कब इंसानों का धरती से सफाया होगा, वैज्ञानिकों ने बनाया फॉर्मूला जो बताएगा प्रलय की तारीख!

इंसानों के अस्तित्व खत्म होने के लेकर हमेशा से चर्चा होती रही है. इस बारे में अलग- अलग वैज्ञानिकों ने अपने सिद्धांत दिए हैं. इन पर विवाद भी होता रहा है. अब कुछ वैज्ञानिकों ने एक फॉर्मूला बनाया है जो कैलकुलेट कर बताएगा कि इंसानों का अस्तित्व कब तक रहेगा.

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एक फॉर्मूला से वैज्ञानिक पता लगाएंगे कि कब धरती से इंसानों का अस्तित्व खत्म होगा (Photo - AI Generated) एक फॉर्मूला से वैज्ञानिक पता लगाएंगे कि कब धरती से इंसानों का अस्तित्व खत्म होगा (Photo - AI Generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 18 जून 2026,
  • अपडेटेड 2:33 PM IST

धरती पर इंसानों का अस्तित्व कब तक रहेगा? क्या कभी ऐसा दिन आएगा जब मानव सभ्यता पूरी तरह खत्म हो जाएगी? ये सवाल सदियों से लोगों को परेशान करते रहे हैं. समय-समय पर दुनिया के खत्म होने यानी प्रलय को लेकर कई भविष्यवाणियां भी सामने आती रही हैं. लेकिन अब कुछ वैज्ञानिकों ने एक ऐसा मैथमेटिकल फॉर्मूला पेश किया है, जो दावा करता है कि वह यह अनुमान लगा सकता है कि इंसान कब तक इस धरती पर रहेंगे.

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हालांकि यह कोई तय भविष्यवाणी नहीं है, लेकिन इस फॉर्मूले ने वैज्ञानिकों और आम लोगों के बीच बड़ी बहस छेड़ दी है. इसे 'डूम्सडे आर्ग्युमेंट' यानी प्रलय तर्क कहा जाता है.

आखिर क्या है यह डूम्सडे फॉर्मूला?
इस सिद्धांत के पीछे वैज्ञानिकों का तर्क काफी दिलचस्प है. उनका अनुमान है कि मानव इतिहास में अब तक करीब 117 अरब लोग जन्म ले चुके हैं और इस धरती पर जीवन जी चुके हैं.

वैज्ञानिकों का मानना है कि आज जीवित इंसान मानव इतिहास की टाइमलाइन में किसी खास या शुरुआती स्थान पर नहीं हैं, बल्कि बिल्कुल सामान्य और रैंडम जगह पर हैं. यहीं से गणित शुरू होता है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर अब तक जन्मे 117 अरब लोग मानव इतिहास के कुल लोगों का सिर्फ 5 प्रतिशत हिस्सा हैं, तो 100 प्रतिशत संख्या इससे 20 गुना ज्यादा होगी.

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इसी आधार पर 117 अरब को 20 से गुणा किया गया. इससे आंकड़ा निकलकर करीब 2.34 ट्रिलियन यानी 2 लाख 34 हजार करोड़ लोगों तक पहुंचता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह मानव जाति की संभावित अधिकतम आबादी हो सकती है.

फिर कब खत्म होंगे इंसान?
फॉर्मूले के समर्थकों का कहना है कि मौजूदा जन्म दर और जनसंख्या के रुझानों को देखते हुए मानव जाति को इस संख्या तक पहुंचने में लगभग 17,100 साल लग सकते हैं.

उनके मुताबिक 95 प्रतिशत संभावना है कि मानव सभ्यता इससे पहले ही समाप्त हो जाएगी. यानी यह संख्या एक तरह की ऊपरी सीमा है, जिसके आगे मानव अस्तित्व के पहुंचने की संभावना बहुत कम मानी जाती है.हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि वैज्ञानिकों ने इंसानों के खत्म होने की कोई निश्चित तारीख खोज ली है. यह सिर्फ एक सांख्यिकीय अनुमान है.

वैज्ञानिकों में ही छिड़ी बहस
यह सिद्धांत जितना चर्चित है, उतना ही विवादित भी है. कई वैज्ञानिक इस फॉर्मूले को स्वीकार नहीं करते. आलोचकों का कहना है कि यह पूरी गणना कुछ सीमित मान्यताओं पर आधारित है और उन तमाम खतरों या संभावनाओं को नजरअंदाज करती है, जो भविष्य में मानव सभ्यता को प्रभावित कर सकते हैं.

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कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नई तकनीकों की मदद से इंसान लाखों साल तक जीवित रह सकते हैं. अगर भविष्य में मानव जाति दूसरे ग्रहों पर बसने में सफल हो जाती है, तो यह पूरा गणित ही बदल सकता है.

नोबेल विजेता वैज्ञानिक ने भी दी चेतावनी
डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी भौतिक विज्ञानी डेविड ग्रॉस ने भी मानवता के भविष्य को लेकर चिंता जताई है. 2004 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार जीत चुके डेविड ग्रॉस का मानना है कि मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़े खतरे परमाणु युद्ध और तेजी से विकसित हो रही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हैं.

हाल ही में एक चर्चा के दौरान उनसे पूछा गया कि क्या अगले 50 वर्षों में विज्ञान किसी 'यूनिफाइड थ्योरी' तक पहुंच जाएगा. इस सवाल के जवाब में उन्होंने काफी चौंकाने वाली बात कही.

उन्होंने कहा कि आजकल वह लोगों को यह समझाने में समय बिताते हैं कि अगले 50 साल तक जीवित रहने की संभावना उतनी आसान नहीं है, जितनी लोग सोचते हैं. उनके मुताबिक परमाणु युद्ध का खतरा इतना बड़ा है कि मानवता के सामने अगले कुछ दशकों में गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.

क्या सच में खत्म हो जाएगी मानव सभ्यता?
इस सवाल का कोई निश्चित जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है. डूम्सडे आर्ग्युमेंट सिर्फ एक गणितीय मॉडल है, न कि भविष्य देखने वाली कोई मशीन.फिर भी यह सिद्धांत एक अहम सवाल जरूर खड़ा करता है—क्या इंसान अपनी तकनीक, विज्ञान और समझदारी की मदद से आने वाले खतरों को टाल पाएगा, या फिर कभी न कभी मानव सभ्यता भी इतिहास का हिस्सा बन जाएगी?

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फिलहाल इसका जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है, लेकिन इतना तय है कि इंसानों के अस्तित्व को लेकर यह गणितीय फॉर्मूला दुनिया भर में नई बहस जरूर छेड़ चुका है.

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