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पिछले 17 सालों में दोगुना हुए बलात्कार के मामले, आंकड़ा पहुंचा 4 लाख से ऊपर

2001 में जहां देश भर में बलात्कार के कुल 16,075 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2017 में यह संख्या बढ़कर 32,559 हो गई, यानी 17 सालों में बलात्कार के मामलों में 103 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई.

प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

  • 2001‐17 के बीच भारत में कुल 4,15,786 बलात्कार के मामले दर्ज
  • 17 सालों में हर घंटे औसतन 3 महिलाओं के साथ रेप के मामले

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में सुनवाई के लिए कोर्ट जाते समय रास्ते में एक 23 वर्षीय रेप पीड़िता को जला दिया गया. खबरों में कहा गया कि पीड़िता मदद मांगने के लिए जली हुई हालत में करीब एक किलोमीटर तक भागी और आखिरकार हारकर उसने पुलिस को कॉल किया. कुछ दिनों ​​बाद दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उसकी मौत हो गई.

आरोप है कि पीड़िता के बलात्कारी ने ही उसपर मि​ट्टी का तेल छिड़क कर उसे जला दिया. भारत में बढ़ते बलात्कार के मामलों के बीच 15 दिनों के भीतर यह दूसरी घटना थी जब किसी बलात्कार पीड़िता को जला कर मार दिया गया.

एनसीआरबी के आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि महिलाओं के लिए बलात्कार का खतरा पिछले 17 सालों की तुलना में लगभग दोगुना हो गया है. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 2001‐2017 के बीच पूरे भारत में कुल 4,15,786 बलात्ककार के मामले दर्ज हुए. पिछले 17 सालों के दौरान पूरे देश में प्रतिदिन औसतन 67 महिलाओं के साथ बलात्कार हुए, यानी 17 सालों में हर घंटे औसतन तीन महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ है.

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हालांकि, 2001 में जहां देश भर में बलात्कार के कुल 16,075 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2017 में यह संख्या बढ़कर 32,559 हो गई, यानी 17 सालों में बलात्कार के मामलों में 103 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई.

अगर प्रतिशत में देखा जाए तो बलात्कार से जुड़े मामलों में सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी गोवा में दर्ज की गई है. गोवा में 2001 में 12 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2017 में 76 मामले दर्ज हुए. इस तरह गोवा में 17 सालों में बलात्कार के मामलों में 533 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई. इसके बाद दूसरा नंबर उत्तराखंड का है जहां पर बलात्कार के मामलों में 405 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है.

बलात्कार केस की वास्तविक संख्या

हालांकि, अगर प्रतिशत के बजाय बलात्कार केस की वास्तविक संख्या की बात करें तो मध्य प्रदेश सबसे ऊपर है. मध्य प्रदेश में 2001 में जहां बलात्कार के 2851 केस दर्ज हुए थे, वहीं 2017 में 5562 केस दर्ज हुए. वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है जहां पर सबसे ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज हुए. उत्तर प्रदेश में 2017 में कुल 4246 मामले दर्ज हुए. इसके बाद राजस्थान में 3305 और केरल में 2003 मामले दर्ज किए गए.

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बिहार ऐसा राज्य है ​जहां 2001 की तुलना में 2017 में बलात्कार के कम ही मामले दर्ज (-283) हुए. तमिलनाडु, ​मिजोरम, त्रिपुरा और नागालैंड अन्य ऐसे राज्य हैं जहां पर बलात्कार के मामलों की वास्तविक संख्या में कमी आई है. दिल्ली में 2012 में निर्भया के साथ हुए क्रूरतापूर्वक बलात्कार और हत्या की घटना के बाद सरकार ने कई अहम कदम उठाए हैं.

ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वोमेन्स एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णन ने इंडिया टुडे से कहा, '2012 के विरोध प्रदर्शन ने वास्तविकता को सही ढंग से स्थापित करने की कोशिश की, और यह पहली बार था जब महिलाओं को अहम जीत मिली. यह पीड़िता पर दोषारोपण करने के विरोध में बिना किसी शर्त के महिलाओं की स्वायत्ता की विजय थी.'

बलात्कार के मामलों को 'सम्मान' से जोड़ा

निर्भया केस के बाद सरकार ने मौजूद कानून में बदलाव किया और इसे काफी सख्त ​बनाया गया. बलात्कार के मामलों में सजा की अवधि को दोगुना तक बढ़ा करके 20 साल किया गया. आपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 के विस्तार के बाद बलात्कार के मामलों की रिपोर्टिंग पर भी असर पड़ा है. हालांकि, विशेषज्ञ NCRB के आंकड़ों पर भी सवाल उठाते हैं. NCRB अपराध  से संबंधित वही आंकड़े इकट्ठा करता है जो पुलिस स्टेशनों में मौजूद है.

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि बलात्कार के मामले पर्याप्त रूप में दर्ज नहीं होते. कविता कृष्णन इस आरोप के पक्ष में तर्क देती हैं कि 'भारत में पुलिस, नेता, जज और कैंपस के प्रशासक बलात्कार के मामलों को 'सम्मान' से जोड़कर देखते हैं. वे इसे हिंसा के रूप में नहीं देखते. इसके चलते सहमति से अंतरजातीय या अंतरधार्मिक संबंधों को 'बलात्कार' का रूप दे दिया जाता है. इसके परिणामस्वरूप 'सम्मान' के लिए हत्या जैसे अपराध होते हैं. ऐसा करके पितृसत्ता कहती है कि वह बलात्कार से महिलाओं की सुरक्षा कर रही है.'

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