लड़की की चुप्पी को माना जाएगा शादी की सहमति! अफगानिस्तान में तालिबान का नया कानून

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने नया फैमिली लॉ लागू किया है, जिसमें शादी, तलाक, बाल विवाह जैसे कई नियम शामिल हैं इस कानून में लड़की की चुप्पी को शादी की सहमति माना जाएगा.

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नाबालिग लड़कियों की शादी को लेकर भी कई नियम लागू किए गए हैं. (Photo: Reuters) नाबालिग लड़कियों की शादी को लेकर भी कई नियम लागू किए गए हैं. (Photo: Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 18 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:15 AM IST

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने एक नया 'फैमिली लॉ' लागू किया है, जिसे लेकर विवाद हो रहा है. नए कानून में शादी, तलाक और बाल विवाह से जुड़े कई नियम तय किए गए हैं. दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ता और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इन नए नियमों की आलोचना कर रहे हैं.

अफगान मीडिया आउटलेट 'अमू टीवी' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नए कानून का नाम 'पति-पत्नी के बीच अलगाव के सिद्धांत' रखा गया है. 31 अनुच्छेदों (आर्टिकल्स) वाले इस पूरे मसौदे को तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने अपनी मंजूरी दी है. 

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हाल ही में सरकार के आधिकारिक गजट में भी नए कानून को प्रकाशित किया गया था. इस नए रेगुलेशन में बाल विवाह, लापता पति, अडल्ट्री के आरोप, धर्म परिवर्तन (इस्लाम छोड़ना) और जबरन अलगाव जैसे मामलों को शामिल किया गया है.

चुप्पी को माना जाएगा शादी की सहमति

इस कानून एक नियम की सबसे ज्यादा आलोचना हो रही है. दरअसल नए प्रावधान के मुताबिक, अगर कोई 'कुंवारी लड़की' बालिग (प्यूबर्टी) होने के बाद अपनी शादी पर चुप रहती है, तो उसकी इस चुप्पी को शादी के लिए उसकी रजामंदी माना जाएगा. खास बात ये है कि कानून में ये भी साफ किया गया है कि किसी लड़के या पहले से शादीशुदा महिला की चुप्पी को उनकी सहमति के तौर पर नहीं देखा जाएगा.

बाल विवाह पर पिता-दादा को बड़े अधिकार

इस कानून में 'खियार अल-बुलूग' का भी जिक्र है. इसके तहत बचपन में ब्याहे गए लोगों को बालिग होने पर शादी रद्द करने की मांग करने का हक मिलता है. कानून के अनुच्छेद 5 के मुताबिक, अगर पिता या दादा के अलावा किसी दूसरे रिश्तेदार ने नाबालिग की शादी तय की है, तो भी वो शादी तब तक मान्य रहेगी जब तक कि जीवनसाथी सामाजिक रूप से योग्य हो. 

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हालांकि, किसी भी शादी को खत्म करने के लिए तालिबान की अदालत से मंजूरी लेना जरूरी होगा.

नए नियमों के तहत पिता और दादा को बाल विवाह के मामलों में कई अधिकार दिए गए हैं. हालांकि, अगर गार्जियन हिंसक या अनैतिक पाए जाते हैं, तो ऐसी शादियों को अमान्य किया जा सकता है. इसके अलावा, एडल्ट्री के आरोपों, धर्म परिवर्तन और लंबे समय से लापता पतियों से जुड़े मामलों में फैसला लेने के लिए तालिबान के जजों को खुली छूट दी गई है.

चौतरफा घिरी तालिबान सरकार

इस नए कानून ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को और नाराज कर दिया है. राजनीतिक विश्लेषक फहीमा मोहम्मद ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि बाल विवाह में कभी भी सहमति शामिल नहीं हो सकती. लड़की की चुप्पी को उसकी मंजूरी मान लेना असल में लड़कियों की आवाज और उनकी आजादी को पूरी तरह से छीनने जैसा है.

यह भी पढ़ें: तालिबान का पाकिस्तान को 'डेथ वारंट', इस्लामाबाद-कराची और क्वेटा को दहलाने की धमकी

बता दें कि साल 2021 में सत्ता में लौटने के बाद से ही तालिबान अफगान महिलाओं और लड़कियों पर लगातार पाबंदियां लगा रहा है. महिलाओं की हाई एजुकेशन पर रोक, नौकरियों पर पाबंदी और सार्वजनिक जीवन में उनकी हिस्सेदारी को खत्म करने को लेकर तालिबान पहले से ही आलोचना झेल रहा है.

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