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मुंबई: स्कूल मालिक ने माफ की फीस, मजदूरों की मदद के लिए खर्च किए बचत के पैसे

इंसानियत अभी भी जिंदा है. जानिए ऐसे कपल के बारे में जो चलाते हैं स्कूल. कोरोना वायरस के दौरान माफ की छात्रों की फीस और खिला रहे हैं मजदूरों को खाना.

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स्कूल चलाने वाला कपल - ANI
स्कूल चलाने वाला कपल - ANI

जहां एक ओर पेरेंट्स कोरोना वायरस के दौरान स्कूलों की फीस बढ़ने से परेशान हैं. वहीं मुंबई के मलाड में स्कूल चलाने वाले एक कपल ने सभी छात्रों की स्कूल फीस माफ कर दी है. इसी के साथ वह मजदूर और जरूरतमंद लोगों को भोजन बांट रहे हैं. आइए जानते हैं इनके बारे में.

मिगजा और फैज मुंबई के मलाड में 'Zeal English Medium School' चलाते हैं. लेकिन कोरोना वायरस के बढ़ने से उन्होंने छात्रों से फीस न लेने का फैसला किया है. इसी के साथ लॉकडाउन की शुरुआत के बाद से लगभग 1,800 लोगों को खिलाया है.

मिगजा और फैज ने 10 साल पहले इस छोटे से स्कूल की शुरुआत की थी और इसमें कक्षा 1 से 10 तक के 300 से अधिक छात्र पढ़ते हैं. अधिकांश छात्र मालाड के मालवणी में स्थित अंबोजवाड़ी की घनी आबादी वाले स्लम क्षेत्र से आते हैं. मिगजा ने कहा कि कोरोना वायरस के कारण जब लॉकडाउन शुरू हुआ तो लोगों से मदद के लिए फोन आने लगे थे.

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ज्यादातर लोग जो यहां रहते हैं, वे प्रवासी और दिहाड़ी मजदूर हैं. उनकी स्थिति को देखते हुए, हम कुछ एनजीओ के संपर्क में आए और भोजन का प्रबंध किया. भोजन के रूप में हम खिचड़ी बांटने लगे. लेकिन जल्द ही पता लग गया कि यह पर्याप्त नहीं है. हमें पता चला कि हमने जितना सोचा था उससे कहीं ज्यादा खराब स्थिति है, इसलिए हमने लोगों की मदद करने का फैसला किया.

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हम अपने बैंक में पैसा नहीं रखना चाहते थे और लोगों को भोजन के लिए संघर्ष करते हुए देखते थे इसलिए हमने अपनी बचत का उपयोग करना शुरू कर दिया.

मिगजा ने कहा, 'कई माता-पिता ने मुझसे संपर्क किया और फीस देने में असमर्थता जताई. इसलिए हमने सभी छात्रों की तीन महीने की स्कूल फीस माफ कर दी.'

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एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले पति फैज शेख ने कहा, 'मैंने और मेरी पत्नी ने हमारे निजी संपर्कों और अपने कार्यालय के सहयोगियों से कुछ पैसे जमा किए और अनाज के पैकेटों का वितरण शुरू किया, लेकिन मांग लगातार बढ़ रही थी, इसलिए हमने अपनी बचत और भविष्य निधि राशि का उपयोग करना शुरू कर दिया.'

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हमें एनजीओ से समर्थन मिला लेकिन उनकी जेब भी सीमित थी. हालांकि, लॉकडाउन के दौरान कई प्रवासी वापस अपने मूल राज्यों में चले गए और मांग कम हो गई, लेकिन फिर भी लोगों की जरूरत थी.

मैंने अपने खाते से 5 लाख रुपये निकाले थे और अब तक लगभग 4.5 लाख रुपये खर्च किए हैं. हम दूसरों से अपील करते हैं कि कृपया इस संकट में जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आएं.

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