एशिया की दो सबसे बड़ी ताकतें-भारत और चीन, आज एक ऐसे 'संसाधन युद्ध' में आमने-सामने हैं जहां हथियार मिसाइलें नहीं, बल्कि पानी की बूंदें हैं. विडंबना देखिए, जहां भारत धान के उत्पादन में चीन को पछाड़कर दुनिया का 'राइस किंग' बनने का जश्न मना रहा है. कीमती पानी को इथेनॉल के धुएं में उड़ाने की तैयारी कर रहा है, वहीं चीन ने अपनी चालें बदल ली हैं.
चीन आज उस पानी को खेतों से खींचकर अपनी 'हाई-टेक लैब' और 'सेमीकंडक्टर प्लांट' में झोंक रहा है, क्योंकि उसने समझ लिया है कि जिस पानी से एक किलो चावल पैदा होता है, उसी से अगर एक चिप (Chip) बनाई जाए, तो उसकी आर्थिक कीमत हजारों गुना बढ़ जाती है. यह मुकाबला सिर्फ खेती का नहीं, बल्कि इस बात का है कि भविष्य की प्यासी दुनिया में कौन अपनी बूंदों को 'अनाज' बनाकर सड़ाएगा और कौन उन्हें 'तकनीक' बनाकर दुनिया पर राज करेगा.
'जलखोर' इथेनॉल नीति
भारत में पहले से ही पेट्रोल में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग हो रही है और सरकार इसे बढ़ाकर 85 प्रतिशत तक ले जाने के लिए ड्राफ्ट भी तैयार कर चुकी है. सरकार का तर्क है कि हम अपनी जरूरत का करीब 90% तेल आयात करते हैं. इथेनॉल के दम पर भारत इस निर्भरता को काफी कम कर सकता है.
लिहाजा इथेनॉल का उत्पादन बढ़ाने के लिए अब सरकार ने चावल का भी उपयोग करना शुरू कर दिया है. केंद्र सरकार ने 'भारतीय खाद्य निगम' (FCI) के पास मौजूद अतिरिक्त चावल को इथेनॉल बनाने के लिए रियायती दरों पर देने की अनुमति दी है. केंद्र ने 2025 में रिकॉर्ड 52 लाख टन चावल इथेनॉल उत्पादन के लिए आवंटित किया है.
इथेनॉल नीति की भारी कीमत चुका रहा भारत?
सरकारी आंकड़े कहते हैं कि 2014-2026 के बीच इथेनॉल ब्लेंडिंग से अब तक लगभग 1.73 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई है. मगर सवाल ये भी है कि देश के संसाधनों ने इस बचत की कितनी कीमत चुकाई है? दरअसल, भारत का कृषि क्षेत्र देश के कुल ताजे पानी का 90 फीसदी हिस्सा इस्तेमाल करता है, जिसमें से 80% पानी तो केवल धान, गन्ना और गेहूं में खर्च होता है.
सब जानते हैं कि 1 किलो चावल उगाने में औसतन 5000 लीटर तक पानी लगता है. संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग (USDA) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने 2025-26 में करीब 1520 लाख टन चावल का उत्पादन किया. इतने चावल के उत्पादन में कितना बेहिसाब पानी लगा होगा, इसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल है.
यही कारण है कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में यह संकट और गहरा है क्योंकि वहां धान की खेती पूरी तरह से भूजल पर निर्भर है. Punjab Agricultural University और अन्य अध्ययनों के अनुसार, पहले पंजाब और हरियाणा में 30 फीट पर पानी मिल जाता था. मगर अब कई जगह 100 से 200 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है. पंजाब और हरियाणा में भूजल स्तर हर साल 0.5 से 1 मीटर नीचे जा रहा है. यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि MSP और सरकारी खरीद नीति ने किसानों को लगातार धान और गेहूं बोने के लिए प्रोत्साहित किया.
पानी का औद्योगिक उपयोग
अगर इस तस्वीर को ऐसे देखा जाए कि भारत 1 किलो चावल दूसरे देश को निर्यात करता है तो इसका मतलब करीब 5000 लीटर पानी भी मुफ्त में देना है. जब भारत चावल का निर्यात करता है, तो वह वास्तव में खरबों लीटर पानी मुफ्त में निर्यात कर रहा होता है. इसी तरह इथेनॉल के लिए भी वही पानी जलाया जा रहा है. वहीं दूसरी तरफ चीन की पानी पर रणनीति बिल्कुल अलग है. भारत लगातार चावल की खेती का रकबा बढ़ा रहा है, जबकि चीन इसका रकबा लगातार कम करता जा रहा है.
चीन होशियारी से घटा रहा धान का रकबा
UN की एजेंसी FAO के आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से 2024 के बीच भारत में धान का रकबा लगातार बढ़ा है. 2020 में भारत में करीब 450.7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती हुई थी, जो 2024 तक बढ़कर 505.12 लाख हेक्टेयर पहुंच गई. यानी चार साल में करीब 54 लाख हेक्टेयर का इजाफा हुआ. इसके ठीक उलट चीन में धान का रकबा लगातार घटा है. 2020 में चीन में 303.42 लाख हेक्टेयर में धान बोया गया था, लेकिन 2024 तक यह घटकर 292.57 लाख हेक्टेयर रह गया.
यानी चीन ने करीब 11 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कम कर दिया. चीन ने अपना धान का रकबा जानबूझ कर घटाया है. ताकि पानी का औद्योगिक उपयोग किया जा सके. चीन प्रति बूंद अधिक आर्थिक मूल्य निकालना चाहता है, जिसके लिए उसने इसी पानी को ज्यादा महंगी चीजें (सेमिकंडक्टर, बैटरी) बनाने के लिए डायवर्ट कर दिया.
चीन क्या कर रहा है?
चीन बहुत पहले ही समझ चुका है कि 1,000 लीटर पानी का उपयोग अगर खेती में किया जाए तो उससे मिलने वाला रिटर्न (ROI) औद्योगिक उपयोग के मुकाबले बहुत कम है. एक सिंगल माइक्रो चिप (सेमीकंडक्टर) बनाने में लगभग 10 गैलन (लगभग 38 लीटर) पानी लगता है. वहीं एक चिप बनाने वाली फैक्ट्री को प्रतिदिन 10 से 30 मिलियन लीटर पानी (1-3 करोड़ लीटर पानी) की आवश्यकता होती है. लेकिन, एक सिलिकॉन वेफर की कीमत हजारों किलो चावल के बराबर होती है. जाहिर है कि चीन अपने पानी से भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा पैसा बना रहा है.
हाई-टेक इंडस्ट्री की ओर पानी डायवर्ट करने की जरूरत
इसका एक उदाहरण ताइवान में भी देखने को मिला. 2021 में ताइवान में जब भीषण सूखा पड़ा तो, इस देश में 74,000 हेक्टेयर धान के खेतों की सिंचाई रोक दी गई थी ताकि TSMC जो दुनिया की सबसे बड़ी चिप कंपनी है, उसकी फैक्ट्रियों को पानी मिल सके. ताइवान की सरकार ने किसानों को मुआवजा दिया, लेकिन उद्योगों को बंद नहीं होने दिया, क्योंकि वे 'हाई-वैल्यू' इकोनॉमी हैं.
इसी तरह चीन भी अब अपना ध्यान चिप के साथ-साथ EV बैटरी, लिथियम-आयन सेल और सोलर पैनल पर केंद्रित कर रहा है, जो कम पानी में अधिक जीडीपी और रोजगार पैदा करते हैं. चीन ने पिछले दशक में अपनी आर्थिक रणनीति बदली है. वह अब कम वैल्यू वाली कृषि और ज्यादा पानी वाली फसलों की बजाय प्राकृतिक संसाधनों को EV बैटरी, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, AI और हाई-टेक इंडस्ट्री की ओर डायवर्ट कर रहा है.
क्या भारत गलती कर रहा है?
'जलखोर' फसलों को तवज्जो देना भारत के लिहाज से पूरी तरह गलत भी नहीं है. क्योंकि भारत में 45% आबादी कृषि पर निर्भर है. लेकिन, धान जैसी फसलों का लगातार रकबा बढ़ाना या इससे इथेनॉल बनाना आत्मघाती हो सकता है. दुर्भाग्य यह है केंद्र सरकार मक्के और कृषि कचरे से इथेनॉल बनाने की बजाय इथेनॉल के लिए चावल का कोटा बढ़ा रही है.
एक अहम बात ये है कि जब तक किसानों को गेहूं-धान के मुकाबले दलहन-तिलहन में फायदा नहीं मिलेगा तब तक वो फसल विविधीकरण नहीं करेंगे. यह नीतिगत मामला है. बहरहाल,चीन जहां पानी को हाई-वैल्यू इंडस्ट्री में ट्रांसफर कर रहा है, वहीं भारत अभी भी कृषि-प्रधान जल उपयोग मॉडल में फंसा हुआ दिखता है.
बड़ा सवाल ये है कि इतना पानी खाने वाली फसल को ईंधन में बदलना कितना सही है? इसके पीछे सरकार कहती है कि सिर्फ 'सरप्लस' चावल इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन एक सच ये भी है कि इन 'जलखोर' फसलों का इसी तरह रकबा बढ़ता रहा तो उपज सरप्लस होती ही रहेगी. सवाल यह है कि हम चावल उत्पादन के मामले में दुनिया में नंबर वन होने का जश्न मनाएं या फिर चीन से सबक लेते जलखोर फसलों को कम करने का रोडमैप बनाएं.
स्वयं प्रकाश निरंजन