भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने एक महत्वपूर्ण खुलासा किया है. चंद्रयान-3 मिशन के प्रयोग से पता चला है कि चांद की सतह एक समान धूल का ढेर नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग परतों वाली केक जैसी संरचना है. ऊपरी परत सिर्फ कुछ सेंटीमीटर मोटी है, जबकि उसके नीचे की परत ज्यादा सख्त और घनी है.
यह खोज चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर के उस हॉप (छोटी छलांग) के दौरान हुई, जो 2 सितंबर 2023 को की गई थी. जब लैंडर के इंजन चालू किए गए, तो निकलने वाली गर्म गैस ने ऊपरी तीन सेंटीमीटर मोटी ढीली धूल को उड़ा दिया. इससे नीचे की पुरानी और मजबूत परत सामने आ गई.
फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) अहमदाबाद के वैज्ञानिकों ने इस डेटा की जांच की. उन्होंने पाया कि चांद की सतह पर लगातार छोटे-छोटे उल्कापिंडों के टकराने से ऊपरी परत बारीक और ढीली हो गई है.
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दोनों परतों में कितना अंतर?
ISRO ने इसे आसान भाषा में समझाते हुए कहा कि अगर कोई अंतरिक्ष यात्री चांद पर चलेगा तो ऊपरी सतह सूखे आटे जैसी लगेगी, जबकि कुछ सेंटीमीटर नीचे यह नम और सख्त मिट्टी जैसा व्यवहार करेगी.
यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है?
चंद्रमा की सतह की दो-परत वाली संरचना को समझना भविष्य के चंद्र मिशनों के लिए बहुत जरूरी है. ISRO के अनुसार, यह जानकारी खासकर चांद के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में लैंडिंग, रोवर चलाने और भविष्य में वैज्ञानिक बेस बनाने के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी.
यह अध्ययन चांद की सतह की विविधता को समझने में पहला महत्वपूर्ण कदम है. इससे वैज्ञानिकों को यह भी पता चलेगा कि चांद पर निर्माण कार्य कैसे किए जाएं, वहां उपकरण कैसे लगाएं और भविष्य में मानव बस्ती बसाने की योजना कैसे बनाएं.
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वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
ISRO ने कहा कि चांद की सतह सदियों से छोटे उल्कापिंडों के निरंतर हमलों से प्रभावित रही है. इसी कारण ऊपरी परत इतनी ढीली और बारीक हो गई है, जबकि नीचे की परत अपेक्षाकृत सुरक्षित रही है. यह अध्ययन अपनी तरह का पहला अनोखा है, जो चंद्रयान-3 के सफल हॉप प्रयोग से संभव हुआ.
चंद्रयान-3 मिशन भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों में एक नया अध्याय जोड़ रहा है. चांद की सतह की दो-परत वाली संरचना की खोज से न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के चंद्र मिशनों को लाभ मिलेगा.
आजतक साइंस डेस्क