'पुष्पा' ढेर, किला ध्वस्त... बंगाल में अभिषेक बनर्जी के 'डायमंड हार्बर मॉडल' का ऐसे हुआ दी एंड

अभिषेक बनर्जी का 'इलेक्ट्रिक श्मशान घाट' वाला वो बयान, 'पुष्पा' जहांगीर खान का वो सरेंडर और सुवेंदु अधिकारी की 'भगवा सुनामी' में ताश के पत्तों की तरह ढह गया डायमंड हार्बर का अभेद्य किला. फलता पुनर्मतदान के नतीजों ने पश्चिम बंगाल की सियासत से तृणमूल कांग्रेस के आखिरी रसूख को भी उखाड़ फेंका है.

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TMC के ताकतवर नेता अभिषेक बनर्जी का डायमंड हार्बर मॉडल कैसे बिखर गया, समझिए पूरी कहानी. (Photo: AI generated) TMC के ताकतवर नेता अभिषेक बनर्जी का डायमंड हार्बर मॉडल कैसे बिखर गया, समझिए पूरी कहानी. (Photo: AI generated)

शौनक सान्याल

  • कोलकाता,
  • 24 मई 2026,
  • अपडेटेड 11:34 PM IST

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसा भूचाल आया जिसने तृणमूल कांग्रेस के सबसे मजबूत गढ़ को तबाह कर दिया. बीजेपी के अंतिम संस्कार के लिए इलेक्ट्रिक श्मशान घाट का वादा करने से लेकर अपने ही साम्राज्य को ढहते देखने तक, अभिषेक बनर्जी का डायमंड हार्बर का किला ध्वस्त हो चुका है. फलता विधानसभा में खुद को 'पुष्पा' कहने वाले जहांगीर खान के सरेंडर के बाद BJP ने जबरदस्त जीत हासिल की है.

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ये कहानी अहंकार, बाहुबल के पतन और लोकतंत्र की उस बहाली की है, जिसने बंगाल का राजनीतिक भूगोल और इतिहास दोनों बदल दिए. पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे चरण के मतदान से पहले तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी ने फलता विधानसभा सीट में इलेक्ट्रिक श्मशान घाट का उद्घाटन किया था. TMC में नंबर-2 माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी ने उस समय बीजेपी पर तीखा हमला किया था.

TMC सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा था, "मुझे लगा कि 4 मई को नतीजे आने के बाद कुछ लोगों को दिल का दौरा पड़ सकता है, इसलिए यह हमारा फर्ज है कि उनके अंतिम संस्कार का इंतजाम भी ठीक से हो." यह बात करीब एक महीने पुरानी है. लेकिन अब से बंगाल की राजनीति की हवा पूरी तरह बदल चुकी है. BJP ने पश्चिम बंगाल में जबरदस्त जीत हासिल करते हुए सत्ता पर कब्जा कर लिया है.

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207 सीटें जीतने वाली BJP ने 15 साल तक सत्ता में रहने वाली TMC को वापस विपक्ष में भेज दिया है. ठीक वैसा ही नाटकीय बदलाव अब फलता में भी देखने को मिला है, जहां BJP उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने भारी बहुमत से सीट जीत ली है. तृणमूल कांग्रेस के बाहुबली और खुद को 'पुष्पा' कहने वाले जहांगीर खान चौथे स्थान पर चले गए. फलता विधानसभा अभिषेक बनर्जी के गढ़ डायमंड हार्बर में आता है.

डायमंड हार्बर साल 2009 से TMC का एक अभेद्य किला रहा है. इस पर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के घोषित उत्तराधिकारी, अभिषेक बनर्जी का कब्जा था. इस किले को बचाने में उनकी मदद उनके वफादार सहयोगी जहांगीर खान करते थे. आज वो किला खंडहर बन चुका है. रविवार को मतगणना के सभी 22 दौर पूरे होने के बाद, BJP उम्मीदवार ने 1,49,421 वोटों के साथ जीत हासिल की है. 

CPI(M) के शंभू नाथ कर्मी 40,625 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे. अभिषेक बनर्जी के कभी बेहद ताकतवर सिपहसालार रहे जहांगीर खान, जो 19 मई को चुनावी दौड़ से बाहर हो गए थे, काफी पीछे चौथे स्थान पर खिसक गए. उन्हें महज 6,257 वोट ही मिल पाए हैं. इससे पहले कि ये समझें कि फलता कैसे 'भगवा रंग' में रंगा, यह समझना जरूरी है कि TMC ने इस इलाके को अपना अभेद्य किला कैसे बनाया.

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डायमंड हार्बर कैसे बना तृणमूल का अभेद्य किला?

पिछले एक दशक में डायमंड हार्बर पश्चिम बंगाल के राजनीतिक नक्शे पर एक अहम जगह बन गया है. इसका उभार इसके तीन बार के सांसद अभिषेक बनर्जी के तेजी से बढ़ते राजनीतिक कद से गहराई से जुड़ा हुआ है. साल 2014 में राजनीति में बिल्कुल नए चेहरे से तृणमूल के दूसरे सबसे बड़े नेता बनने तक अभिषेक बनर्जी की जबरदस्त तरक्की की मुख्य वजह इस इलाके पर उनकी पूरी तरह से मज़बूत पकड़ थी.

फलता उन सात अहम विधानसभा क्षेत्रों में से एक है जो डायमंड हार्बर संसदीय क्षेत्र का हिस्सा हैं. ये दक्षिण 24 परगना जिले में आता है. पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि अभिषेक बनर्जी की इस इलाके पर कितनी मज़बूत पकड़ थी. साल 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने यह सीट 3.2 लाख वोटों के भारी अंतर से जीती थी. साल 2024 ये अंतर बढ़कर 7.1 लाख वोटों तक पहुंच गया था. 

अभिषेक बनर्जी का दबदबा इतना ज्यादा था कि पिछले पंचायत चुनावों के दौरान, तृणमूल कांग्रेस ने ज्यादातर स्थानीय ब्लॉक बिना किसी मुकाबले के ही जीत लिए थे. अलग-अलग राजनीतिक दल इस इलाके पर उनकी इतनी मजबूत पकड़ के बारे में अलग-अलग तरह की वजहें बताते हैं. TMC अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय उस रणनीति को देती है जिसे वो 'डायमंड हार्बर मॉडल' कहती है. 

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इस रणनीति में जमीनी स्तर की जन-कल्याणकारी योजनाओं को इलाके में स्वास्थ्य सुविधाओं के तेजी से विकास के साथ जोड़ा गया था. लोगों से सीधे जुड़ने का यह तरीका सबसे पहले Covid-19 महामारी के दौरान चर्चा में आया, जब अभिषेक बनर्जी के समर्थकों ने पूरे संसदीय क्षेत्र के हर ब्लॉक में 'सामुदायिक रसोई' चलाने के लिए कमर कस ली थी. लॉकडाउन के दौरान मुफ्त खाने के पैकेट पहुंचाने का काम किया था.

महामारी के बाद के वर्षों में ये मॉडल और भी ज्यादा चर्चित पहल में बदल गया, जिनका मुख्य जोर लोगों से सीधे संपर्क बनाने और नागरिकों को सीधे तौर पर जोड़ने पर था. साल 2022 में MP बनर्जी ने 'एक डाके अभिषेक' (एक कॉल पर अभिषेक) नाम का एक कार्यक्रम शुरू किया. इस कार्यक्रम के तहत लोग एक टोल-फ्री नंबर पर कॉल करके अपनी शिकायतें या समस्याएं सीधे उनकी टीम को बता सकते थे.

इसके अलावा एक पहल के लिए सबसे ज्यादा तारीफ मिली, वो थी 'श्रद्धार्घ्य' (श्रद्धांजलि). इस योजना के तहत TMC के हजारों कार्यकर्ताओं ने अपनी मर्जी से पैसे जमा किए, ताकि पूरे निर्वाचन क्षेत्र के लगभग 70000 बुज़ुर्गों को हर महीने 1000 रुपए की पेंशन दी जा सके. इस कदम ने अभिषेक बनर्जी और उनके वोटरों के बीच एक मजबूत और सीधा रिश्ता बना दिया. इसका फायदा वो चुनाव में उठाने वाले थे.

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डायमंड हार्बर में डर, धमकी और धांधली का आरोप

इसके विपरीत विपक्ष एक अलग ही तस्वीर पेश करता है, जिसमें TMC के दबदबे की वजह डर, धमकाने और चुनाव से जुड़ी धांधली का माहौल बताया गया है. BJP और लेफ्ट फ्रंट, दोनों ने ही कई बार यह आरोप लगाया है कि स्थानीय पुलिस चुनाव से पहले विपक्षी कार्यकर्ताओं को किनारे करने के लिए उनके खिलाफ केस दर्ज करती है. उनको धमकी देती है. उनके खिलाफ कार्रवाई करती है. इससे वो डर जाते हैं.

अमित मालवीय समेत BJP के नेताओं ने डायमंड हार्बर को मतदाताओं को डराने-धमकाने और चुनावी धांधली का गढ़ बताया. अमित मालवीय ने 26 अप्रैल को आरोप लगाया था, "डायमंड हार्बर लंबे समय से आपराधिक गतिविधियों के केंद्र और चुनावी धांधली के गढ़ के तौर पर बदनाम रहा है." चुनाव प्रबंधन से परे विपक्ष ने यहां की राजनीतिक ताकत को एक अवैध 'अंडरग्राउंड इकॉनमी' से भी जोड़ा है.

 BJP ने आरोप लगाया कि डायमंड हार्बर के सुंदरबन और बांग्लादेश सीमा के करीब होने की वजह से ये इलाका मानव तस्करी, घुसपैठ और नशीले पदार्थों के लिए 'ट्रांजिट पॉइंट' का काम करता है, जिसका मकसद TMC के लिए वोट बैंक तैयार करना है. BJP कार्यकर्ताओं ने तो इस हद तक कह दिया कि यह चुनावी क्षेत्र कराची के 'अपराधियों के गढ़' 'लियारी' जैसा है, जिसे धुरंधर फिल्म में दिखाया गया है.

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कैसा रहा फालता और डायमंड हार्बर में मुकाबला 

फालता के अंदर चल रही स्थानीय लड़ाई 29 अप्रैल को मतदाताओं को डराने-धमकाने और EVM में छेड़छाड़ की बड़े पैमाने पर मिली शिकायतों के बाद एक 'हाई-स्टेक्स' मुकाबले में बदल गई. आरोपों में यह भी शामिल था कि लोग बटन पर चिपकाने वाला टेप, स्याही और यहां तक कि 'इत्र' का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि किसने किसे वोट दिया या फिर मतदान में रुकावट पैदा की जा सके. 

इसके जवाब में चुनाव आयोग ने शुरुआती वोटिंग को रद्द कर दिया और फालता के सभी 285 बूथों पर दोबारा से पूरी तरह वोटिंग कराने का आदेश दिया. इस फैसले पर अभिषेक बनर्जी ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने BJP के नेतृत्व पर जोरदार हमला बोला. यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को बांग्ला-विरोधी गुजराती गैंग और उनके चुनाव अधिकारियों को कठपुतली तक करार दिया. 

उन्होंने चुनौती देते हुए कहा था, "तुम्हारे पास जो कुछ भी है, सब ले आओ. मैं पूरे भारत संघ को चुनौती देता हूं. फलता आओ. अपने सबसे ताकतवर लोगों को भेजो, दिल्ली से किसी 'गॉडफ़ादर' को भेजो." फलता में कानून-व्यवस्था लागू करने की कमान चुनाव आयोग के पुलिस पर्यवेक्षक IPS अधिकारी अजय पाल शर्मा ने संभाली. अपराधियों के खिलाफ अपने सख्त रवैये के लिए उन्हें सिंघम के नाम से जाना जाता है.

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 IPS अजय पाल शर्मा ने स्थानीय स्तर पर होने वाली धमकियों और गुंडागर्दी के खिलाफ ज़ोरदार अभियान चलाया. इस तरीके से उनका सीधा मुकाबला TMC के स्थानीय दिग्गज नेता जहांगीर ख़ान से हो गया. जब वो चुनाव के दिन होने वाली धांधली के खिलाफ चेतावनी देने के लिए जहांगीर के घर गए, तो उन्होंने अपनी तुलना फिल्म 'पुष्पा' के किरदार से करते हुए कहा कि वह किसी के आगे नहीं झुकेंगे.

4 मई को बंगाल के चुनावी नतीजे आने के बाद हालात बदल गए. BJP ने जबरदस्त बढ़त हासिल करते हुए 294 में से 207 सीटें जीतकर बहुमत के साथ पहली बार सरकार बनाई. सत्ताधारी TMC महज 80 सीटों पर सिमट गई. इससे फलता में पुर्नमतदान से पहले ही पूरा माहौल बदल गया. 21 मई को दोबारा मतदान से ठीक दो दिन पहले जहांगीर खान ने अचानक चुनाव लड़ने से अपना नाम वापस ले लिया. 

उन्होंने दावा किया कि वो इसलिए पीछे हट रहे हैं ताकि फलता को नई सरकार द्वारा घोषित विकास पैकेज का फायदा मिल सके. ये कोई सोची-समझी रणनीति के तहत नाम वापस लेना नहीं था, बल्कि यह पूरी तरह से हथियार डाल देना था. TMC ने पूरे राज्य के चुनावी नतीजे देख लिए थे. केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती के चलते, TMC के लिए चुनाव में कोई चमत्कार कर पाना मुमकिन नहीं था.

BJP के नेताओं ने जहांगीर खान के चुनाव से हटने का तुरंत मज़ाक उड़ाया. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि 'पुष्पा' तो भाग खड़ा हुआ. जहांगीर खान के चुनाव से हटने के बावजूद पुर्नमतदान कड़ी सुरक्षा के बीच हुआ, जिसमें 87% लोगों ने वोट डाले. मतदान के सभी 22 दौर पूरे होने के बाद भारतीय जनता पार्टी के देबांग्शु पांडा ने यह सीट बड़े अंतर से जीत ली. उन्होंने 1,49,421 वोट हासिल किए हैं.

अभिषेक का 'डायमंड हार्बर मॉडल' कैसे फेल हुआ

कई मायनों में, फालता में TMC का पूरी तरह से सफाया होना, पूरे पश्चिम बंगाल में पार्टी के बड़े पैमाने पर पतन का ही एक आईना था. ठीक वैसे ही, जैसे ज्यादातर वोटरों ने TMC के मुख्य कल्याणकारी कार्यक्रमों (जैसे 'लक्ष्मी भंडार' और 'कन्याश्री') को नज़रअंदाज करते हुए BJP के वैकल्पिक विजन और बेहतर कानून-व्यवस्था को चुना, ठीक वैसा ही बदलाव डायमंड हार्बर के अंदर भी देखने को मिला.

अभिषेक बनर्जी का जो 'डायमंड हार्बर मॉडल' एक अचूक फॉर्मूला माना जाता था, वो 'सत्ता-विरोधी लहर' के सामने अपनी चमक खो बैठा. दरअसल, केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती ने इसमें एक निर्णायक भूमिका निभाई, जिसने TMC की डराने-धमकाने वाली पुरानी चालों को पूरी तरह से बेअसर कर दिया. फालता के लोगों के लिए कड़ी सुरक्षा वाले पोलिंग बूथ एक लोकतांत्रिक आजादी का एहसास लेकर आए.

21 मई को एक स्थानीय वोटर ने बताया, "यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा मेरे बचपन के दिनों में हुआ करता था. 15 साल पहले हमें वोट डालने में डर लगता था, लेकिन अब ऐसा बिल्कुल नहीं है. उस समय तो हमें पोलिंग बूथ तक आने की भी इजाजत नहीं होती थी. गुंडे हमें गेट पर ही रोक लेते थे. आज मैं बहुत खुश हूं." फालता से डर का माहौल पूरी तरह खत्म हो चुका है. इसका एहसास दूसरे दल भी कर रहे हैं.

दूसरे दलों के उम्मीदवार जहांगीर खान की धमकियों की वजह से पहले चुनाव प्रचार नहीं कर पाते थे. 'डायमंड हार्बर मॉडल' के पतन की एक और बड़ी वजह थी, दोबारा वोटिंग से ठीक दो दिन पहले, जहांगीर खान का अचानक चुनावी मैदान से हट जाना. उनका राजनीतिक तंत्र पहले ही पूरी तरह से बिखर चुका था. 4 मई को आए नतीजों के तुरंत बाद उनके दफ्तर पर हमला हुआ और तोड़फोड़ की गई.

इस लड़ाई को आगे जारी रखने के लिए उन्हें TMC के आलाकमान से भी कोई खास समर्थन नहीं मिल रहा था. खुद अभिषेक बनर्जी को भी जगह-जगह चोर-चोर के नारों का सामना करना पड़ रहा था, जिसके चलते उन्होंने भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होना बंद कर दिया था. फिलहाल फलता के नतीजे, हर लिहाज से 4 मई को पूरे राज्य में आई जनादेश की लहर की ही एक व्यापक पुष्टि हैं.

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