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मनोरंजन

ये हैं दूसरे विश्व युद्ध के भूले-बिसरे भारतीय हीरो

ये हैं दूसरे विश्व युद्ध के भूले-बिसरे भारतीय हीरो
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दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत यूरोपीय देशों की लड़ाई के रूप हुई थी. लेकिन जैसे-जैसे यह युद्ध यूरोप से बाहर अफ्रीका, एश‍िया में फैला खासकर जापान और अमेरिका के इसमें शामिल होने से इसने विश्व युद्ध का आकार ले लिया. विश्व युद्ध में ब्रिटेन के शामिल होने के कारण उस समय ब्रिटेन के उपनिवेश रहे भारत की सेना को भी इसमें शामिल होना पड़ा. लाखों भारतीय सैनिकों ने मित्र राष्ट्रों की ओर से इस जंग में हिस्सा लिया, इनमें महिलाएं भी थीं.

भारतीय नौसेना की द्वितीय ऑफिसर कल्याणी सेन दूसरे विश्व युद्ध में शामिल होने के लिए चीफ ऑफिसर मार्गरेट कूपर के साथ स्कॉटलैंड पहुंची. यह तस्वीर 3 जून 1945 को ली गई थी.

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द्व‍ितीय विश्व युद्ध के दौरान पहली बार भारतीय नौसेना के अंतर्गत ही महिला रॉयल इंडियन नेवी सर्विस की शुरुआत हुई. यह पहला मौका था जब महिलाओं को नौसेना में मौका दिया गया. हालांकि उन्हें जहाज पर काम नहीं दिया गया.

महिला रॉयल इंडियन नेवी सर्विस की ओर से यूके जाने वाली पहली भारतीय महिला अफसर सेकेंड ऑफिसर कल्याणी सेन थीं. वे यहां महिला नौसेना में ट्रेनिंग और प्रशासन पर एक तुलनात्मक अध्ययन के लिए गई थीं.

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1936 में सरला ठकराल परंपराओं को तोड़ते हुए एयरक्राफ्ट उड़ाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं. 1914 में जन्मीं सरला ने 1936 में सिर्फ 21 साल की उम्र में पायलट का लाइसेंस अर्जित किया. उन्होंने जिप्सी मोठ को अकेले उड़ाने का कारनामा किया.
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इसके बाद सरला ठकराल को प्रेरणा बनाकर कई महिलाओं ने दूसरे विश्व युद्ध में एयरफोर्स के लिए काम किया.
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इतिहासकार मैथ्यू वार्ड ने ट्विटर पर बताया कि 1946 में कराची एयरपोर्ट पर एक विशाल हैंगर था. वहां उनके दादा और सरला ठकराल मौजूद थीं.
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सेनाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने पर वारिन्स की चीफ कंट्रोलर और एक एक्टीविस्ट ने कहा कि युद्ध ने भारत में नई जान फूंकी है और इससे भविष्य का भारत बनेगा.
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31वीं भारतीय बख्तरबंद ड‍िवीजन की शिंदे हॉर्स ने मार्च 1944 में इराक में युद्ध में हिस्सा लिया. शेरमन टैंक के दो कर्मी अपने काम में जुटे हुए.
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दिसंबर 1941 में लिबिया के ओमार में मिले नाजी झंडे को थामे हुए भारतीय सैनिक.
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1943 में बर्मा के अराकन फ्रंट में पेट्रोलिंग पर जाने की तैयारी में 7वीं राजपूत बटालियन के सदस्य.
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भारतीय टेक्नीश‍ियन तोप दागने वाले हरिकेन विामन को असेंबल करते हुए.
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अगस्त 1943 में भारत के एक आरएएफ स्टेशन के अर्दली रूम में ड्यूटी पर तैनात बेगम पाशा शाह.
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भारतीय और आरएएफ के ग्राउंड सदस्य 1943 में मशीन को तैयार करते हुए.
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रेलवे वर्कशॉप में काम करते कामगार, 1942 में रेलवे वर्कशॉप को बख्तरबंद हथियार बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया था.
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एक तोपखाना स्कूल में काम पर तैनात वारिन. स्कूल में 20 एमएम ओरलिकोन गन चलाना और साफ करना सिखाया जाता था.
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महिलाओं को सेना में भर्ती करने का निर्णय इसलिए लिया गया, ताकि पुरुषों को मैदान-ए-जंग में भेजा जा सके. शुरुआत में महिलाओं को आर्मी में सेवा कार्यों के लिए रखा गया, लेकिन बाद में उन्हें नौसेना और वायुसेना में भी शामिल किया गया.
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जहाजों के मॉडलों को सजातीं वारिन्स.
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डिकोडिंग का टॉप सीक्रेट कार्य करती एक वारिन.
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40 एमएम की बोफोर्स गन पर मेनटेनेंस का कार्य करतीं भारतीय महिला सदस्य.
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अपने काम में जुटीं वारिन्स.
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नौसेना के संदेशों को टाइप करने में जुटीं वारिन्स.