एक बहुत पुराना मजाक है कि अमेरिका में कभी तख्तापलट क्यों नहीं होता? क्योंकि अमेरिका में कोई अमेरिकी दूतावास नहीं है. वॉशिंगटन पोस्ट और कुछ दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद से अमेरिका ने दुनिया भर के दूसरे देशों की सरकारों को गिराने यानि तख्तापलट की करीब सौ बार कोशिश की. ऐसे देशों की तो कोई गिनती ही नहीं जहां अमेरिका ने अपनी सेना ना भेजी हो या जंग ना की हो. बस यूं समझ लीजिए कि दुनिया के दूर दराज के किसी कोने में, किसी छोटे से देश में भी कुछ हो रहा हो या ना भी हो रहा हो तो भी अमेरिका वहां कूद पड़ता है.
आंकड़ा ये बताता है कि 1776 में जबसे अमेरिका का जन्म हुआ, तबसे लेकर अब तक सिर्फ 20 साल को अलग कर दें तो 239 साल पुराना अमेरिका 222 सालों तक किसी ना किसी देश में जंग लड़ता ही रहा है. अब सवाल ये है कि करीब 8 अरब की आबादी वाली इस दुनिया में जो 195 देश हैं, उन सभी देशों में हमेशा अमेरिका अपना सिक्का क्यों चलाना चाहता है? उन देशों में वो हमेशा अपनी दखलअंदाजी क्यों करता है? तो उसका जवाब है एक कागज का टुकड़ा यानी डॉलर. बस उसी कागजी नोट ने अमेरिका को पिछले 60, 70 सालों से दुनिया का सुपर पावर बना रखा है. इस डॉलर का ही घमंड है जो अमेरिका के सिर चढ़कर बोलता है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ही इजरायल को साथ लेकर ईरान से जंग शुरू की. पर अब जब इस जंग की आंच तेल और गैस की शक्ल में पूरी दुनिया महसूस कर रही है, तब यही ट्रंप ये कह कर दुनिया भर के देशों का मजाक उड़ा रहे हैं कि दुनिया को ईरान से बचाने के लिए जंग की इतनी कीमत चुकानी ही होती है. थोड़ी परेशानी तो होती ही है. पर कोई नहीं. जल्द ही तेल और गैस के दाम पहले जैसे हो जाएंगे.
अभी तो तेल की आग सिर्फ पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, सिंगापुर और कुछ अन्य देशों तक ही पहुंची है. भारत में होटलों और रेस्तरां के चूल्हे अभी सिर्फ बेंगलुरु में बुझे हैं. मुंबई में इसका ट्रेल दिखने लगा है. पर आने वाले दिनों में ये गैस और तेल क्या खेल करेंगे, कहना मुश्किल है. वैसे भी ट्रंप को दुनिया की परेशानी से क्या लेना? अमेरिका वो देश है, जिसके पास इस वक्त 44 से 48 अरब बैरल कच्चे तेल का भंडार है. ये तेल के दुनिया के सबसे उत्पादकों में से एक है.
लेकिन कमाल देखिए अमेरिका अपने तेल के भंडार का इस्तेमाल खुद नहीं करता. बल्कि दूसरे देशों को बेचता है. और अपने लिए दूसरे देशों से तेल खरीदता है. जानते हैं क्यों? तो चलिए आपको इस पूरे मामले की सच्चाई बताते हैं. ये मामला हल्के और भारी तेल का है. अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट के मुताबिक़ अमेरिका का 80 प्रतिशत तेल हल्के किस्म का है. जबकि अमेरिका की ज़्यादातर तेल रिफ़ाइनरी भारी तेल के हिसाब से बनी हैं.
20वीं सदी में अमेरिका को मिलने वाला ज़्यादातर तेल लैटिन अमेरिका और कनाडा से आयात किया जाता था, जो भारी कच्चा तेल होता था और उन दिनों में अमेरिका में रिफाइनरीज़ भी इसी हिसाब से बनी. इसके बाद 2000 के दशक की शुरुआत में अमेरिकी के तेल उत्पादन में एक बड़ा बदलाव आया। टेक्नोलॉजी बदली और शेल चट्टानों से बड़े पैमाने पर हल्का कच्चा तेल निकाला जाने लगा. अब अमेरिका जिस तरह का कच्चा तेल निकालता है, वो हल्के किस्म का है और उसके पास जैसी रिफाइनरियां हैं, वो भारी तेल के लिए है. यानी तेल और रिफाइनरियों में मेल नहीं है.
एक्सपर्ट्स की मानें तो रिफाइनरियां बनाना भी आसान नहीं हैं. इनमें करोड़ों डॉलर का खर्च आता है. एक फैक्ट ये भी है कि हल्का कच्चा तेल क्वालिटी के हिसाब से भारी तेल के मुकाबले अच्छा होता है. जिसकी दुनिया के बाजार में अच्छी कीमत मिलती है. ऐसे में अमेरिका खुद अपना हल्का कच्चा तेल दूसरे देशों में निर्यात कर उससे मोटा मुनाफा कमाता है, जबकि दूसरों से सस्ते दर पर भारी तेल मंगवा कर उसे रिफाइन करवा लेता है. यानी उसे दोनों तरफ से फायदा है.
वैसे अगर दुनिया के बारे में बात करें तो जिनके पास सबसे ज्यादा तेल के भंडार हैं और जो तेल बेचते भी हैं, उनमें पहले नंबर पर वेनेजुएला है. जिसके पास 303 अरब बैरल तेल का भंडार है. तेल के भंडार के मामले में ये पहले नंबर पर है. लेकिन अमेरिकी प्रतिबंध के चलते वेनेजुएला भंडार के हिसाब से ना तेल निकाल पाता है, ना बेच पाता है. तेल भंडार और उत्पादन के हिसाब से सऊदी अरब दूसरे नंबर पर है. जिसके पास इस वक़्त 267 अरब बैरल तेल का भंडार है और अब ध्यान दीजिएगा. तीसरा देश जिसके पास तेल का सबसे बड़ा भंडार है, वो कोई और नहीं इस वक्त अमेरिकी हमले को झेल रहा ईरान है. ईरान के पास इस वक्त 209 अरब बैरल तेल का भंडार है. इतना ही नहीं गैस उत्पादन के मामले में भी ईरान दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है. रोजाना की खपत को देखते हुए ईरान के पास इस वक़्त इतना तेल है, जो आने वाले 290 सालों तक ख़त्म नहीं हो सकता. ईरान के बाद इराक़, यूएई, कुवैत, रूस और लीबिया भी उन देशों में आते हैं, जिनके पास सबसे ज्यादा तेल के भंडार है.
क्या आपको पता है पूरी दुनिया में 90 फीसदी से ज्यादा तेल की खरीद फरोख्त किस करंसी से होती है? वो है डॉलर! अमेरिकी करंसी. और जब इसी डॉलर से तेल या गैस खरीदा जाता है, तो वो डॉलर पेट्रो डॉलर बन जाता है. अब इस डॉलर या पेट्रो डॉलर के नाम पर अमेरिका कैसी दादागीरी करता है, कैसे दूसरे देशों में दखल देता है, कैसे दूसरे देशों पर हमले करता है और कैसे उन देशों में तख्ता पलट करता है. इसकी पूरी कहानी भी आपको तफ्सील से बताते हैं.
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेफ्री डी सैक्स के मुताबिक, 1947 से लेकर 1989 तक अमेरिका ने 70 अलग-अलग देशों में सत्ता परिवर्तन की कोशिश की, जिनके दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं. लेकिन ये सिलसिला इसके बाद भी नहीं थमा. अमेरिका ने 1989 से लेकर अब तक दर्जनों मुल्कों में सत्ता परिवर्तन के लिए अलग-अलग किस्म के ऑपरेशन किए. फिर चाहे वो खुलेआम हों या फिर ढके-छुपे तरीके से.
जिन देशों में अमेरिका ने ये हथकंडा आजमाया, उनमें सर्बिया, अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया, सूडान, ईरान, यूक्रेन, जॉर्जिया, हैती, वेनेजुएला, ग्रांडा, पनामा, पाकिस्तान समेत और भी कई देश शामिल हैं. प्रोफेसर जेफ्री के मुताबिक अगर इन सारे ऑपरेशंस को इस लिस्ट में जोड़ दिया जाए, तो तख्तापलट की अमेरिकी कोशिशों की तादाद सौ तक पहुंच जाएगी. हालांकि वो कहते हैं कि 1989 के बाद इस मामले को लेकर कोई पक्की स्टडी सामने नहीं आई है. क्योंकि इनमें से ज्यादातर ऑपरेशंस सीक्रेट रहे और अमेरिका ऐसी तख्ता पलट की कोशिशों से इनकार भी करता रहा.
ये सारी जंग, ये सारी दादागीरी, ये सारी हेकड़ी और ये सुपरपावर का घमंड सिर्फ तबतक है, जब तक इस डॉलर या पेट्रो डॉलर का रुतबा है. पर इतिहास गवाह है कि जब जब इस डॉलर के रुतबे को दुनिया के किसी भी देश ने कम करने की कोशिश की उस देश को अमेरिका ने बर्बाद करके रख दिया.
इसी साल जनवरी में एक तस्वीर को देख कर पूरी दुनिया हैरान तो जरूर हुई थी, पर मजाल क्या जो अमेरिकी दादागीरी के खिलाफ कोई देश अपना मुंह खोलता. एक देश के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को उन्हीं के देश में घुस कर अमेरिका पहले बंधक बनाता है, फिर अमेरिका लाता है और इसके बाद दोनों को जेल में डाल देता है. याद रखिए ये वो वेनेजुएला है, जिसके पास दुनिया भर में मौजूद तेल के भंडार का अकेले 17 फीसदी हिस्सा है. वेनेजुएला तेल उत्पादन के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा देश है. एक रिपोर्ट के मुताबिक वेनेजुएला में कुल 303 अरब बैरल तेल का भंडार है. इसीलिए अमेरिका को वेनेजुएला या उसके राष्ट्रपति से कोई मतलब नहीं, उसे मतलब था तो फिर सिर्फ वेनेजुएला के तेल से. और अब वो उसके कब्जे में है. यानी तेल के भंडार वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश अब एक तरह से अमेरिका के कब्जे में है.
सद्दाम हुसैन की कहानी तो याद होगी आपको. ये भी आपको याद होगा कि कैसे अमेरिका ने इराक के पास मास डिस्ट्रक्शन वेपन के नाम पर इराक पर नाटो सेना के जरिए हमला किया और कैसे सद्दाम हुसैन को फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया. पर आजतक इराक से वो मास डिस्ट्रक्शन वेपन कभी नहीं मिला. फिर ईराक में तख्तापलट और सद्दाम को मारने की असली वजह क्या थी? ये वजह थी वही डॉलर.
एक रिपोर्ट के मुताबिक ईराक पर अमेरिकी हमले से करीब 3 महीने पहले सद्दाम हुसैन ने अपने कैबिनेट में एक फैसला लिया था. फैसला ये कि अब ईराक तेल का कारोबार डॉलर में नहीं बल्कि यूरो में करेगा. कहते हैं तब सद्दाम हुसैन ने अमेरिकन बैंक में रखे कई मिलियन डॉलर निकालकर उसे यूरो में कनवर्ट कर दिया था. डॉलर की जगह यूरो में कारोबार का मतलब साफ था कि डॉलर का रुतबा कम होता और बस इसी वजह से मास डिस्ट्रक्शन वेपन की आड़ में ईऱाक में तख्तापलट कर सद्दाम हुसैन को मार डाला गया. तबसे लेकर आजतक तेल संपन्न देश होने के बावजूद इराक बदहाल है.
लीबिया पर करीब 40 साल तक हुकुमत करने वाले कर्नल मोअम्मार गद्दाफी की कहानी भी सद्दाम हुसैन से कतई अलग नहीं थी. अमेरिका ने गद्दाफी पर मानवाधिकार के उल्लघंन का इल्जाम लगाया और 2011 में लीबिया में तख्तापलट कर वो हालात पैदा कर दिए कि कर्नल गद्दाफी मारे गए. साल 2011 के बाद से आजतक कभी एक संपन्न देश रहा लीबिया बदहाली के कगार पर है. अमेरिका को तब भी कर्नल गद्दाफी की हुकुमत या लीबिया में मानवाधिकार के उल्लघंन से कोई लेना देना नहीं था.
असल कहानी ये थी कि 2009 में कर्नल गद्दाफी जो तब अफ्रीकन यूनियन के प्रेसिडेंट भी थे, अफ्रीकन देशों के लिए ट्रेड के वास्ते डॉलर की जगह एक नई करंसी गोल्ड दीनार शुरु करने का प्रस्ताव ला चुके थे. नाइजीरिया, ट्यूनीशिया, इजिप्ट और अंगोला इसके लिए राजी भी हो चुके थे. यानि इन देशों में अब व्यापार में लेन देन के लिए डॉलर की जगह गोल्ड दीनार चलन में आने वाला था. तब अमेरिका को ये भी खबर लग गई थी कि गोल्ड दीनार लाने के लिए कर्नल गद्दाफी लीबिया में बड़े पैमाने पर गोल्ड रिजर्व कर रहा है. तब लगभग डेढ़ सौ टन गोल्ड लीबिया जमा कर चुका था.
असल में किसी भी देश की करंसी की वैल्यू उस देश के नेशनल बैंक में जमा गोल्ड यानि सोने से आंकी जाती है. बस ये पता चलते ही मानवाधिकार के उल्लंघन का राग अलापते हुए अमेरिका ने नाटो देश के मदद से लीबिया में भी तख्तापलट कर कर्नल गद्दाफी को रास्ते से हटा दिया. तो डॉलर को सीधे चुनौती देने जा रहे इन दो देशों का हश्र आपके सामने है.
दुनिया भर के देशों में करीब 96 फीसदी कारोबार, ट्रेड या लेनदेन के लिए डॉलर का ही इस्तेमाल होता है. और बस डॉलर की इसी ताकत ने अमेरिका को सुपर पावर बना रखा है. पर क्या डॉलर का ये रुतबा कभी खत्म हो सकता है? साल 2024 में हुए ब्रिक्स समिट के दौरान रुस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने ब्रिक्स और उसके सर्मथक देशों के लिए एक नई करंसी लाने का प्रस्ताव रखा था. अपने नाम के हिसाब से ब्रिक्स के कुल 5 देश मेंबर हैं. ब्राजील, रशिया, इंडिया, चीन, साउथ अफ्रीका. इसके अलावा ईरान, यूएई, इजिप्ट और इथोपिया को भी इसमें शामिल किया जाता है.
ब्रिक्स में शामिल देशों की कुल जीडीपी दुनिया भर के देशों का 37 फीसदी है. जबकि आबादी के हिसाब से सिर्फ ब्रिक्स से जुड़े देशों की आबादी दुनिया भर की आबादी का 45 फीसदी है. अब जरा सोचिए अगर ब्रिक्स अपनी करंसी ले आया तो डॉलर का क्या होगा? पर ब्रिक्स को भी पता है कि वो जो भी करंसी लाएगा उसकी वैल्यू डॉलर से आंकी जाएगी. बस इसीलिए ब्रिक्स ने तय किया कि प्रस्तावित नई करंसी डॉलर से नहीं बल्कि उसकी वैल्यू ब्रिक्स के मेंबर देशों के बैंकों में रखे रिजर्व्ड गोल्ड यानि सोने के भंडार और उन देशों की करंसी के वैल्यू से आंकी जाएगी. 40 फीसदी वैल्यू सोने के कुल भंडार और 60 फीसदी इन देशों की अपनी करंसी की वैल्यू से. ब्रिक्स का प्लान ही यही है कि आने वाले वक्त में अलग अलग देशों के साथ जो भी व्यापार हो वो डॉलर से नहीं बल्कि ब्रिक्स की अपनी करंसी से हो.
भारत ब्रिक्स का एक अहम मेंबर है. पुतिन ने ब्रिक्स की नई करंसी बेशक 2024 में प्रस्तावित की हो पर उससे दो साल पहले ही 11 जुलाई 2022 को भारत सरकार ने एक बेहद अहम ऐलान किया था. ऐलान ये कि भारत दूसरे देशों के साथ अपना ट्रेड इंडियन करेंसी यानि भारतीय रुपए में करेगा. इस ऐलान के बाद की देशों के नेशनल बैंकों ने भारत में अपनी ब्रांच भी खोलनी शुरु कर दी. जाहिर है ये ऐलान अमेरिका को भी बुरा लगा होगा. पर भारत को भी पता है कि सिर्फ इंडियन करेंसी से ट्रेड करने का तब तक कोई मतलब नहीं जब तक की रुपये की वैल्यू मजबूत ना हो. और किसी भी देश की करेंसी तभी मजबूत होती है जब उस देश में सोने का भंडार यानि रिजर्व्ड गोल्ड ज्यादा होता है.
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने साल 2017 के बाद से ही बड़े पैमाने पर गोल्ड खरीदना शुरु कर दिया था. 2024 में तो भारत गोल्ड खरीदने के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश था. इस वक्त पूरी दुनिया में सोने का भंडार रखने के मामले में भारत आठवें नंबर पर है. भारतीय रिजर्व बैंक के पास इस वक्त करीब 840 टन गोल्ड का भंडार है. साल 2024 की सबसे ताजा रिपोर्ट के मुताबिक-
- गोल्ड रिजर्व यानी सोने का भंडार रखने के मामले में अमेरिका पहले नंबर पर है. अमेरिका के पास इस वक़्त कुल 8133 टन सोना है.
- दूसरे नंबर पर जर्मनी है जिसके पास 3355 टन सोना है.
- 2451 टन सोना के साथ इटली तीसरे नंबर है.
- चौथे नंबर पर फ्रांस है जिसके पास 2436 टन सोना है.
- पांचवें नंबर पर रूस है जिसके पास 2335 टन सोना है.
- छठे नंबर पर चीन है जिसके पास 2254 टन सोना है.
- 845 टन सोना के साथ जापान सातवें नंबर पर है.
- जबकि 840 टन सोना के साथ भारत आठवें नंबर पर है.
अब सोचिए डेढ़ सौ टन गोल्ड जमा करने की खबर सुनते ही जब अमेरिका ने लीबिया में तख्तापलट कर दिया तो भारत की अपनी करेंसी में व्याापर बड़े पैमाने पर गोल्ड जमा करना और ब्रिक्स के साथ नई करेंसी लाने पर गौर करना क्या अमेरिका और अमेरिकी डॉलर को सीधे चुनौती नहीं है?
वैसे आप में से कम लोगों को ही ये पता हो कि आाजदी के बाद 1947 से लेकर 1966 तक भारतीय करेंसी खाड़ी के देशों में भी चला करती थी. तब ओमान, यूएई, कतर, बहरीन और कुवैत में कोई दीनार या रियाल नहीं हुआ करता था बल्कि इन सभी देशों में भारतीय रुपये ही चला करते थे. असल में भारत के साथ साथ अंग्रेजों से इन देशों को भी आाजदी मिली थी. आजादी से पहले इन देशों में भारतीय रुपये ही चला करते थे.
मगर आजादी मिलने के बाद भी ओमान, यूएई, कतर, बहरीन और कुवैत ने अपनी करेंसी छापने की बजाय भारतीय रुपये को ही चलन में बनाए रखा. फिर एक वक्त ऐसा भी आया जब भारतयी रिजर्व बैंक ने इन देशों के लिए खास नोट छापने शुरु कर दिए थे. पिंक कलर के ये रुपए Z1 सीरीज के नाम से छपते थे. हालांकि सऊदी अरब का अपना टकसाल था लेकिन तब भारतीय रुपये की वैल्यू इतनी मजबूत थी कि भारत से हज के लिए जाने वाले भारतीयों के वास्ते भारतीय रिजर्व बैंक एक खास नोट छापता था. जिसे तब हज रुपये कहा जाता था. ये रुपये HA सीरीज के नाम से छपते थे.
पर 60 के दशक में अचानक भारतीय करेंसी को किसी की नजर लग गई. पहले चीन के साथ 62 की जंग फिर पाकिस्तान के साथ 65 की जंग और उसके बाद 1966 में बिहार में भयंकर सूखे ने भारतीय इकोनॉमी को तहस नहस करके रख दिया. एक्सपोर्ट लगभग बंद हो गया. इंपोर्ट जरूरत से ज्यादा होने लगा. मंहगाई आसमान छूने लगी और जो रुपये तब 4 रुपये प्रति डॉलर हुआ करता था वो अचानक बढ़कर साढे सात रुपए हो गया. खाड़ी देश घबरा गए. उन्हें जीडीपी गिरने का खतरा सताने लगा और तब इन तमाम देशों ने भारतीय रुपये की जगह अपनी अपनी करेंसी शुरु करने का फैसला किया. इस तरह 66 में अब खाड़ी के देशों में रुपये की जगह दीनार और दिरहम ने ले ली.
बदनसीबी देखिए कि जैसे ही खाड़ी के देशों ने अपनी करेंसी शुरु की उसके कुछ वक्त बाद ही इन देशों को ये पता चला कि उनके पास तेल का खजाना है. फिर क्या था किस्मत ने ऐसी पलटी खाई कि इन देशों की करेंसी देखते ही देखते आसमान छूने लगी. इस वक्त इन देशों के करेंसी की वैल्यू देखिए-
कुवैती एक दीनार की वैल्यू 3,24 डॉलर है.
बहरीन के एक दीनार की वैल्यू 2.65 डॉलर है.
ओमानी एक रियाल 2.60 डॉलर के बराबर है.
जॉर्डन के एक दीनार की वैल्यू 1.41 डॉलर है.
यूएई का एक दिरहम 0.27 डॉलर के बराबर है.
अब जरा सोचिए अगर आज भी इन देशों में भारतीय करेंसी चल रही होती तो भारतीय रुपये की क्या हैसियत होती? क्या पता डॉलर को टक्कर दे रहा होता. तो बस ड़ॉलर और पेट्रो डॉलर का ये यही वो खेल है जिसके दम पर अमेरिका की दादागिरी जारी है. जिस दिन डॉलर की जगह मार्केट में कोई नई करेंसी आ गई समझ लीजिए अमेरिका के हाथों से सुपरपावर की गद्दी खिसक जाएगी.
(आजतक ब्यूरो)
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