अमेरिका और चीन के बीच इस सप्ताह होने जा रहा शिखर सम्मेलन वैश्विक राजनीति और कूटनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 13 मई को बीजिंग पहुंचेंगे और 15 मई की दोपहर अमेरिका के लिए रवाना होंगे. इस दौरान कई द्विपक्षीय बैठकें, औपचारिक कार्यक्रम और कार्यकारी लंच आयोजित किए जाएंगे. बीजिंग में 14-15 मई के दौरान उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से होगी. इस हाई-प्रोफाइल बैठक पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि दोनों देशों के बीच ट्रेड, टेक्नोलॉजी, ताइवान, ईरान और ग्लोबल सिक्योरिटी जैसे मुद्दों को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ है.
जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रंप और जिनपिंग के बीच होने वाली इस बैठक से चीन और अमेरिका के बीच किसी बड़े समझौते या उनके संबंधों में नाटकीय बदलाव की उम्मीद कम है, लेकिन दोनों देश कम से कम तनाव को नियंत्रित करने और संबंधों को स्थिर बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं. हांगकांग बेस्ड इंग्लिश न्यूज पेपर 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' के मुताबिक, दोनों पक्ष फिलहाल 'रिस्क मैनेजमेंट' और टकराव को बढ़ने से रोकने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.
ट्रंप के साथ अमेरिकी बिजनेसमेन का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी चीन जाएगा. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रतिनिधिमंडल में टेक्नोलॉजी, फाइनेंस और एविएशन सेक्टर की बड़ी कंपनियों के अधिकारी शामिल होंगे. एप्पल, टेस्ला, बोइंग और ब्लैकरॉक जैसी कंपनियों के प्रतिनिधियों के भी इस दौरे में ट्रंप के साथ शामिल होने की संभावना है. अमेरिकन बिजनेस वर्ल्ड चाहता है कि ट्रंप की इस यात्रा से दोनों देशों के बीच व्यापार में स्थिरता आए, टैरिफ को लेकर अनिश्चितता कम हो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर संवाद फिर शुरू हो.
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अमेरिकी एजेंडे में होगा ईरान-चीन संबंध
व्हाइट हाउस के अधिकारियों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन बीजिंग पर ईरान के साथ उसके संबंधों को लेकर दबाव बना सकता है. हाल ही में अमेरिका ने एक चीनी इंटेलिजेंस फर्म और कुछ सैटेलाइट कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए थे. अमेरिका का आरोप है कि चीन और ईरान के बीच बढ़ता सहयोग वैश्विक सुरक्षा संतुलन के लिए चुनौती बन सकता है. हालांकि चीन अब तक परमाणु हथियार नियंत्रण वार्ता में ज्यादा रुचि नहीं दिखाता रहा है, फिर भी अमेरिका इस मुद्दे को शिखर बैठक में उठाने की तैयारी कर रहा है.
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वैश्विक सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने के लिए परमाणु नियंत्रण पर बातचीत जरूरी है. ताइवान मुद्दे पर भी दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं. व्हाइट हाउस ने कहा है कि अमेरिका की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों को लेकर भी अमेरिका सतर्क है. इस शिखर सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर सुरक्षा अहम मुद्दे रहेंगे. अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि तेजी से विकसित हो रही एआई तकनीक और साइबर क्षमताओं को देखते हुए दोनों देशों के बीच संवाद तंत्र विकसित करने की जरूरत है.
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सेकेंड टर्म में ट्रंप की यह पहली चीन यात्रा
अमेरिका ने नए एआई मॉडल्स की क्षमताओं को लेकर भी चिंता जताई है. ट्रंप प्रशासन एयरोस्पेस, कृषि और ऊर्जा क्षेत्रों में कुछ अहम समझौतों की दिशा में भी काम कर रहा है. व्हाइट हाउस का कहना है कि इन समझौतों का मकसद अमेरिकी कामगारों, किसानों और परिवारों के हितों की रक्षा करना है. हालांकि अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि फिलहाल किसी बड़े चीनी निवेश कार्यक्रम को लेकर कोई औपचारिक चर्चा नहीं हुई है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2017 में ट्रंप की पहली चीन यात्रा की तुलना में इस बार शी जिनपिंग ज्यादा मजबूत स्थिति में नजर आ रहे हैं. चीन ने हाल के वर्षों में तकनीक, ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बड़े निवेश किए हैं, जबकि ट्रंप प्रशासन को ईरान संघर्ष और आर्थिक अनिश्चितता को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है.
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