हनुमानगढ़ी में क्या सच में पढ़ी गई थी नमाज? 22 साल पुराने विवाद की पूरी कहानी, जानिए क्या था पूरा मामला

'हनुमानगढ़ी में नमाज'... यह दावा जब-तब सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है. लेकिन क्या सचमुच मंदिर परिसर में नमाज पढ़ी गई थी? यह विवाद आखिर शुरू कैसे हुआ? कौन लोग मौजूद थे, मामला कोर्ट तक कैसे पहुंचा और आखिरकार इफ्तार पर रोक क्यों लगी? आइए जानते हैं 22 साल पुराने विवाद की पूरी कहानी.

Advertisement
हनुमानगढ़ी में नमाज की कहानी क्या है. (Photo: ITG) हनुमानगढ़ी में नमाज की कहानी क्या है. (Photo: ITG)

कुमार अभिषेक

  • लखनऊ,
  • 10 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 3:44 PM IST

अयोध्या की हनुमानगढ़ी का नाम जब भी सुर्खियों में आता है, एक पुराना विवाद फिर चर्चा में लौट आता है. दावा किया जाता है कि यहां मंदिर परिसर में नमाज पढ़ी गई थी. लेकिन इस पूरे मामले का संदर्भ समझना जरूरी है, क्योंकि कहानी सिर्फ 'नमाज' तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसकी शुरुआत सांप्रदायिक सौहार्द की एक कोशिश से हुई थी.

Advertisement

साल 2003 में अयोध्या विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकालने और हिंदू-मुस्लिम संवाद को बढ़ावा देने की पहल के तहत हनुमानगढ़ी स्थित महंत ज्ञान दास के आश्रम में रोजा इफ्तार का आयोजन किया गया. इस रोजा इफ्तार में मुस्लिम पक्ष से बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी और मुस्लिम नेता सादिक अली उर्फ बाबू टेलर समेत कई मुस्लिम प्रतिनिधि शामिल हुए थे. उस समय इसे दोनों समुदायों के बीच भरोसा कायम करने की एक कोशिश के तौर पर देखा गया.

यह भी पढ़ें: हनुमानगढ़ी के महंत प्रेमदास पहली बार रामलला के दर्शन को निकले, अयोध्या में भव्य शोभायात्रा के साथ रचा इतिहास

इफ्तार कार्यक्रम के बाद आरोप लगा कि कार्यक्रम के दौरान हनुमानगढ़ी परिसर में नमाज भी अदा की गई. यही आरोप बाद में विवाद की वजह बना. देखते ही देखते मामला धार्मिक और राजनीतिक बहस का विषय बन गया. हनुमानगढ़ी के ही एक अन्य महंत धर्मदास ने इस पूरे मामले को अदालत में चुनौती दी. उनका कहना था कि मंदिर परिसर में इस तरह का आयोजन नहीं होना चाहिए.

Advertisement

कोर्ट पहुंचा मामला, इफ्तार पर लगी रोक

मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच पहुंचा. सुनवाई के बाद अदालत से हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार आयोजित करने पर रोक (स्टे) मिल गई. इसके बाद यह विवाद और गहरा गया. बताया जाता है कि 2005 तक इस मुद्दे को लेकर काफी तनाव पैदा हो गया था. बढ़ते विवाद के बाद महंत ज्ञान दास ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अब भविष्य में हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार का आयोजन नहीं कराया जाएगा.

महंत ज्ञान दास की मंशा क्या थी?

महंत ज्ञान दास को अयोध्या विवाद के दौरान संवाद की राजनीति करने वाले संतों में गिना जाता था. वे अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष भी रह चुके थे. उनका कहना था कि हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच बातचीत और विश्वास कायम होना चाहिए. इसी सोच के तहत उन्होंने मुस्लिम समाज से संवाद बढ़ाने की कोशिशें की थीं. अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रहे महंत ज्ञान दास ने अयोध्या विवाद के समाधान को लेकर मुस्लिम बच्चों को भी साधने की वर्षों कोशिश की.

आज फिर क्यों उठ रहा है यह मुद्दा?

हनुमानगढ़ी में नमाज का मुद्दा समय-समय पर सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में सामने आता रहता है. लेकिन मौजूद तथ्यों के मुताबिक, इसकी शुरुआत 2003 के रोजा इफ्तार कार्यक्रम से जुड़े आरोपों से हुई थी. बाद में मामला अदालत पहुंचा और हनुमानगढ़ी परिसर में ऐसे आयोजनों पर रोक लग गई. यानी, आज जिस घटना का जिक्र अक्सर एक लाइन में किया जाता है, उसकी पूरी कहानी कहीं ज्यादा लंबी, जटिल और कानूनी मोड़ों से होकर गुजरी है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »