ईरान पर दोबारा हमले के खिलाफ UAE-सऊदी-कतर, ट्रंप से की 'कूटनीति' को मौका देने की अपील

ईरान को लेकर मध्य पूर्व में फिर से तनाव बढ़ने की आशंका के बीच संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कतर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सैन्य कार्रवाई से बचने की अपील की है. खाड़ी देशों का कहना है कि युद्ध दोबारा शुरू होने पर तेल-गैस आपूर्ति, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है.

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खाड़ी देशों ने ट्रंप से ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई शुरू न करके कूटनीति समाधान तलाशने की अपील की है. (Photo: AP) खाड़ी देशों ने ट्रंप से ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई शुरू न करके कूटनीति समाधान तलाशने की अपील की है. (Photo: AP)

aajtak.in

  • अबू धाबी,
  • 23 मई 2026,
  • अपडेटेड 3:01 AM IST

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के खिलाफ दोबारा युद्ध शुरू करने से रोकने के लिए अब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भी सऊदी अरब और कतर के साथ खुलकर सामने आ गया है. खाड़ी देशों के नेताओं ने ट्रंप को चेतावनी दी है कि ईरान पर फिर से सैन्य कार्रवाई पूरे खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है और तेल-गैस आधारित अर्थव्यवस्थाओं को भारी नुकसान पहुंचा सकती है.

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सूत्रों के मुताबिक यूएई, सऊदी अरब और कतर ने ट्रंप से अलग-अलग बातचीत कर कहा कि केवल सैन्य कार्रवाई से अमेरिका अपने दीर्घकालिक लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएगा और कूटनीति को एक और मौका दिया जाना चाहिए. यूएई का यह रुख इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वह पहले ईरान के खिलाफ अपेक्षाकृत सख्त रुख अपनाता रहा है. 

पिछले संघर्ष के दौरान फरवरी के आखिर से अप्रैल की शुरुआत तक ईरान और उसके समर्थित मिलिशिया समूहों ने खाड़ी क्षेत्र में ड्रोन और मिसाइल हमले किए थे, जिससे बंदरगाहों और ऊर्जा ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा था. रिपोर्ट्स के मुताबिक उस दौरान यूएई ने अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर सीमित हमले भी किए थे, जबकि सऊदी अरब ने अलग रणनीति अपनाई थी. 

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हालांकि 8 अप्रैल को ईरान और अमेरिका के बीच अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बनी और अब दोनों देशों के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता के जरिए संभावित शांति समझौते को लेकर संदेशों का आदान-प्रदान जारी है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी माना है कि ईरान के साथ बातचीत में थोड़ी प्रगति हुई है. वहीं यूएई की अपने खाड़ी सहयोगियों से बढ़ती नाराजगी को अप्रैल के आखिर में ओपेक छोड़ने के फैसले की एक वजह माना जा रहा है.

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों ने ओमान को छोड़कर ईरान की उस कोशिश का विरोध किया, जिसमें वह रणनीतिक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए समुद्री आवाजाही को नियंत्रित करना चाहता था. संघर्ष के दौरान ईरान ने प्रभावी रूप से होर्मुज को बंद कर दिया था, जिससे खाड़ी देशों के तेल और गैस निर्यात पर बड़ा असर पड़ा और वैश्विक ऊर्जा कीमतें बढ़ गईं.

हाल ही में यूएई के एक परमाणु संयंत्र पर ड्रोन हमले के बाद तनाव और बढ़ गया. इस हमले के लिए इराक स्थित ईरान समर्थित मिलिशिया समूहों को जिम्मेदार ठहराया गया. डोनाल्ड ट्रंप ने खुलासा किया कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद और कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद से बातचीत के बाद उन्होंने ईरान पर बड़े सैन्य हमले का फैसला टाल दिया.

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दूसरी ओर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अब भी ईरान के खिलाफ कड़ी सैन्य कार्रवाई की वकालत कर रहे हैं. यूएई के राष्ट्रपति सलाहकार अनवर गरगाश ने चेतावनी दी कि एक और युद्ध पूरे क्षेत्र को और ज्यादा अस्थिर कर देगा. सऊदी अरब ने पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली कोशिशों का समर्थन करते हुए कहा है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों और क्षेत्रीय गतिविधियों से जुड़े मुद्दों का समाधान केवल बातचीत से ही संभव है. 

कतर ने भी तनाव कम करने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन किया है. यूएई ने दोहराया है कि ईरान के साथ किसी भी अंतिम समझौते में उसके परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन नेटवर्क और प्रॉक्सी समूहों की गतिविधियों को शामिल किया जाना चाहिए.

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