पश्चिम बंगाल में 15 साल तक राज करने के बाद ममता बनर्जी की सिर्फ सत्ता से विदाई ही नहीं हुई बल्कि अपनी भवानीपुर सीट भी नहीं बचा सकी है. भवानीपुर से हार और बंगाल में सत्ता से बेदखल होने के बाद ममता बनर्जी के सामने अब कई सियासी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं. चुनाव नतीजों ने बंगाल की 'दीदी' को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां से उनके आगे की सियासी राह आसान नहीं रहने वाली?
ममता बनर्जी 2011 में लेफ्ट के किले को ध्वस्त कर बंगाल की मुख्यमंत्री बनी थी, उसके बाद से लगातार अभी तक सत्ता के सिंहासन पर विराजमान रही हैं. 15 साल की सारी सियासी जमा-पूंजी खत्म हो गई. ऐसे में अपनी पार्टी और खुद के सियासी वजूद को बचाए रखने के लिए संघर्ष करना होगा.
नंदीग्राम के बाद अब भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी के साथ सियासी खेला हो गया. बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी से ममता बनर्जी को मात खानी पड़ी है. ऐसे ममता के सामने राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है और लोगों के मन में यही है कि वो आगे क्या करेंगी. सवाल यही है कि ममता बनर्जी फाइटर बनकर बंगाल में संघर्ष करेंगी या फिर दिल्ली की सियासत में लौटेंगी?
भवानीपुर में ममता के साथ हो गया खेला
भवानीपुर सीट को ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता था. 2021 में नंदीग्राम सीट से चुनाव हार गईं थी तो भवानीपुर से उपचुनाव लड़कर मुख्यमंत्री बनी थी. ये सीट ममता बनर्जी की परंपरागत सीट मानी जाती है, क्योंकि इसी इलाके कालीघाट में उनका घर भी है. ममता ने यहीं से अपनी राजनीतिक पारी का आगाज किया था और तीन बार बंगाल की सीएम बनी, लेकिन इस बार अपने गृह क्षेत्र और परंपरागत मानी जाने वाली भवानीपुर सीट से चुनाव हार गईं.
ममता बनर्जी को भवानीपुर सीट पर बीजेपी प्रत्याशी शुभेंदु अधिकारी ने 15 हजार 105 वोटों से हराया. ममता बनर्जी जिस भवानीपुर में 2021 में 31 हजार के करीब वोटों से जीत दर्ज की थी, उस सीट पर इस बार 15 हजार से ज्यादा वोटों से हार का सामना करना पड़ा. ये ममता बनर्जी के लिए सियासी तौर पर बड़ा झटका है, जिसने उनके राजनीतिक जीवन पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. ममता बनर्जी की हार में उतने ही वोटों का अंतर दिखा, जितने एसआईआर में भवानीपुर सीट से हटाए गए थे.
बंगाल में एसआईआर यानी वोटर लिस्ट की स्पेशल टेस्टिंग. एसआईआर प्रक्रिया के तहत भवानीपुर सीट से 47 हजार से 51 हजार नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए. इनमें बड़ी संख्या मुस्लिम वोटरों की बताई गई. ये टीएमसी का कोर वोट बैंक माने जाते हैं. टीएमसी ने आरोप लगाया था कि उनके कोर वोटर्स को निशाना बनाया है.उन्हें वोट देने से वंचित किया गया है. चुनाव आयोग का कहना था कि यह प्रक्रिया डुप्लीकेट और अयोग्य नाम हटाने के लिए की गई थी. ऐसे में ममता की हार में एसआईआर कहीं अहम फैक्टर तो नहीं रहा?
अब ममता बनर्जी आगे क्या करेंगी?
बंगाल में भाजपा ने 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है और तृणमूल कांग्रेस महज 81 सीटों पर सिमट गई है, इसलिए ममता बनर्जी को नैतिकता और संवैधानिक परंपरा के नाते मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना होगा. वे अब बंगाल में 'विपक्ष की नेता'के रूप में भूमिका अदा कर सकती थी, लेकिन भवानीपुर सीट से चुनाव हारने के बाद विधानसभा की सदस्य भी नहीं रह जाएंगी.
बंगाल में अगर टीएमसी बहुमत पाती और ममता खुद हार जातीं, तो वे अनुच्छेद 164(4) के तहत 6 महीने के लिए मुख्यमंत्री बनी रह सकती थीं और किसी सुरक्षित सीट से उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच सकती थीं, जैसा उन्होंने 2021में नंदीग्राम हारने के बाद किया था. लेकिन अब सत्ता हाथ से जाने के कारण यह विकल्प उनके लिए प्रासंगिक नहीं रह गया है. ऐसे में अभी ममता बनर्जी के सामने एक मौका जरूर है?
ममता बनर्जी क्या उपचुनाव लड़ेंगी?
पश्चिम बंगाल में दो विधानसभा सीटें खाली होंगी. बीजेपी के नेता शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम और भवानीपुर यानी दो सीटों से विधायक बने हैं. ऐसे में किसी एक सीट से वह इस्तीफा दे सकते हैं. इसी तरह हुमायूं कबीर भी दो सीटों से विधायक बने हैं, जिसमें एक सीट रेजीनगर और दूसरी नौदा सीट है. हुमायूं कबीर भी एक सीट से इस्तीफा देना होगा.
ममता बनर्जी उपचुनाव में खाली होने वाली दो सीटों में से किसी एक सीट से किस्मत आजमान का मौका होगा, लेकिन यह टीएमसी चीफ पर निर्भर करेगा. ममता बनर्जी उपचुनाव लड़कर विधानसभा पहुंच सकती है और टीएमसी की सीएलपी यानि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बन सकती है. इसके लिए उन्हें उपचुनाव जीतना होगा.
'विपक्ष की आवाज' के रूप में पुनर्गठन
विधानसभा में 81 विधायकों के साथ टीएमसी एक मजबूत विपक्ष के रोल में होगी. ममता बनर्जी अब सड़क से लेकर सदन तक भाजपा सरकार की घेराबंदी कर सकती है. उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को 'टूट' से बचाना होगा, क्योंकि सत्ता परिवर्तन के बाद अक्सर दल-बदल का खतरा बढ़ जाता है.
ममता बनर्जी 'INDIA' ब्लॉक की एक प्रमुख चेहरा रही हैं. बंगाल की सत्ता खोने के बाद वे अपना पूरा ध्यान दिल्ली की राजनीति और 2029 के लोकसभा चुनाव पर केंद्रित कर सकती हैं. वे अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ मिलकर एक मजबूत 'एंटी-बीजेपी' मोर्चा बनाने की कोशिश करेंगी, लेकिन जिस तरह से उन्हें हार मिली है, उसके बाद अब विपक्ष में उनकी स्वीकार्यता संभव नहीं है.
ममता क्या फिर फाइटर के रोल में होंगी
भवानीपुर जैसा अपना गढ़ हारना और सत्ता से बाहर होना ममता के लिए बड़ी चिंता का विषय है. अब उन्हें एक बार फिर से अपनी टीम में बड़े बदलाव करने होंगे. अभिषेक बनर्जी की भूमिका और पार्टी की रणनीति पर सवाल उठेंगे, जिसे ठीक करना उनकी प्राथमिकता होगी.
ममता बनर्जी एक 'फाइटर' नेता मानी जाती हैं. 2026 की यह हार उनके लिए अंत नहीं, बल्कि एक कठिन संघर्ष की नई शुरुआत है. भवानीपुर की हार उनके लिए व्यक्तिगत रूप से एक बड़ा झटका जरूर है, लेकिन बंगाल की राजनीति में उन्हें नजरअंदाज करना नामुमकिन है. अब वे 'दीदी' से 'विपक्ष की योद्धा' की भूमिका में खुद को ढालेंगी या नहीं देखना होगा?
कुबूल अहमद