आसमान में काली घटाए घिरी हुई हैं. मोटी-मोटी बूंदे मोती की तरह छनकते-खनकते बरस रहे हैं. धरती का हृदय का ताप धुल चुका है और माहौल में सरसता घुली हुई है. भाद्रपद महीने के चार दिन और बाकी हैं इन चार दिनों में मौसम तो अभी खुलने वाला नहीं है. नदियां किनारों से बाहर बढ़ आई हैं, पहाड़ खिसक आए हैं, खैर ये स्थिति मानवीय अतिक्रमण का नतीजा हैं. कुदरत ने तो हमें नेमत ही बख्शी थी, हम ही उसका मोल समझ नहीं पाए.
खैर, यहां बात कुदरत के क्रोध की नहीं है, बात ये है कि बारिश का ये सुंदर मौसम जि़तनी रंगीनियत लेकर आता है, कम है. शहरी अतिक्रमण से बचे खेत और जंगल निहारने का सौभाग्य हो तो इस वक्त ऐसी धुली हुई चमकीली हरियाली देखना, जिंदगी में विटामिन का काम करता है, और पत्तों पर झूमते हुए टिपिर-टिपिर, तड़क-तिड़िक करके गिरती बूंदें ऐसा लगता है जैसे मृदंग बजा रही हों.
बारिश की बूंदों से हुआ ताल वाद्यों का आविष्कार
संगीत का प्रसिद्ध ग्रंथ संगीत रत्नाकर में जिक्र आता है कि ऐसी ही एक बारिश के मौसम में एक आचार्य ने कमल के पत्तों पर गिरती बारिश की बूंदों से प्रेरणा ली थी और फिर उन्होंने ताल वाद्यों का निर्माण किया. ये घटना कम से कम 3000 साल पुरानी बताई जाती है. यानी यह वह समय था जब तबले का भी पूर्वज वाद्ययंत्र त्रिपुष्कर सामने आया था और आज हथेलियों का आघात करके जितने भी संगीत वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं, सबकी प्रेरणा यह प्राचीन वाद्य ही है, जो बारिश की बूंदों के गिरने से निकलने वाली लयबद्ध आवाज से बना था.

गीतों में बारिश का अद्भुत वर्णन
लेकिन, बात ये है कि प्रकृति और संगीत का ऐसा अनूठा संगम कुछ ही हफ्तों का मेहमान और है. फिर यह सब कुछ एक इंतजार बनकर रह जाएगा. क्या पता कि अगले साल नीनो-अलनीनो का कैसा प्रभाव पड़े और आज के वर्षावनों का भूगोल अगले साल तक बदल जाए. आज घने, भारी बादल बारिश से लबालब हैं, पृथ्वी पर गिरती उनकी बूंदें जो धरती को भिगो रही हैं और जलाशयों को भर रही हैं, कई जगहों पर सब कुछ अस्त-व्यस्त है तो बादलों की गर्जना डरा जाती है तो कहीं बिजली की तलवार यूं चमक रही है, जैसे कि आकाश में अनगिनत योद्धा लड़ रहे हों और उनकी तलवार टकराने से चिंगारियां निकल रही हैं.
और इन्हीं सारी भावनाओं को सुर लहरियों में बांधते हैं शास्त्रीय राग. राग दुर्गा के सुरों में तीन ताल की लयकारी में एक बड़ी ही खूबसूरत बंदिश है,
कारी-कारी घनघटा घेरी आई,
पपिहा बोले, सदारंग वन
रिमझिम-रिमझिम मेहा बरसे
मस्त मोर भयो आली आज सखी। कारी-कारी...
एक स्त्री अपनी एक सखी से बारिश का वर्णन कर रही है. कहती है काली घनघटा घिर आई है और वन में पपीहा खुश होकर बोलने लगा है. रिमझिम-रिमझिम करके बरसात होने लगी है और मोर भी मस्त होकर नाच रहा है.
राग दुर्गा और बारिश का वर्णन
राग दुर्गा, जो देवी दुर्गा के नाम पर आधारित है और इसकी सुर-लहरियों में एक उत्साह भी शामिल रहता है, हालांकि राग दुर्गा की कुछ बंदिशें इसी उत्साह के साथ भक्ति भाव में भी शामिल होती हैं, लेकिन बारिश की खूबसूरती को राग दुर्गा बहुत करीने और बारीकी से सामने रखता है.
हालांकि सिर्फ बारिश के असली भाव को उजागर करने में मल्हार समूह और कन्नड़ समूह के रागों का कोई सानी नहीं है. इन रागों में बरसात के मौसम के लिए सबसे अधिक उपयुक्त बंदिशें रची गईं हैं.
महान संगीतशास्त्री और आचार्य पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने रागों को 10 थाटों में बांटा था. इनमें बिलावल, कल्याण, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफ़ी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी शामिल हैं. बरसात के राग काफ़ी थाट में आते हैं. 17वीं सदी में, कर्नाटक संगीत के विद्वान वेंकट मुखी स्वामी ने मेलकर्ता प्रणाली विकसित की थी, उन्होंने रागों को 72 मेलकर्ताओं या स्वर समूहों में बांटा. फिर भी रागों की मूल परंपरा में मल्हार प्रकृति के रागों का वर्षा वर्णन में अहम स्थान है.
मल्हार प्रकृति के रागों में वर्षा वर्णन
मल्हार प्रकृति के रागों में राग मेघ, जो कि सबसे प्राचीन राग है, फिर आता है राग मियां मल्हार, जिसे तानसेन ने खुद रचा था. फिर राग गौड़ मल्हार आता है. इसके अलावा राग आसावरी, राग बिहाग, राग दुर्गा भी बारिश के वर्णन के राग बन जाते हैं. इनमें भी एक और खास राग है, राग अमृत वर्षिणी. ये राग भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक महीने के वर्णन का ही राग है. इसमें बारिश से लेकर, शरद पूर्णिमा के शरदचंद्र और फिर कार्तिक में सुबह पड़ने वाली अमृत तुल्य ओस तक का वर्णन बंदिशों में देखने को मिलता है.
1. राग मेघ मल्हारः राग मेघ को आसान भाषा में ऐसे समझिए कि इसका गायन वो अहसास है जब बादल घिर रहे हों लेकिन बरसात अभी शुरू न हुई हो. इसमें गहरी शांति और भीतर ही भीतर उमड़ती प्रतीक्षा का भाव है. यह राग सुनकर लगता है जैसे क्षितिज पर बादल मंडरा रहे हों और धरती सांस रोके पानी की प्रतीक्षा कर रही हो. राग मेघ का संबंध प्राचीन काल से है और इसे सदैव वर्षा से जोड़कर देखा गया है.
कई शास्त्रीय ग्रंथों में इसे इंद्रदेव से संबद्ध माना गया है. यही कारण है कि यह राग पूजा-अर्चना और वर्षा उत्सवों में गाया जाता रहा है. पंडित जसराज की गायकी में राग मेघ सुनना मानो दूर कहीं बादलों की गरज सुनना है. उनकी गहराई भरी आवाज़ इस राग को और अधिक जीवंत बना देती है.
फिल्म चश्मेबद्दूर में दीप्ति नवल पर फिल्माया एक गीत है, 'कहां से आए बदरा, घुलता जाए कजरा'. यह गीत राग मेघ की छवि का ही अहसास कराता है. इस राग को और गहराई से सुनना हो तो चित्रा सिंह की गाई हुई एक खूबसूरत गजल है. 'कभी तो खुल के बरस अब्र-ए-मेहरबां की तरह' इसी तरह पंडित अजय चक्रवर्ती की भी एक खूबसूरत बंदिश है, 'घन छाए गगन, अति घोर-घोर.' उस्ताद गुलाम अली की मशहूर गजल, 'महफिल में बार-बार किसी पर नजर गई.' ये भी राग मेघ में बांधी गई है. इनका जिक्र किताब रागगीरी में लेखक शिवेंद्र कुमार सिंह और गिरजेश कुमार ने किया है.
2. राग मियां की मल्हारः अगर राग मेघ मल्हार वर्षा की प्रतीक्षा है तो मियां की मल्हार खुद बरसती हुई आकाशीय जलधारा है. इसमें बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली की चमक और तेज बौछारों का उत्साह है. यह राग सुनते ही लगता है कि जैसे प्रकृति का सारा वैभव बरसात में उतर आया हो. इस राग की रचना तानसेन के द्वारा मानी जाती है. कहते हैं कि उनके गाने मात्र से ही बारिश हो जाया करती थी.
यही कारण है कि यह राग संगीत की दुनिया में अमर है. उस्ताद अमीर खान की मियां की मल्हार सुनना मानो एक तूफानी बारिश में डूब जाना है. सई परांजपे की मशहूर फिल्म 'साज' में एक गीत था, 'बादल घुमड़ बढ़ आए' यह मियां की मल्हार राग से सजा हुआ गीत था. फिल्म गुड्डी का लोकप्रिय गीत, 'बोले रे पपीरहा' भी इसी राग पर आधारित था.

3. राग देश. आम तौर पर राग देश वर्षा की प्रकृति का नहीं बल्कि वसंत का उत्साह समेटने वाला राग है. फिर भी देश राग बारिश के उन पलों का प्रतीक है जब हल्की-हल्की बारिश हो रही हो और आप हथेलियों में पड़ती इस फुहार को सहेज लेना चाहते हों, इस राग में उत्साह के साथ प्रेम, ललक और कोमलता का भाव है. राग देश ठुमरी और दादरा में भी खूब गाया जाता है. यह राग अक्सर शाम के समय गाया जाता है और अपने मधुर स्वभाव के कारण शास्त्रीय संगीत प्रेमियों और प्रयोगधर्मी कलाकारों दोनों को प्रिय है. प्रख्यात गायिका शुभा मुद्गल की ठुमरियां इस राग में खूब सुंदर सजी हैं. उनकी आवाज इस राग की कोमलता और मधुरता को और बढ़ा देती है.
4. राग गौड़ मल्हारः राग गौड़ मल्हार बारिश के बाद का संगीत है. इसमें वह सुकून है जो तूफ़ान के थमने के बाद आता है. यह राग सुनते समय लगता है जैसे धरती नहा चुकी हो और अब ताज़गी से भर गई हो. राग गौड़ मल्हार में शक्ति भी है और कोमलता भी. भीमसेन जोशी की आवाज़ में यह राग सुनना दिव्य अनुभव है. उनकी गायकी बारिश के बाद की भीगी धूप जैसी प्रतीत होती है.
5. राग अमृतवर्षिणी: राग अमृतवर्षिणी का नाम ही बताता है "अमृत की वर्षा". यह राग आनंद और उल्लास का प्रतीक है. इसे सुनते ही मन में इंद्रधनुष खिल उठता है. मूल रूप से यह राग कर्नाटक संगीत से आया है, लेकिन धीरे-धीरे हिंदुस्तानी संगीत में भी इसका स्थान बना. दक्षिण भारत में मान्यता है कि इसे सच्चे भाव से गाने पर बारिश जरूर होती है. एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी का गायन इस राग में अनुपम है. उनकी आवाज़ जैसे बरसात के बाद पहली धूप की तरह आत्मा को छू जाती है.