ईरान युद्ध का असर अब सीधे दुनिया के किसानों और खाने की कीमतों पर पड़ने लगी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग बंद हो जाने से गैस और फर्टिलाइज़र की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे खेती पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है. यह स्ट्रेट दुनिया के करीब 20% तेल के साथ-साथ लगभग एक-तिहाई फर्टिलाइजर ट्रेड के लिए अहम रास्ता है.
ईरान द्वारा इस स्ट्रेट पर कड़ी पहरेदारी करने के बाद नाइट्रोजन और फॉस्फेट जैसे जरूरी पोषक तत्वों की सप्लाई रुकने लगी है. खास तौर पर यूरिया, जो फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है, उसका स्टॉक तेजी से घट रहा है.
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विशेषज्ञों के मुताबिक, यह संकट ऐसे समय आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में बुवाई का सीजन शुरू हो चुका है. एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के डिप्टी एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर कार्ल स्काउ ने चेतावनी दी कि अगर हालात नहीं सुधरे तो अगले सीजन में पैदावार कम हो सकती है या फसलें पूरी तरह खराब भी हो सकती हैं. उनके अनुसार, "सबसे खराब स्थिति में फसलें फेल हो सकती हैं और सबसे अच्छी स्थिति में खाने की कीमतें बढ़ेंगी."
ईरान की जंग से किसान भी प्रभावित होंगे
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में भी इसका असर साफ दिख रहा है. एपी की रिपोर्ट में पंजाब के एक किसान बलदेव सिंह के हवाले से कहा गया है कि इससे छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे. उनका कहना है कि अगर सरकार जून में बढ़ने वाली मांग के दौरान सब्सिडी नहीं देती, तो कई किसानों के लिए खेती जारी रखना मुश्किल हो जाएगा. भारत पहले से ही अपनी उर्वरक जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, और इस संकट ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है.
वैश्विक स्तर पर देखें तो करीब 30% यूरिया व्यापार इस संघर्ष की वजह से प्रभावित हुआ है. सीआरयू ग्रुप के विश्लेषकों का कहना है कि गैस की कीमतें बढ़ने से यूरिया उत्पादन भी महंगा हो गया है, क्योंकि एलएनजी इसका प्रमुख कच्चा माल है. इसके अलावा, सऊदी अरब जैसे देश, जो दुनिया का बड़ा फॉस्फेट उत्पादक है, वहां से सप्लाई भी बाधित हो रही है.
दुनिया के कई देशों में खाद्य संकट का खतरा
रिपोर्ट की मानें तो अफ्रीका और एशिया के विकासशील देशों की स्थिति और ज्यादा नाजुक है. इथियोपिया जैसे देश अपनी 90% नाइट्रोजन जरूरत खाड़ी देशों से पूरी करते हैं. वहीं, केन्या और जाम्बिया जैसे देशों में थोड़ी सी देरी भी फसल उत्पादन को 4% तक घटा सकती है. रिपोर्ट में कहा गया है, "बुवाई का समय अभी है, लेकिन फर्टिलाइज़र उपलब्ध नहीं है."
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यूरोप और अमेरिका में भी असर दिखने लगा है. जर्मनी के किसान डर्क पीटर्स का कहना है कि फसलों को शुरुआती विकास के लिए तुरंत नाइट्रोजन की जरूरत होती है. अगर यह समय निकल गया, तो बाद में सप्लाई आने का भी ज्यादा फायदा नहीं होगा.
हालात को और जटिल बनाता है यह तथ्य कि विकल्प बहुत सीमित हैं. चीन, जो दुनिया का सबसे बड़ा फर्टिलाइज़र उत्पादक है, फिलहाल घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दे रहा है. वहीं रूस की उत्पादन क्षमता पहले से ही लगभग पूरी तरह इस्तेमाल हो रही है. ऐसे में सप्लाई गैप भरना आसान नहीं है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो इसका सीधा असर खाने की कीमतों पर पड़ेगा. कम उत्पादन, महंगे इनपुट और सप्लाई चेन में रुकावट, ये तीनों मिलकर वैश्विक खाद्य संकट को गहरा कर सकते हैं.
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