
अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हो जाने के बाद से भारत सहित अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ये मुद्दा छाया हुआ है. न्यूज़ चैनल्स पर ज्यादातर खबरें तालिबान को लेकर ही दिखाई जा रही हैं. इस बीच सोशल मीडिया पर अखबार की एक क्लिपिंग वायरल हो रही है जिसमें लिखा है कि बिहार के मोतिहारी में मंदिर गई एक दलित महिला को अर्धनग्न कर पीटा गया. इस खबर को पोस्ट करते हुए यूजर्स लिख रहे हैं कि देश के मंदिरों में महिलाओं को पीटा जा रहा है लेकिन भारतीय मीडिया अफगानिस्तान की महिलाओं की फिक्र करने में लगा है.

क्लिपिंग को शेयर करते हुए एक फेसबुक यूजर ने लिखा है, "देश को झिंझोड़ देने वाली सच्चाई,हमे फ़िक़्र है अफगानिस्तान की महिलाओं की." एक और यूजर ने इसे शेयर करते हुए लिखा, "इसी बीच एक और बड़ी खबर अफगानिस्तान से देखिए औरतों पर तालिबानियों का जुल्मो सितम." इसी तरह अलग-अलग कैप्शन के साथ इस क्लिपंग को फेसबुक के अलावा ट्विटर पर भी हाल-फिलहाल की घटना बताकर शेयर किया जा रहा है.
क्या है सच्चाई?
इंडिया टुडे एंटी फेक न्यूज़ वॉर रूम (AFWA) ने पाया कि वायरल पोस्ट पूरा सच सामने नहीं रखती. मोतिहारी में यह घटना जुलाई 2016 में हुई थी ना की हाल-फिलहाल में.
कुछ कीवर्ड की मदद से खोजने पर हमें यही खबर 'हरिभूमि' की वेबसाइट पर मिली. इसे 11 जुलाई 2016 को प्रकाशित किया गया था. खबर में बताया गया है कि मोतिहारी में एक दलित महिला बेटे की बारात निकलने से पहले स्थानीय देवी मंदिर में पूजा करने गई थी. खबर के अनुसार, दबंगों ने महिला को इसलिए पीटा क्योंकि वो दलित थी और मंदिर में पूजा करने चली गई थी. आरोपियों ने महिला को अर्धनग्न तक कर दिया था और उसकी बेटी को भी पीटा था. यह घटना बिशुनपुरा गांव में हुई थी.
इस मामले को लेकर उस समय 'पत्रिका' ने भी खबर प्रकाशित की थी. खबर में आरोपियों के नाम साजन कुमार, राजन कुमार, भूषण कुमार, अशोक कुमार और कुंदन कुमार बताया गया है. इन लोगों ने छोटी जाति का हवाला देकर महिलाओं के मंदिर में पूजा करने पर आपत्ति जताई थी. वायरल क्लिपिंग को जुलाई 2016 में भी कुछ लोगों ने फेसबुक पर पोस्ट किया था.
यहां इस बात की पुष्टि हो जाती है कि यह क्लिपिंग पांच साल से ज्यादा पुरानी है जिसे तालिबान के मुद्दे के बीच हाल फिलहाल में घटी घटना की तरह शेयर किया जा रहा है.
हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अब भी हमारे समाज में दलितों के साथ भेदभाव मौजूद है और दलितों के लिए मंदिरों में प्रवेश पाना अब भी सामाजिक न्याय का अहम मुद्दा है.