ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ ट्रेड' से जिनपिंग को दिक्कत क्या, क्यों नहीं आ रहा रास

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के साथ बातचीत में व्यापार और अर्थव्यवस्था मुख्य एजेंडे थे. अमेरिका ने '5B' फॉर्मूला पेश किया, जबकि चीन ने 'रचनात्मक रणनीतिक और स्थिर संबंध' का प्रस्ताव रखा. लेकिन चीन को अमेरिका की नीतियों पर शक है और वो अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

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चीन को ट्रंप के इरादों पर शक है. (Photo- ITG) चीन को ट्रंप के इरादों पर शक है. (Photo- ITG)

अंतरा घोषाल सिंह

  • बीजिंग,
  • 16 मई 2026,
  • अपडेटेड 8:24 AM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चीन दौरा खत्म हो चुका है. पिछले नौ सालों में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का ये पहला चीन दौरा था. बुसान के बाद दोनों देशों के नेताओं के बीच ये दूसरी मुलाकात थी. लेकिन इस हाई-प्रोफाइल दौरे के खत्म होते ही चीन के मीडिया और रणनीतिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है. 

ये बहस अमेरिका के 'बोर्ड ऑफ ट्रेड' और चीन के 'रचनात्मक रणनीतिक और स्थिर संबंध' के इर्द-गिर्द घूम रही है. दौरे से पहले ही ट्रंप और उनके अधिकारियों ने साफ कर दिया था कि व्यापार और अर्थव्यवस्था ही उनके मुख्य एजेंडे हैं. 

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इसके लिए अमेरिका ने '5B' का फॉर्मूला (बीफ, बीन्स, बोइंग, बोर्ड ऑफ ट्रेड और बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट) पेश किया था. अमेरिका का मकसद एक ऐसा व्यापारिक तंत्र बनाना था, जिससे भविष्य के विवादों को बढ़ने से रोका जा सके. हालांकि, चीन को अमेरिका का ये फॉर्मूला पसंद नहीं आया. 

क्यों चीन को पसंद नहीं आ रहा ट्रंप का प्रस्ताव?

चीन को लगा कि ट्रंप नियमों के जाल में फंसाकर उसकी ताकत को काबू करना चाहते हैं. इसके जवाब में चीन ने 'रचनात्मक रणनीतिक और स्थिर संबंध' का प्रस्ताव रखा. चीन का मानना है कि यही फॉर्मूला अगले तीन साल या उससे ज्यादा समय के लिए दोनों देशों के रिश्तों को दिशा देगा.

सेंटर फॉर यूएस-चाइना स्टडीज की कार्यकारी निदेशक होंग नोंग ने एक आर्टिकल में समझाया कि ट्रंप 2.0 का पूरा ध्यान मिड-टर्म चुनावों पर है. वो अपने घरेलू वोट बैंक को खुश करने के लिए निवेश, व्यापार और भू-राजनीतिक मुद्दों पर तुरंत दिखने वाले फायदे चाहते हैं. दूसरी तरफ, चीन का मकसद इस रिश्ते की परिभाषा तय करने का अधिकार अपने हाथ में लेना है, ताकि वो अमेरिका की बेलगाम ताकत को लगाम लगा सके.

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ये पहली बार नहीं है जब दोनों देश नियमों को लेकर उलझे हैं. इससे पहले चीन ने अमेरिका के 'G2' फॉर्मूले को खारिज कर दिया था और फरवरी 2012 में नए तरह के पावर रिलेशनशिप की बात कही थी, हालांकि अमेरिका ने इसे किसी खाते में नहीं लिया.

चीनी रणनीतिकारों की राय 

चीनी रणनीतिकारों का मानना है कि अमेरिका रिश्तों को सुधारने की बात तो करता है, लेकिन उसके एक्शन वैसे नहीं दिखते. पनामा, वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान में अमेरिकी कार्रवाइयों को लेकर बीजिंग में कई तरह की थ्योरी चल रही हैं. चीन को शक है कि ट्रंप सरकार 'एक्सिस ऑफ इविल' (रूस, चीन, ईरान, उत्तर कोरिया और वेनेजुएला) के देशों को एक-एक करके खत्म करने का प्लान बना रही है.

चीन के पड़ोस में भी अमेरिका की सक्रियता बढ़ी है. जापान, ताइवान और फिलीपींस को जोड़ने वाली 'फर्स्ट आइलैंड चेन' की रक्षा क्षमता को अमेरिका मजबूत कर रहा है, जिससे चीन सतर्क हो गया है. इसके अलावा, ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध काफी बढ़ गए हैं. चीन का आरोप है कि अमेरिका दूसरे देशों को भी इन प्रतिबंधों को मानने के लिए मजबूर कर रहा है.

यह भी पढ़ें: ट्रंप के लौटते ही पुतिन का चीन दौरा फिक्स, बहुत जल्द जिनपिंग से मिलेंगे रूसी राष्ट्रपति

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इस माहौल के बीच, चीन का मकसद अमेरिका के साथ रिश्तों को पूरी तरह सुधारना नहीं था. बल्कि, चीन इस मौके का इस्तेमाल ताइवान और दूसरे वैश्विक मुद्दों पर अपनी 'रेड लाइन' खींचने के लिए करना चाहता था. 

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