मिडिल ईस्ट में जारी जंग के बीच NATO की भूमिका को लेकर अब खुलकर मतभेद सामने आने लगे हैं. फ्रांस ने साफ शब्दों में कहा है कि NATO को होर्मुज स्ट्रेट में ऑपरेशन चलाने के लिए नहीं बनाया गया है. फ्रांस की जूनियर सेना मंत्री एलिस रूफो ने बुधवार को कहा कि NATO एक सैन्य गठबंधन है, जिसका दायरा यूरो-अटलांटिक क्षेत्र की सुरक्षा तक सीमित है.
उन्होंने चेतावनी दी कि होर्मुज स्ट्रेट में किसी तरह की सैन्य कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन भी कर सकती है. उनका यह बयान ऐसे वक्त में आया, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप NATO को लेकर सख्त रुख दिखा रहे हैं. ट्रंप ने यहां तक कह दिया है कि वो अमेरिका को NATO से बाहर निकालने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं.
ट्रंप का आरोप है कि सहयोगी देशों ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं किया. उनके इन बयानों ने अटलांटिक पार के रिश्तों में नई दरार पैदा कर दी है. यह तनाव उस युद्ध को लेकर है, जिसमें अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई को लेकर यूरोपीय देशों में पहले से ही असहमति रही है. ट्रंप ने अपने सहयोगियों को कायर तक कह दिया है.
ट्रंप अपने सहयोगी देशों से होर्मुज स्ट्रेट में सक्रिय भूमिका निभाने की बात कह रहे हैं. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने NATO के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है. उन्होंने इसे दुनिया का सबसे प्रभावी सैन्य गठबंधन बताया. उन्होंने कहा कि ब्रिटेन अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर फैसले लेता रहेगा. इस पूरे विवाद के बीच होर्मुज वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है.
यह समुद्री मार्ग ईरान और ओमान के बीच स्थित है, जहां से दुनिया के कुल तेल का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है. मौजूदा युद्ध के कारण इस रास्ते पर असर पड़ा है, जिससे ऊर्जा कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला है. NATO के भीतर भी इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन पा रही है. गठबंधन के किसी भी फैसले के लिए सभी 32 सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है.
ऐसे में होर्मुज स्ट्रेट को लेकर कोई साझा सैन्य कार्रवाई फिलहाल मुश्किल नजर आ रही है. NATO की नींव उसके अनुच्छेद 5 पर टिकी है, जिसके तहत किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाता है. लेकिन मिडिल ईस्ट के इस युद्ध में अब तक गठबंधन ने न तो हस्तक्षेप किया है और न ही उनकी ऐसी कोई स्पष्ट योजना सामने आई है.
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