उठते हैं कि मुझसे कब तक दूर रहोगी क्योंकि निहुरे निहुरे ऊंट की चोरी नही होती तो क्या ही दृश्य बनता है!  उसके लिए साहस से सम्मुख आना होता है. पाठक का चित्त इस कविताई पर रीझ उठता है. इस तरह फागुन सच कहें तो राग रंग की ऋतु है. मिलने जुलने की ऋतु है.

यों तो लोकभाषाओं में सब में अपना अपना रस है. लोक का मन तो लोकभाषाओं में ही रीझता है. पर ब्रज भाषा का तो कहना ही क्या. रसखान ने इस भाषा में कृष्ण लीला का बखान कर इस भाषा को अमर कर दिया. यों तो है यह एक बोली ही, पर कहा इसे ब्रजभाषा ही जाता है. इसका पदलालित्य अपना है, जो दूसरी लोकभाषाओं में नहीं है. ब्रज भाषा का यही पद-लालित्य हमें बांधता है. सूर के पद हमें भाते हैं. हम रसखान के सवैयों पर जान लुटाते हैं. पदमाकर की कविताई पर रीझ उठते हैं. रत्नाकर के अंदाजेबयां पर लुब्ध हो उठते हैं. देव के कवित्त के आगे कविता की कसौटियां फीकी पड़ जाती हैं. कवित्‍त के निष्‍णात कवि लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंक' थे तो अवध के पर ब्रजभाषा के तीन-तीन काव्य रचे. ब्रज भाषा के अनेकानेक कवियों ने ब्रजभाषा के लालित्य को जैसे अपनी कविताई में समेट लिया है. जब जब हम ऐसे काव्य से गुजरते हैं, ब्रज भाषा का लालित्य जैसे द्विगुणित हो उठता है और अनुगूंज बन कर भीतर समा जाता है. भारतेंदु हरिश्चंद्र तो खड़ी बोली के अधिष्ठाता हैं, निर्माता हैं. हिंदी की अनूठी पदरचना से लेकर हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने व खड़ी बोली को साहित्य में प्रतिष्ठित करने का काम किया है. पर उनका ब्रज-काव्य अपने आप में आला दर्जे का है. कृष्ण ब्रज काव्य के केंद्र में हैं. भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक कवित्त देखिए--
देखो बहियाँ मुरक मेरी ऐसी करी बरजोरी.
औचक आय धरी पाछे तें लोकलाज सब छोरी.
छीन झपट चटपट मोरी गागर मलि दीनी मुख रोरी.
नहिं मानत कछु बात हमारी कंचुकि को बँद खोरी.
एई रस सदा रसि को रहिओ ‘हरीचंद’ यह जोरी.

कृष्ण की यह बरजोरी भी जहां गोपियों को रिझाती खिझाती है, वहीं कवियों को भी इसके वर्णन में आनंद मिलता है. खड़ी बोली का यह कवि जो 'रसा' नाम से गजलें भी लिखा करता था, ब्रज भूमि पर ऐसा रीझा कि कह बैठा-
ब्रज के लता पता मोहिं कीजै.
गोपी पद-पंकज पावन की रज जामै सिर भीजै.
आवत जात कुंज की गलियन रूप-सुधा नित पीजै.
श्री राधे राधे मुख यह बर हरीचन्द को दीजै.

यह लालसा वैसी ही है जैसी कभी रसखान के मन में विराजी थी. 'मानुष हौं तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन'. हरिश्चंद्र कहते हैं, 'मुझे तो हे ईश्वर ब्रज का लता पत्र ही बना दीजिए. ऐसा लता पत्र जिस पर गोपियों की चरणधूलि पड़ती रहे और मैं उस पद रस में भीजता रहूँ और इतना ही नहीं, ब्रज की कुंज गलिन में आते जाते गोपियों के रूप सुधा का रस जो पीने को मिलेगा उसका तो कहना ही क्या.' यह है ब्रजभूमि जहां आम आदमियों का चित्त चंचल हो उठता है फिर कवियों का क्या! उन्हें तो निरंकुश कहा ही गया है. कृष्ण हैं तो उनकी मुरली की तान भी है. संगीत का एक सम्यक साज. लिहाजा कवियों को तो वंशी भी काम्य है. न सही कृष्ण, न सही गोपियां, कृष्ण की बांसुरी ही भली. बांसुरी है तो अधरों से इससे निस्सृत सुधारस पीने को मिलेगा, कभी हाथ, कभी कमर पर टिकाए और कभी उसे अधर पर धरने का सुख मिलेगा. हरिश्चंद्र फिर कहते हैं, ''हे विधाता! मुझे तो ब्रज की धूलि ही बना दो और कुछ ऐसा हो जाए कि नैनों में कृष्ण का रुप-रस विराजता रहे'' :  
सखी हम बंसी क्यों न भए.
अधर सुधा-रस निस-दिन पीवत प्रीतम रंग रए.
कबहुँक कर में, कबहुँक कटि में, कबहूँ अधर धरे.
सब ब्रज-जन-मन हरत रहति नित कुंजन माँझ खरे.
देहि बिधाता यह बर माँगों, कीजै ब्रज की धूर.
'हरीचंद' नैनन में निबसै मोहन-रस भरपूर..

पर बंशी भी हो पाना भी क्या इतना सहज है? वंशी ने तो कृष्ण को अपने वश में कर लिया है. रसखान कितने ईर्ष्या दग्ध नजर आते हैं यह कहते हुए कि जब कृष्ण ही बांसुरीमय हो चुके हैं तो ब्रज में हमारा क्या काम? अब तो ब्रज में बांसुरी ही रहेगी और बांसुरी जब तक है कृष्ण किसी के होने वाले नहीं हैं, न गोपियों के न भक्तों के. लिहाजा अब कहीं अन्यत्र भाग चलना चाहिए. देखिए रसखान का यह मलाल-
कान्ह भये बस बाँसुरी के, अब कौन सखी हमको चहिहै.
निसि द्यौस रहे यह आस लगी, यह सौतिन सांसत को सहिहै.
जिन मोहि लियो मनमोहन को, 'रसखानि' सु क्यों न हमैं दहिहै.
मिलि आवो सबै कहुं भाग चलैं, अब तो ब्रज में बाँसुरी रहिहै.

बांसुरी राग-रस और आनन्द की प्रतीक है. कृष्ण की लीलाओं की प्रेरक शक्ति रही है. स्वयं कृष्ण भी राधा और गोपियों के वश में भले न रहे हों पर वे बांसुरी के वश में सदैव रहते रहे. उनका सारा व्यक्तित्व बांसुरी में समा गया था. इस बांसुरी की ही महिमा है कि अवधी कवि 'निशंक' ने एक पूरा ब्रजभाषा काव्य ही 'बांसुरी' नाम से लिख दिया. यों तो 'बांसुरी' के सभी छंद रस में पगे हैं पर होली के पदों का कहना ही क्या. एक होली दृश्य देखिए-
नैननि मैं मुसकात लजात है
बातन सौं रस नावति गोरी
आंगी मैं ओज उरोजन को कसि
अंचल बीच छिपावति गोरी
बेनी के फूलन फांसि लियो मन
मैन हू को ललचावति गोरी
जानै न फागुन मै गुन औगुन
सौ गुन बांधि नचावति गोरी (बांसुरी)

ये हैं ब्रज की छोरियां. जो फागुन में गुन-अवगुन का कोई विचार नहीं करतीं और सौ गुनों से अलंकृत होकर होली में हुरिहारों को नाच नचाती हैं. होली का रस हो, फागुन का मौसम हो तो कवियों को भी लज्जा का वसन उतार फेंकना पड़ता है. हमारे कवियों का शील भी ऐसे में कभी-कभी डगमगा जाता है. देखिए कवि क्या  कहता है-
लाल गुलाल उड़ाय कै औचक
बाल कपोलन मींजि गई है
ऐसी सनेह मैं सीझि गई
उर-अंतर बीच पसीजि गई है
छांह छुवै गहि पावै न मीत को
दौरि फिरी मन खीजि गई है
रंग बिना रस रंग उमंग मैं
कंचुकी भीतर भीजि गई है. (बांसुरी)

ब्रज भाषा में भारतेंदु हरिश्चंद से लेकर आधुनिक कवियों में लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक व सोम ठाकुर तक फागुन और होली का रम्य चित्रण देखने को मिलता है. गोकुल चंद, सूरदास, घनानंद, नंद दास, परमानंद दास, चतुर्भुज दास, रामदास, कृष्ण्दास, रसखान, जगन्नाथ कविराय, मुरारिदास, ब्रजपति, मोहन, मनीराम, ग्वाल कवि, रत्नाकर, सेनापति, देव, बैनी कवि, द्विजदेव, मनिदेव, ठाकुर जैसे ब्रज कवियों की तो एक विशाल परंपरा ही है जिन्होंने अपने काव्य में होली और फागुन का दिव्य गान किया है. पहले गांवों में होली के दिन ढोलक और मृदंग पर गुझिया के संग महफिल चौपाल सजती थी, अब गवैया नहीं रहे, हुरिहार होली के संस्कारों से च्युत हो रहे हैं. गांवों में भी अब सेंथेटिक रंग पहुंच चुका है. कोलतार की संस्कृति पहुंच चुकी है. कीचड़ कांदो की संस्कृति पहले से थी ही. शहरों में भी जहां आधुनिक संस्कारों की खेती होती है, चैनलों ने होली के रंग को मादक बना दिया है. पारंपरिक त्योहार के इस उत्सव में नालियों का रस-परिपाक उमड़ रहा है. पर सच कहें तो आज भले वह ब्रज नहीं, वह अवध नहीं, वह बुंदेलखंड न हो, पर गांवों में आज भी त्योहारों की शुचिता बची है. भले ही शहर के लोग किसी मिष्ठान्न गृह से पैकेट दो पैकेट गुझिया और बाजार से रंग अबीर लाकर होली मना लें पर गांव के गरीब के घर तो आज के दिन के लिए कई रोज पहले से गुझिया बननी शुरु हो जाती है. दूर दूर बसे प्रियजन इस त्योंहार में दो चार दिन पहले से घर पहुंचने लगते हैं. रेडियो और टीवी चैनलों पर फागुन और होली के गीत बजने लगते हैं. लोकगीतों की तान में फागुन परवान चढने लगता है. भले ही फागुन दो दिन का हो, पर इस दो दिन के फागुन को भी जी लेने की पूरी चाहत लोकचित्त में दिखती है.

फागुन और होली को लेकर आधुनिक काव्यकमें भी बहुतेरे चित्रण मिलते हैं पर छंदों का जो लालित्य सूरदास जैसे कवियों में है वह विरल है. सूर एक एक गतिविधि पर निगाह रखते हैं, उसका सघन वर्णन करते हैं. कैसे गोपियां कृष्ण को खींच ले जाती हैं और कैसे श्रीदामा, ग्वाल बाल, सब ढोल पखावज डफ मुरली लिए हुए गलियों में चलते हैं. इधर से सुघर राधिका उधर से कुंवर कन्हाई. अबीर कुंकुम, गुलाल और सोने की पिचकारी साथ साथ चल रही है, राधा के जरा से संकेत पर सखियों का झुंड आकर कैसे कृष्ण को पकड़ लेता है और मुरली पीतांबर छीन कर सिर पर चूनर ओढा देता है, आंखों में काजल आंज कर नकबेसर पहना कर उन्हें  एक मोहक स्त्री में बदल देता है, इसका तो अनुमान ही कितना रोमांचक है. ऐसे में यशोदा गोपियों के झुंड में आकर भी किशोर कृष्ण को खोज नहीं पातीं क्योंकि वे तो स्त्री  बन गोपियों के समूह में छिप गए हैं. अब यशोदा मां कृष्ण को ले भी जाना चाहें तो बिना फगुवा दिए ले जा पाना संभव नहीं. यह वर्णन सूर कर रहे हैं अपनी दृष्टिहीन आंखों से और ऐसा करते हुए भी उन्हें यही लगता है कि 'शोभा बरनि न जाई.'

फागुन का महीना ही ऐसा है. कोई क्या करे. ऐसे मौसम में संस्कारी लोग भी निलज हो उठते हैं, बाबा लोगों में भी कैशोर्य आ विराजता है. किसका मान मर्दन नहीं होता होली में . ऐसा हम नहीं, रसखान जैसे चितचोर कवि कहते हैं तो मानना ही पड़ता है :
फागुन लाग्यो सखी जब तें, तबतें ब्रजमंडल धूम मच्यो है.
नारि नवेली बचै नहिं एक, विसेष इहैं सबै प्रेम अँच्यों है.
सॉझ सकारे कही 'रसखान', सुरंग गुलाल लै खेल रच्यो है
को सजनी निलजी न भई, अरु कौन भटू जिहिं मान बच्यो है.

चित्त में फागुन के इस निबंध की उमड़ घुमड़ चल ही रही थी कि अल्मारी की ओर अचानक निगाह गयी जहां रामदरश मिश्र के 'मेरे प्रिय गीत' की पुस्त‍क झांक रही थी. उनके गीतों का कहना ही क्या! फागुन पर उनके एक गीत का बंद मुझे छू गया है :
मधु ज्वाल जगी, पौरुष हुलसा
पीड़ा का बंध गया खुल-सा
कंठों में तड़पे अल्ह़ड़ स्वर
मधु प्यास-भरा अंतर झुलसा
वन खेत नदी पथ पनघट पर
उमड़ा फागों का मद निर्झर
उजड़ी आंखों में परदेशिनि का दूर देश आ मुसकाया.
हर-हर झर-झर में गूंज उठा फागुन आया,फागुन आया.


इस गीत ने सहसा लखनऊ के एक गीतकार विष्णु कुमार त्रिपाठी 'राकेश' की याद दिला दी है. जैसे गीत, वैसा ही विदग्ध  कंठ था. मां भारती के चितेरे कवि थे वे. उनका संग्रह 'पतझर के हाशिए' '82 के आसपास स्मृति प्रकाशन, शहराराबाग, इलाहाबाद से आया तो वह न जाने कैसे ओशो के पुस्तकालय तक पहुंच गया. एक अंतराल बाद उनकी किताब 'झरहुं दसहुं दिसि मोती' पढ़ने को मिली तो देखा उसमें पग-पग पर राकेश जी के गीत छाए हुए हैं. उनकी ऐसी आध्यात्मिक व्याख्या ओशो ने की है कि हिंदी के व्याख्याता क्या खाक करेंगे? बस उनके नाम का कोई संदर्भ नहीं है, न यह कि गीत उनका है. गीत जिसका भी हो, व्याख्या ओशो की है. अब उस पर ओशो का कापीराइट है. पर फागुन पर लिखा उनका गीत पूरे मौसम की आभा बयान कर रहा है-
गत-आगत जुड़ आए, मादक क्षण मुड़ आए;
मस्ती ने संयम के गठबंधन तुड़वाए;
सुमनासव पिए हुए,
अलमस्ती लिए हुए;
फिर आया है मौसम लाज-शरम धोने का!
फिर आया है मौसम भीगने-भिगोने का!!

फागुन आता है तो मन का मौसम भी फागुनी हो उठता है. धीरे-धीरे मनुष्य जितना आधुनिक और सभ्य हो चला है, उसका प्रकृति से रिश्ता उतना ही दूर होता जा रहा है. उसने तो बस अपने गमले में कुछ गुलाब उगा लिए हैं और छत पर कुछ गुलदावदी इत्यादि- उसका मधुवन तो बस यही है. पर कवियों के तो मन में ही मधुवन रचा-बसा होता है. मेंहदी और महावर से तो बस तन भींगता है, कल्पना और संवेदना के रथ पर आरुढ़ मन अपना फागुन अपना बसंत खुद रच लेता है. फागुन केवल रंगों का नाम नहीं, अबीर और गुलाल का नाम नहीं, गुझिया और रसगुल्ले का नाम नहीं, वह तो एक अनुभूति है, प्रतीति है. उजाड़ मन को भी अपनी अल्हड़ता में उड़ा ले चलने वाली. जैसे ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे धीरे. पर मन का क्या. वह तो विवश आलंबन और उद्दीपन की डोर से बंधा है. मन चकाचक हो तो यहीं काबा है, यहीं काशी है. यहीं बसंत है, यहीं फागुन है. इसलिए माना कि यह मौसम फागुन का है, होली के दिन हैं, रंगों के दिन हैं, भीगने-भिगोने के दिन हैं, लेकिन यह सब उस अहसास पर निर्भर है जिसने मन पर फागुन की रंगोली रच दी है. इसलिए चाहता हूँ कि फागुन का यह प्रीतिकर अहसास बना रहे, रंगों का अहसास बना रहे. आखिर, फागुन एक अहसास की नाम ही तो है. साहित्य आजतक की ओर से होली की शुभकामनाएं.
                                                                                        ***

# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें