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विश्व

रूस ना होता तो इन मौकों पर भारत के लिए होती मुश्किल

प्रज्ञा बाजपेयी
  • 21 मई 2018,
  • अपडेटेड 8:13 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रूस  के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के निमंत्रण पर सोचि शहर में एक अनौपचारिक बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे हैं.  तेजी से बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में पीएम मोदी का यह दौरा अहम माना जा रहा है.

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भारत और रूस की दोस्ती बहुत पुरानी है. बदलते समय के साथ भले ही बहुत सी चीजें बदली हों लेकिन अब भी दोनों देशों के लोगों में आपसी विश्वास कायम है. भारतीय आज भी यह बात मानते हैं कि रूस भारत का दोस्त और सहयोगी है ना कि बिजेनस पार्टनर. रूस ने भारत के मुश्किल वक्त में हमेशा साथ दिया. इतिहास में भारत-रूस की दोस्ती के तमाम अध्याय लिखे जा चुके हैं. तो चलिए पलटते हैं ये पन्ने...

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औपनिवेशक देश होने की वजह से भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखने की कोशिश की. भारत नियमित तौर पर अपनी पसंद और जरूरतों के हिसाब से सहयोगियों की समीक्षा करता रहता है. शीत-युद्ध के समय भारतीय नेताओं ने गुट-निरपेक्ष की नीति बनाई. वर्तमान में अब इसे रणनीतिक स्वायत्तता का नाम दिया गया है.

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भारत शीत युद्ध के वक्त में सोवियत संघ और अमेरिका दोनों के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखना चाहता था. हालांकि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सोवियत संघ से प्रभावित थे और वह समाजवाद के पक्षधर थे. इन सबके अलावा, पाकिस्तान के यूएस के सहयोगी बनने से भारत-रूस और करीब आ गए.

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कई सालों तक आर्थिक और सैन्य मोर्चे पर सोवियत की मदद से भारत को यह विश्वास हो गया कि सोवियत उसका मजबूत सहयोगी है. पहले सोवियत और फिर रूस की हथियारों की बिक्री को भारत को एक बाजार के तौर पर देखने के बजाए भारतीयों ने हमेशा इसे गहरे भावनात्मक रिश्ते की तरह देखा. कश्मीर पर यूएन रिजॉल्यूशन पर सोवियत का वीटो नई दिल्ली में रणनीतिक गणित की तरह नहीं बल्कि सोवियत की दोस्ती के तौर पर लिया गया.

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रूस ने 'गरीब भारत' के साथ रिश्ते की नींव रखी थी जो समय के साथ-साथ मजबूत होती चली गई. आजादी के बाद भारत हथियारों, तकनीक और औद्योगिक निवेश के लिए पूरी तरह से रूस पर निर्भर था. पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 के युद्ध के दौरान भी नई दिल्ली को मॉस्को के कूटनीतिक और सैन्य समर्थन की सख्त जरूरत पड़ी थी. आज भी भारत के रक्षा बाजार में रूस नंबर वन पर काबिज है.

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रूस और भारत के बीच कई दशकों से सैन्य सामग्री की बिक्री होती रही है. पश्चिम ने जहां भारत पर कई प्रतिबंध थोप दिए थे, वहीं रूस ने हथियारों और मिसाइल टेक्नोलॉजी की आपूर्ति करता रहा. रूसी तकनीक और विशेषज्ञों की मदद से भारत ने कई पीढ़ियों का अंतराल एक झटके में पार कर लिया और ब्रह्मोस-आकाश जैसी मिसाइलें का उत्पादन करने में सक्षम हुआ. पृथ्वी मिसाइल भी रूसी तकनीक पर ही आधारित है.

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अधिकतर देश जहां अपने हथियारों के पुराने वर्जन्स का निर्यात करते हैं, वहीं रूस ने अपवाद के तौर पर भारत को सुखोई Su-30MKI जेट फाइटर दिया जो इसके Su-27s से ज्यादा आधुनिक है. S-400 मिसाइल डिेंफ सिस्टम को ताकतवर हथियार के श्रेणी में रखा जा सकता है.

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शीत-युद्ध जब चरम पर था तो 85 प्रतिशत भारतीय नौसेना, 75 प्रतिशत भारतीय वायुसेना और 50 प्रतिशत भारतीय थल सेना रूसी मूल के हथियारों पर ही निर्भर थी. आज भी भारत के रक्षा बाजार में रूस का बोलबाला बना हुआ है. रूस ही इकलौता ऐसा देश है जो भारत अपने भविष्य की जरूरतों पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर्स (सुखोई PAK-FA), न्यूक्लियर सबमैरीन्स और एयरक्राफ्ट कैरियर को पूरा कर सकता है.

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भारत की मुश्किल की घड़ियों में रूस ने हमेशा साथ दिया. अंतराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर व अन्य क्षेत्रीय संप्रभुता के मुद्दे पर लगातार भारत का साथ देता रहा. बदले में भारत ने भी रिश्ते को निभाया.

1979 में जब रूस ने अफगानिस्तान पर हमला किया तो भारत ने रूस की आलोचना करने से इनकार कर दिया. भारत के इस कदम पर पश्चिम में बहुत हाय-तौबा हुई.  पश्चिम देशों ने भारत की यह कहकर आलोचना की कि आजादी का समर्थक होने के बावजूद भारत का दक्षिण एशिया देश पर हमले से दूरी बनाए रखना दोगलेपन के अलावा कुछ नहीं है.

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लेकिन भारत 1971 युद्ध में मिले समर्थन का एहसान चुका रहा था. 1971 के युद्ध में जब यूके, यूएस, फ्रांस, यूएई, टर्की, इंडोनेशिया, चीन और बाकी कई मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान को समर्थन दिया तो रूस ही भारत के साथ खड़ा हुआ था. पाकिस्तान में अपने ही बंगाली नागरिकों की हत्या पर भारत को युद्ध लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था. यूएस द्वारा लाए गए रिजॉल्यूशन में भारत को दोषी बताया गया था लेकिन रूस ने वीटो किया था.

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नई दिल्ली ने यूक्रेन और सीरिया संकट के समय यूएस और ईयू प्रतिबंधों को समर्थन देने के बजाए मॉस्को का साथ दिया. क्रीमिया में रूस की कार्रवाई पर जब पीएम मोदी से सीएनएन पर प्रतिक्रिया पूछी गई तो उन्होंने कहा था कि आज की दुनिया में हर कोई सलाह देने को आतुर हैं लेकिन उन्हें खुद के भीतर झांकना चाहिए. उन्होंने भी किसी ना किसी रूप में गुनाह किए होंगे.

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हालांकि अतीत की भावुकता से किसी देश की विदेश नीति नहीं चल सकती है. भारत खुद को वैश्विक ताकत के तौर पर स्थापित करना चाह रहा है और ऐसे में यूएस-रूस औऱ चीन के के साथ रिश्तों में फिर से संतुलित करना भारत की जरूरत है. इसलिए नई दिल्ली को रूस के साथ अपनी पुरानी दोस्ती को नया आयाम देना होगा. वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों के बदलने के बावजूद भारत रूस से अपनी दोस्ती बनाए रखना चाहेगा. दूसरी तरफ, रूस भी भारत के साथ भावनात्मक रिश्ते को अपने पक्ष में जारी रखना चाहेगा लेकिन रूस की कमजोर अर्थव्यवस्था, विश्व में अलग-थलग पड़ा नेतृत्व और भारत के बाजार में निर्यात के मामले में लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा एक चुनौती जरूर है.

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