ट्रंप ने बना लिया प्लान! ईरान युद्ध में साथ नहीं दे रहे यूरोप से यूं लेंगे बदला

स्पेन की बार्सिलोना यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर रफा मार्टिनेज ने कहा कि अमेरिका द्वारा यूरोप से सैन्य ठिकानों को हटाना नाटो के अंत की शुरुआत भी हो सकता है.

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डोनाल्ड ट्रंप यूरोप से खफा हैं. (Photo: AP) डोनाल्ड ट्रंप यूरोप से खफा हैं. (Photo: AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 10:25 PM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप  यूरोप स्थित अपने सैन्यअड्डों को शिफ्ट कर सकते हैं. ट्रंप का कहना है कि अगर यूरोपीय देश इसी तरह पहुंच को सीमित करते रहे तो वे बहुत जल्द बड़ा कदम उठाएंगे.

स्पेन की बार्सिलोना यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर रफा मार्टिनेज ने कहा कि अगर यूरोप इसी तरह अड़चन अड़ाता रहा तो ट्रंप यूरोप स्थित अपने मिलिट्री बेस को मोरक्को शिफ्ट कर सकते हैं. 

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उन्होंने कहा कि ट्रंप का यह फैसला आसान नहीं होगा और ना ही सस्ता होगा लेकिन ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका और उसके कुछ यूरोपीय सहयोगियों के बीच हालिया तनाव को देखते हुए इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

मार्टिनेज ने कहा कि अमेरिका द्वारा यूरोप से सैन्य ठिकानों को हटाना नाटो के अंत की शुरुआत भी हो सकता है, हालांकि हमें यह नहीं पता कि क्या हम पहले से ही उस स्थिति में पहुंच चुके हैं. यह भी स्पष्ट नहीं है कि नाटो एक समाप्त हो चुका संगठन है या अभी भी दम रखता है. 

किन-किन मामलों में यूरोप है अमेरिका के सहारे

- सैन्य सुरक्षा के लिए नाटो, अमेरिका का सबसे बड़ा आसरा है. अगर यूरोप के किसी देश पर हमला हो तो अनुच्छेद 5 के तहत अमेरिका को उसकी सेफ्टी देखनी होगी. यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप वैसे ही डरा हुआ है, जिस पर ट्रंप प्रशासन नाटो से दूरी की बात कह चुका. अब यूरोप को डिफेंस की नए सिरे से तैयारी करनी होगी.

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- रूस से गैस आयात कम करने के बाद यूरोप को अमेरिका से लिक्विफाइड नेचुरल गैस की सप्लाई पर बहुत हद तक निर्भर रहना पड़ा. यूएस किसी भी वजह से सप्लाई घटा दे तो यूरोप में एनर्जी क्राइसिस आ सकता है.

- ग्लोबल बाजार में यूएस करेंसी डॉलर की भूमिका सबसे ज्यादा है. यूरोपियन करेंसी भी मजबूत है, लेकिन डॉलर के मुकाबले कुछ कमतर ही है. युद्ध के दौर में जब रूस और अमेरिका करीब आते दिख रहे हैं, यूरोप को भी नया साथी तलाश करना होगा. ये चीन भी हो सकता है. हाल में म्यूनिख कॉन्फ्रेंस के दौरान बीजिंग ने ऐसे संकेत भी दिए, लेकिन बीजिंग खुद विस्तारवादी नीतियों वाला रहा, ऐसे में ईयू को देखना होगा कि वो कितना सावधान रह सकता है.

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