भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को दो दिवसीय दौरे पर इजरायल पहुंच चुके हैं. उनके स्वागत के लिए एयरपोर्ट पर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपनी पत्नी सारा के साथ मौजूद थे. इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत के एक अहम ट्रेड और डिफेंस पार्टनर इजरायल के साथ रणनीतिक रिश्तों को और अधिक मजबूती देना है.
पीएम मोदी ने इजरायल रवाना होने से पहले एक बयान में कहा था, 'हमारे देशों के बीच एक मजबूत और कई तरह की स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप है.'
उन्होंने कहा कि वह अपने समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू से मिलेंगे और इजरायल की पार्लियामेंट कनेस्सेट को संबोधित करेंगे.
पीएम मोदी का इजरायल दौरा ऐसे वक्त में हो रहा है, जब वेस्ट बैंक में इजरायल की गतिविधियों की इस्लामिक देश कड़ी आलोचना कर रहे हैं और मिडिल-ईस्ट में तनाव कायम है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी दी है और अगर ऐसा होता है तो मिडिल ईस्ट में एक बड़ा संघर्ष छिड़ने की आशंका है.
प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे की वर्ल्ड मीडिया में खूब चर्चा हो रही है, खासकर इस्लामिक देशों की मीडिया में. पड़ोसी देश पाकिस्तान का मीडिया तो पीएम मोदी के इजरायली दौरे को अपने लिए खतरे की घंटी बता रहा है.
मोदी के इजरायल दौरे से पाकिस्तान को 'घबराहट'
पाकिस्तान के प्रमुख अखबार 'Dawn' ने अपनी वेबसाइट पर एक आर्टिकल में लिखा, भारत और इजरायल के बीच पूर्ण कूटनीतिक संबंध साल 1992 में बने थे. हालांकि 2014 में मोदी के सत्ता संभालने के बाद इस रिश्ते में और गर्मजोशी आई है.
मोदी ने 2017 में प्रधानमंत्री के तौर पर इजरायल का पहला दौरा किया था जिसके अगले साल नेतन्याहू ने भी भारत का दौरा किया. दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को दोस्त कहा था.
डॉन ने लिखा है, 'मई 2025 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की स्थिति बनी तो इजरायल की मिलिट्री ड्रोन टेक्नोलॉजी का उपयोग पाकिस्तान के खिलाफ डिफेंस स्ट्रैटजी के रूप में किया गया था.
पाकिस्तानी वेबसाइट ने लिखा, यह व्यापार और तकनीक के क्षेत्र में भारत-इजरायल की साझेदारी को दर्शाता है. लेकिन इजरायल के साथ ही भारत खाड़ी देशों और ईरान के साथ भी मजबूत रिश्ते बनाए हुए है. उदाहरण के लिए भारत ने ईरान का चाबहार पोर्ट डेवलप किया है जो अफगानिस्तान के लिए एक ट्रेड गेटवे है. अफगानिस्तान के तालिबानी अधिकारियों के साथ भी भारत ने रिश्ते कायम किए हैं.'
डॉन ने कांग्रेस पार्टी की सीनियर नेता प्रियंका गांधी के बयान का भी जिक्र किया है. प्रियंका गांधी ने PM मोदी के दौरे को लेकर बुधवार को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था कि उन्हें उम्मीद है कि मोदी इजरायल की संसद को संबोधित करते समय गाजा में हजारों बेगुनाह पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की हत्या का जिक्र करेंगे.
नेतन्याहू के बयान को लेकर खूब चर्चा
पाकिस्तानी टीवी चैनल जियो न्यूज के 'कैपिटल टॉक' शो में पीएम मोदी के इजरायल दौरे को लेकर हेडलाइन दी गई है- पीएम मोदी का इजरायल दौरा पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी. वहां के मीडिया में सबसे ज्यादा चिंता जताई जा रही है इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के उस बयान को लेकर जिसमें उन्होंने कट्टर शिया और सुन्नी एक्सिस को खतरा बताते हुए भारत, ग्रीस, साइप्रस और कुछ अरब, एशियाई और अफ्रीकी देशों के साथ एक गठजोड़ बनाने की बात कही.
पाकिस्तानी संसद में भी इस बयान का विरोध करते हुए मंगलवार शाम को एक प्रस्ताव पारित किया गया है.
क्या है नेतन्याहू का हेक्सागन गठबंधन और उन्होंने क्या कहा था ?
इजरायली पीएम नेतन्याहू ने 22 फरवरी को कैबिनेट बैठक में इस अलायंस का खाका पेश किया. उन्होंने कहा कि हम मिडिल ईस्ट के आसपास या उसके भीतर गठबंधनों की एक पूरी व्यवस्था बनाएंगे. इसमें भारत, अरब देश, अफ्रीकी देश, भूमध्यसागरीय देश (ग्रीस और साइप्रस) और एशिया के कुछ देश शामिल होंगे, जिनका अभी मैं विस्तार से उल्लेख नहीं करूंगा. मैं इसे व्यवस्थित तरीके से पेश करूंगा.
नेतन्याहू ने कहा कि मकसद उन देशों को एक साथ लाना है, जो वास्तविकता, चुनौतियों और लक्ष्यों को लेकर एक समान सोच रखते हों ताकि कट्टरपंथी ताकतों का मुकाबला किया जा सके, फिर चाहे वह कट्टर शिया हो, जिन पर हमने कड़ा हमला किया है या सुन्नी. इन सभी देशों का अलग-अलग दृष्टिकोण है और हमारा सहयोग बड़े परिणाम दे सकता है. इसके साथ ही हमारी स्थिरता और भविष्य को सुरक्षित कर सकता है. यह फ्रेमवर्क सुरक्षा, खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान और रक्षा सहयोग को गहरा करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है.
पाकिस्तानी एंकर हामिद मीर ने कहा कि ये मामला बहुत नाजुक है क्योंकि चंद दिनों पहले अमेरिका के राजदूत ने एक इंटरव्यू में 'ग्रेटर इजरायल' की बात कही थी. इसकी सऊदी अरब, मिस्र और जॉर्डन समेत कई अरब देशों ने कड़ी आलोचना की थी. एक तरफ नेतन्याहू पीएम मोदी का स्वागत कर रहे हैं, दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर हमले का मंसूबा बनाए हुए हैं. बहुत सारे मामलों पर ये सारे इकट्ठे हो गए हैं. पाकिस्तान के लिए बहुत चिंता वाली स्थिति बन गई है. अफगानिस्तान से पाकिस्तान पर हमले हो रहे हैं और अगर ईरान और अमेरिका की जंग शुरू हो गई तो पाकिस्तान के लिए तो बड़े मुश्किल भरे हालात हो जाएंगे.
इस कैपिटल टॉक शो में शामिल हुईं संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि रहीं मलीहा लोधी ने कहा कि पाकिस्तान की सीनेट ने पीएम मोदी के इजरायल दौरे से ठीक पहले जो रिजॉल्यूशन पास किया है, वो बहुत जरूरी था. ये गठजोड़ एंटी-मुस्लिम है. नेतन्याहू ने सुन्नी और शिया एक्सिस को लेकर जो बयान दिया, उससे उनके मंसूबे खुलकर सामने आ गए हैं.
पाकिस्तानी एंकर ने ये भी कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने गाजा में शांति कायम करने को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले 'बोर्ड ऑफ पीस' में जो शिरकत की, पीएम मोदी का इजरायल दौरा उसका जवाब हो सकता है.
पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने कहा कि पाकिस्तान को इतनी हड़बड़ी में 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल ही नहीं होना चाहिए था, वहां इजरायल के विदेश मंत्री मौजूद थे. अगर आप उसी फोरम में बैठे हैं तो कई लोग कह रहे कि ये इजरायल को एक तरह से मान्यता दे ही रहे हैं.
पाकिस्तान ने इजरायल को एक स्वतंत्र देश के तौर पर आज तक मान्यता नहीं दी है. पाकिस्तान का कहना है कि फिलीस्तीन मुद्दे के समाधान के बिना वह इजरायल के साथ राजनयिक रिश्ते कायम नहीं करेगा.
मलीहा लोधी ने अंत में कहा कि नेतन्याहू गाजा में अपनी कार्रवाइयों की वजह से पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ चुके हैं और ऐसे में पीएम मोदी इस दौरे में कुछ पाकर नहीं बल्कि खोकर लौटेंगे.
इजरायल के अलायंस से पाकिस्तान घबराया
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार, राजनयिक और राजनीतिक विश्लेषक मुशाहिद हुसैन ने कहा, 'नेतन्याहू ने भारत के साथ इस एंटी सुन्नी और शिया गठबंधन में साइप्रस को, ग्रीस को और कुछ अफ्रीकन देशों को भी शामिल किया है तो इसके पीछे इजरायल का अपना 'ग्रेटर इजरायल' का एजेंडा भी है. 'ग्रेटर इजरायल' में सऊदी अरब के कुछ हिस्सों को भी शामिल करने का मकसद है. दूसरी तरफ पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक डिफेंस पैक्ट है जिसके तहत किसी एक पर भी हमला होता है तो दूसरा देश उसका साथ देगा.
मिडिल ईस्ट मॉनिटर ने लिखा है, कई दशकों तक भारत ने फिलिस्तीनी स्टेट की स्थापना, उपनिवेशवाद विरोध और गुटनिरपेक्ष आंदोलन का मजबूती से समर्थन किया. आलोचकों का कहना है कि इजरायल के साथ मौजूदा दोस्ती उसके अपने पुराने सिद्धातों से भटकाव की तरह है.
मिडिल ईस्ट मॉनिटर ने लिखा है, "साल 2018 से भारत ने आधिकारिक रूप से इजरायल के साथ अपने रिश्तों को फिलीस्तीन से अलग करके देखना शुरू कर दिया है. भारत फिलीस्तीन राष्ट्र का समर्थन करता है लेकिन साथ ही इजरायल के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को भी गहरा कर रहा है. भारत ने समय-समय पर गाजा में युद्धविराम और मानवीय सहायता की अपील की है लेकिन उसने शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र के उन प्रस्तावों से दूरी बनाई जिनमें तत्काल युद्धविराम की मांग की गई थी. इस रुख की भारत के विपक्ष ने भी आलोचना की थी."
हालांकि, साल 2025 के अंत में और इस साल की शुरुआत में भारत अरब देशों और इजरायल के बीच एक संतुलन साधने की कोशिश करता दिख रहा है. इसमें भारत का वेस्ट बैंक में इजरायली कार्रवाइयों की आलोचना करने वाले बयानों पर हस्ताक्षर करना और द्वि-राष्ट्र समाधान को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराना जैसे कदम शामिल हैं. मिडिल ईस्ट मॉनिटर ने लिखा है कि एक लोकतांत्रिक देश और ग्लोबल साउथ के एक नेता के रूप में भारत को अंतरराष्ट्रीय शांति को बढ़ावा देना चाहिए और गाजा जैसे मामलों में अन्याय के खिलाफ खड़ा होना चाहिए.
कतर बेस्ड चैनल अल जजीरा ने लिखा है, साल 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत और इजरायल के संबंधों में बड़ा बदलाव आया है. साल 2017 में पीएम मोदी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे.
भारत एशिया में चीन के बाद इजरायल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, 1992 में दोनों देशों का व्यापार 200 मिलियन डॉलर था जो 2024 में बढ़कर 6.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया.
भारत इजरायल को मोती, कीमती पत्थर, ऑटोमोटिव डीजल, रसायन, मशीनरी और विद्युत उपकरण का निर्यात करता है जबकि आयात में पेट्रोलियम, रासायनिक मशीनरी और परिवहन उपकरण शामिल हैं.
'मिडिल ईस्ट आई' में वरिष्ठ संवाददाता Azad Essa ने Al Jazeera से कहा कि मोदी की इजरायल यात्रा दिखाती है कि पिछले एक दशक में दोनों देशों के संबंध कितना आगे बढ़ चुके हैं. हालांकि साझेदारी पहले भी मौजूद थी, लेकिन मोदी से पहले यह काफी सीमित थी.
उन्होंने कहा, “यह यात्रा बेंजामिन नेतन्याहू के लिए मोदी के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर होगी, और वे इसका इस्तेमाल इजरायलियों को यह दिखाने के लिए करेंगे कि वे ग्लोबल साउथ में एक सम्मानित और लोकप्रिय नेता हैं.”
अलजजीरा ने लिखा, मोदी के नेतृत्व में भारत, इजरायल का सबसे बड़ा हथियार खरीदार बन गया है. भारत और इजरायल दोनों ही 'इस्लामी आतंकवाद' को एक बड़ा खतरा मानते हैं.
अलजजीरा ने लिखा है, पीएम मोदी का इजरायल दौरा ऐसे वक्त में हो रहा है जब मध्य-पूर्व क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ है. दोनों देशों के रिश्तों में आई गर्मजोशी के बावजूद मोदी के दौरे से ठीक एक हफ्ते पहले भारत ने वेस्ट बैंक में इजरायल की कार्रवाइयों की आलोचना करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया. इस प्रस्ताव का 100 से ज्यादा देशों ने समर्थन किया था. भारत ने शुरुआत में इजरायल के खिलाफ आने में झिझक दिखाई लेकिन 18 फरवरी को इस बयान पर साइन कर दिए.
अलजजीरा ने लिखा, विश्लेषकों का कहना है कि पीएम मोदी का ये दौरा एक तरह से वेस्ट बैंक में इजरायली नीतियों को समर्थन देने के तौर पर भी देखा जा रहा है. ये दौरा ऐसे वक्त में हो रहा है जब दुनिया भर में नेतन्याहू ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में उनके खिलाफ वारंट जारी हो चुका है, ऐसे में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता को बुलाकर वह खुद को मजबूत दिखाना चाहते हैं.
हालांकि, भारत के कई विश्लेषकों का कहना है कि यह यात्रा भारत की विदेश नीति की परीक्षा भी होगी, क्योंकि उसके सामने इजरायल और अरब देशों के साथ संतुलन बनाने की चुनौती है. विदेश नीति विशेषज्ञ हर्ष वी. पंत ने कहा कि भारत यह दिखाना चाहता है कि वह इजरायल के साथ अपनी साझेदारी के प्रति प्रतिबद्ध है, साथ ही वह मध्य पूर्व में अपनी प्राथमिकताओं को संतुलित करने की कोशिश भी कर रहा है.
भारत ने 7 अक्टूबर के इजरायल पर हमास के हमलों की निंदा की है और इजरायल के साथ एकजुटता जाहिर की है, साथ ही गाजा में नागरिकों के मारे जाने पर चिंता भी जताई है और दो-राष्ट्र समाधान के प्रति अपना समर्थन दोहराया है.
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विशेषज्ञ कबीर तनेजा का कहना है कि मोदी की यह यात्रा मुख्य रूप से जरूरत पर आधारित है. उन्होंने बीबीसी से कहा, "भारत ने 1988 में फिलिस्तीन को मान्यता दी थी. राजनीतिक स्तर पर जो किया जा सकता था, वह काफी हद तक किया जा चुका है… भारत की लंबे समय से चली आ रही नीति के अनुसार, क्षेत्रीय संघर्षों का समाधान उसी क्षेत्र द्वारा किया जाना चाहिए. भारत अपने मामलों में भी बाहरी हस्तक्षेप की अपेक्षा नहीं करता, और यही सिद्धांत वह मध्य पूर्व पर भी लागू करता है."
तनेजा ने यह भी कहा कि भारत की स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी कई मोर्चों पर अभी भी पीछे है, खासकर जब युद्ध एडवांस तकनीक पर आधारित होता जा रहा है. पाकिस्तान और चीन के साथ तनाव को देखते हुए भारत के पास एडवांस्ड तकनीकी उपकरण को खरीदने से इनकार करने का विकल्प नहीं है और इजरायल भारत की इस जरूरत को अच्छी तरह से पूरी कर रहा है.
तनेजा ने कहा कि मध्य पूर्व में क्षेत्रीय स्थिरता भी भारत के व्यापक हितों जैसे कनेक्टिविटी और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से काफी अहम है. ऐसे में मोदी जब भारत-इजरायल संबंधों का जिक्र करेंगे तो इस बात का भी ध्यान रखेंगे कि मध्य पूर्व के इजरायल विरोधी देशों के साथ भारत के दीर्घकालिक संबंध प्रभावित न हों.
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