उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होते ही योगी आदित्यनाथ सरकार दो संवेदनशील घटनाओं को लेकर विपक्ष के निशाने पर आ गई है. प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद और नोएडा में इंजीनियर युवराज की डूबने से हुई मौत ने न सिर्फ प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि बीजेपी के भीतर भी असहजता बढ़ा दी है.
पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि दोनों ही मामलों को और बेहतर तरीके से, ज्यादा संवेदनशीलता के साथ हैंडल किया जा सकता था. चूंकि ये घटनाएं सीधे धार्मिक भावनाओं और प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़ी हैं, इसलिए बीजेपी नेतृत्व भी सतर्क नजर आ रहा है. पिछले एक सप्ताह में घटी इन दो घटनाओं ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को सरकार पर हमले का मौका दे दिया है.
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प्रयागराज में माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके समर्थकों को स्नान से रोके जाने को लेकर प्रशासन और संत समाज आमने-सामने आ गया. प्रशासन का तर्क है कि किसी भी संभावित भगदड़ को रोकने के उद्देश्य से कार्रवाई जरूरी थी, लेकिन जिस तरीके से स्थिति को संभाला गया, उसने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दीं.
दूसरी ओर, नोएडा सेक्टर-150 में इंजीनियर युवराज की डूबने से हुई मौत ने प्रशासन की तैयारियों और संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए. पुलिस, एसडीआरएफ और दमकलकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद युवराज की जान नहीं बच पाना व्यवस्था की बड़ी विफलता के तौर पर देखा जा रहा है.
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युवराज की मौत के बाद सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए एसआईटी का गठन किया, बिल्डर के खिलाफ कार्रवाई की और नोएडा के सीईओ को हटा दिया. बावजूद इसके, बीजेपी के एक धड़े का मानना है कि अगर पुलिस और जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों पर भी कार्रवाई होती, तो जनता के बीच ज्यादा सकारात्मक संदेश जाता.
पार्टी नेताओं का तर्क है कि नोएडा जैसे विकसित शहर में अगर इस तरह की लापरवाही सामने आती है, तो छोटे शहरों और कस्बों की स्थिति को लेकर लोगों की चिंता स्वाभाविक है.
वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अविमुक्तेश्वरानंद मामले का नाम लिए बिना सनातन को कमजोर करने वाले “कालनेमियों” के खिलाफ सख्ती की बात कही. जबकि, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने घटना को दुखद बताते हुए जांच के बाद दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिलाया. इन बयानों को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सरकार की ओर से एकरूप और स्पष्ट संदेश देने की जरूरत थी, ताकि विपक्ष को मुद्दा बनाने का मौका न मिले.
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समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि बीजेपी सनातन का अपमान कर रही है और उसके समापन की दिशा में काम कर रही है. कांग्रेस भी इस मुद्दे पर खुलकर सामने आ गई है. यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय प्रयागराज पहुंचकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के धरने को समर्थन दे चुके हैं.
बीजेपी के अंदरखाने में भी यह चर्चा तेज है कि इन मामलों में टकराव की बजाय संवाद और संवेदनशीलता का रास्ता अपनाया जाना चाहिए था. नेताओं का मानना है कि सामने आई तस्वीरें और वीडियो लंबे समय तक जनता के जेहन में रहेंगी और विपक्ष इन्हें लगातार सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करेगा.
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नोएडा मामले में युवराज की मौत से पहले पार्टी से जुड़े वीडियो लीक किए जाने को लेकर भी पार्टी के एक वर्ग ने असहमति जताई है. उनका कहना है कि इससे डैमेज कंट्रोल की बजाय सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा.
2026 उत्तर प्रदेश बीजेपी के लिए बेहद अहम साल है. एक तरफ अप्रैल से जुलाई के बीच पंचायत चुनाव संभावित हैं, तो दूसरी ओर अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में प्रशासनिक चूक या संवेदनशील मुद्दों पर गलत हैंडलिंग विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकती है. अब देखना यह है कि सरकार इन घटनाओं से सबक लेकर अपनी रणनीति और प्रशासनिक अप्रोच में कितना बदलाव करती है, या फिर विपक्ष को ऐसे मुद्दे आगे भी मिलते रहेंगे.
हिमांशु मिश्रा