हरियाणा विधानसभा चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस हाईकमान ने अशोक तंवर से हाथों से प्रदेश अध्यक्ष की कमान लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा को सौंपी है. साथ ही भूपेंद्र सिंह हुड्डा को हरियाणा विधानसभा चुनाव में चुनाव अभियान कमेटी का चेयरमैन और सीएलपी लीडर बनाने का फैसला किया है. कांग्रेस में बदलाव के बाद बागवत से उठते सुर को देख पार्टी आलाकमान ने डैमेज कंट्रोल शुरू कर दिया है.
अशोक तंवर की जगह शैलजा को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद उठ रहे विरोध के सुरों को दबाने के लिए खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को आगे आना पड़ा. गुरुवार को देर शाम सोनिया ने अशोक तंवर से मुलाकात करके विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने और बदलाव के बाद असंतोष जैसा कुछ न दर्शाने पर चर्चा की गई. भले ही सोनिया ने मोर्चा संभाल लिया हो, लेकिन पार्टी में गुटबाजी को खत्म करना आसान नहीं है.
बता दें कि कांग्रेस हाईकमान हरियाणा में जातीय संतुलन बरकरार रखने में कामयाब रहा है. हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने 20 फीसदी दलित और 30 फीसदी जाट को साधने की रणनीति बनाई है. हाईकमान ने अशोक तंवर और किरण चौधरी की जोड़ी को हटाकर कुमारी शैलजा और हुड्डा की जोड़ी को हरियाणा की बागडोर सौंपी है.
दलित समुदाय के अशोक तंवर को हटाकर दलित समुदाय की ही वरिष्ठ नेता कुमारी शैलजा को हरियाणा में बागडोर सौंपी है, ताकि दलित समाज नाराज न हो. यही फॉर्मूला कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी को हटाने में भी अपनाया गया और उनकी जगह पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को बनाया.
किरण चौधरी जाट समुदाय से आती हैं, उनकी कांग्रेस हाईकमान से अच्छी पकड़ मानी जाती है. हुड्डा खेमे के विधायक किरण चौधरी को हटाने की मुहिम लंबे समय से चलाए हुए थे. ऐसे में हाईकमान ने जाट समुदाय की सियासी ताकत को देखते किरण चौधरी से पद लेकर भूपेंद्र सिंह हुड्डा को सौंपा. कांग्रेस किरण के हटने से जाटों में गलत संदेश न देने की कोशिश की है. इसी रणनीति के तहत दलित की जगह दलित और जाट की जगह जाट का दांव खेला है.
हरियाणा में कांग्रेस नेताओं के बीच गुटबाजी का खामियाजा लोकसभा चुनावों में भी पार्टी के सफाए के रूप में देखने को मिला है. ऐसे में कांग्रेस हाईकमान ने विधानसभा चुनाव से पहले बदलाव करके संकेत देने के कोशिश की है, लेकिन कई ऐसे छत्रप हैं जिनका हुड्डा के साथ छत्तीस का आंकड़ा रहा है. अशोक तंवर इस बदलाव से शायद ही खुश हों, पिछले काफी समय से खुलकर हुड्डा से उनकी अदावत रही है. अशोक तंवर ने पिछले छह सालों में हर जिले में घूमकर अपने समर्थकों की एक फौज खड़ी की है. ऐसे में तंवर गुट के लोग विधानसभा चुनाव के दौरान हुड्डा को समर्थन करें यह कहना मुश्किल है.
रणदीप सिंह सुरजेवाला कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और राहुल के करीबी माने जाते हैं. दिल्ली की सिसायत करते हैं, लेकिन कैथल उनका विधानसभा क्षेत्र है. चुनाव को देखते हुए उन्होंने हरियाणा में अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं. सुरजेवाला के हुड्डा से रिश्ते जगजाहिर हैं. हाल ही में उन्होंने दलित चेतना रैली करके अपना अलग घोषणा पत्र जारी बनाने का फैसला किया. इतना ही नहीं अशोक तंवर को पर्दे के पीछे से समर्थन करने में उनका बड़ा हाथ माना जाता है.
हरियाणा में कैप्टन अजय सिंह यादव की गिनती अशोक तंवर और किरण चौधरी खेमे में होती है. कांग्रेस में हुए बदलाव के बाद अजय यादव के कदम पर लोगों की नजर है. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के विरोध की ताल ठोकेंगे इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है.
कुलदीप बिश्नोई और भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बीच रिश्ते जगजाहिर हैं. कुलदीप कांग्रेस के गैर जाट नेता हैं. वह हुड्डा का नेतृत्व स्वीकार करेंगे यह कहना मुश्किल है. लोकसभा चुनाव के दौरान कुलदीप बिश्नोई ने साफ तौर पर कहा था कि हुड्डा के नेतृत्व में वह काम नहीं करेंगे. यही वजह रही कि मार्च में वह हुड्डा के नेतृत्व वाली बस में भी सवार नहीं हुए थे.