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Raksha Bandhan Film Review: दहेज और भारतीय फ़िल्में- 50 के दशक से आज के जमाने में कुप्रथा दिखाती कहानियां

अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर के अभिनय से सजी इस फ़िल्म में दहेज की कुप्रथा को दिखाने की एक कोशिश की गई है. अक्षय काफ़ी दिनों से सामाजिक फ़िल्मों में काम कर रहे हैं, जैसे टॉयलेट- एक प्रेम कथा, पैडमैन, मिशन मंगल, OMG ओह माई गॉड, गोल्ड और ये फ़िल्म जो उन्होंने खुद बतौर निर्माता बनाई है, वो भी एक कोशिश है समाज के कड़वे सच को हलके फ़ुल्के अंदाज में दिखाने की. 

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रक्षाबंधन पोस्टर रक्षाबंधन पोस्टर
फिल्म:रक्षाबंधन
/5
  • कलाकार : अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, सीमा पाहवा, सादिया खतिब, सहजमीन, दीपिका खन्ना, स्मृति श्रिकांत, साहिल
  • निर्देशक : आनंद एल राय

कहते हैं सिनेमा समाज का आईना होता है और हमारे देश में आज भी दहेज की समस्या पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है. इसी विषय को फिर से फ़िल्मी पर्दे पर लेकर आई है फ़िल्म रक्षाबंधन. हाल ही में वेब सिरीज मेड इन हेवन और दावत-ए-इश्क़ मूवी में भी दहेज के इसी मुद्दे को उठाया गया था. 

अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर के अभिनय से सजी इस फ़िल्म में दहेज की कुप्रथा को दिखाने की एक कोशिश की गई है. अक्षय काफ़ी दिनों से सामाजिक फ़िल्मों में काम कर रहे हैं, जैसे टॉयलेट- एक प्रेम कथा, पैडमैन, मिशन मंगल, OMG ओह माई गॉड, गोल्ड और ये फ़िल्म जो उन्होंने खुद बतौर निर्माता बनाई है, वो भी एक कोशिश है समाज के कड़वे सच को हलके फ़ुल्के अंदाज में दिखाने की. 

फ़िल्म रक्षाबंधन टीवी सीरीयल की तरह पारिवारिक है, लेकिन बहुत कुछ दिखाने के चक्कर में अपने मूल विषय से भटक जाती है. फिर भी बॉक्स ऑफ़िस पर हिट देने वाले अक्षय कुमार ने बतौर निर्माता और अभिनेता फ़िल्म के निर्देशक आनंद .एल .राय के साथ कोशिश की आज के जमाने में सदियों से चलती इस कुप्रथा को दिखाने की, क्योंकि आज भी भारत में दहेज की समस्या आम है. फ़िल्म में थोड़ा जबरदस्ती का ड्रामा जरूर है, लेकिन एक लम्बे समय के बाद एक पारिवारिक फ़िल्म  सिनेमाघरों में आई है. टॉयलेट एक प्रेम कथा के बाद अक्षय और भूमि की जोड़ी वही अन्दाज़ में है. अक्षय की बहनों के किरदार में नई अभिनेत्रियों को ज़्यादा मौक़ा नहीं मिला और साथ में फ़िल्म का कमजोर संगीत गति धीमी कर देता है. लेकिन त्योहार के मौक़े पर और करोना काल की मार के बाद ओटीटी के जमाने में एक साफ़ सुथरी पारिवारिक  फ़िल्म का आना अच्छी शुरुआत है 

50 के दशक में वी शांताराम ने अपनी फ़िल्मों से सामाजिक फ़िल्मों का दौर शुरू किया था और उसके बाद 60 और 70 में ढेर सारी सामाजिक फ़िल्में बनाई. वही बी. आर.चोपड़ा और सुनील दत्त ने 70, 80 और 90 के दशक में समकालीन विषयों पर कई फ़िल्में बनाईं. दहेज का विषय 90 के दशक की कई फिल्मों का विषय रहा है. 


डालते है फ़िल्म रक्षाबंधन की तरह दहेज की कुप्रथा पर बनी कुछ फ़िल्मों पर एक नज़र :-

सौ दिल सास के- 1980
दहेज प्रथा पर 80s के दशक में निर्देशक विजय सदाना ने एक सुपरहिट फ़िल्म बनायी थी. फ़िल्म ने ललिता पवार को एक जालिम सास का तमग़ा दिया था. फ़िल्म में आशा पारेक एक पीड़ित बहू बनी थीं और रीना रॉय एक धाकड़ बहू, जो दहेज की कुप्रथा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती है. फ़िल्म दहेज की कुप्रथा पर बनी पारिवारिक हिट फ़िल्मों में से एक है. 

दहेज- 1950
1950 में बनी फ़िल्म दहेज को बनाया था वी शांताराम ने और फ़िल्म में पृथ्वीराज कपूर और जयश्री ने काम किया था. फ़िल्म ब्लैक एंड वाइट थी, लेकिन उस वक्त फ़िल्म दर्शकों को बहुत पसंद आयी थी. 

दावत-ए-इश्क़- 2014
कहते हैं सबको लगता है दहेज की समस्या खत्म हो गयी है, लेकिन आज भी देश के छोटे शहरों में ये आम है. कुछ इसी विषय पर यशराज फ़िल्म्स ने 2014 ही में ये फ़िल्म बनायी थी. परिणीति चोपड़ा और आदित्य रॉय कपूर की ये फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर नहीं चली थी, लेकिन बाद में लोगों ने इस फ़िल्म को काफ़ी पसंद किया जब ये टीवी और ओटीटी पर आई. 

दूल्हा बिकता है -1982

80 के दशक में राज बब्बर और अनिता राज की इस फ़िल्म को दर्शकों ने पसंद किया था. फ़िल्म रक्षाबंधन की तरह एक ऐसे भाई की कहानी है, जो बहनों की शादी के लिए अपनी क़ुर्बानी दे देता है. फ़िल्म में निर्देशक अनवर पाशा ने दहेज के विषय को एक रोचक कहानी के माध्यम से दिखाया था. 

ये आग कब बुझेगी-1991
अभिनेता सुनील दत्त ने हमेशा सामाजिक विषयों पर फ़िल्में बनाईं और ऐसी ही उनकी एक फ़िल्म थी, जिसमें सुनील दत्त ने अभिनेत्री शीबा को लॉन्च किया था, जो उनकी दहेज पीड़ित बेटी बनी थी. कैसे शीबा को उसके ससुराल वाले दहेज के ख़ातिर जला के मार डालते हैं, यही फ़िल्म की कहानी थी. फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर औसत रही थी, लेकिन शायद 90 के दशक में दर्शकों का मिज़ाज बदल चुका था  और ये फ़िल्म लोग नहीं समझ पाए थे.

लज्जा 
निर्देशक राज कुमार संतोषी ने क़रीब 15 साल पहले मनीषा कोइराला और माधुरी दीक्षित के साथ लज्जा फ़िल्म बनाई थी, जहां पर अलग अलग नारी प्रधान मुद्दे उठाए गए थे. उसी में से एक था दहेज का मुद्दा, जिसमें महिमा चौधरी एक दहेज पीड़ित लड़की बनी थीं. 

अंतरद्वन्द
इस फ़िल्म में भी दहेज के मुद्दे को उठाया गया था की कैसे बिहार में एक दूल्हे का अपहरण हो जाता है. फ़िल्म में सब नए कलाकार थे लेकिन दहेज के मुद्दे को एक नए अंदाज में दिखाया गया था. 2009 में फ़िल्म को नेशनल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था.

 

 

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