Mahabharat Facts: शंख का महत्व हम सभी जानते हैं. मान्यता है कि जहां तक शंख की ध्वनि पहुंचती है, वहां तक नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं कर पाती हैं. प्राचीन काल में शंख केवल पवित्रता का प्रतीक ही नहीं, बल्कि शौर्य और वीरता का भी प्रतीक माना जाता था. इसका महत्व इतना अधिक था कि महाभारत काल में राजा विराट के एक पुत्र का नाम भी शंख रखा गया था.
श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय में विभिन्न योद्धाओं द्वारा बजाए गए शंखों का वर्णन मिलता है. इसमें बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण ने पांचजन्य, अर्जुन ने देवदत्त और भीमसेन ने पौंड्र नामक शंख बजाया. वहीं युधिष्ठिर ने अनंतविजय, नकुल ने सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक शंख का नाद किया था. आगे के श्लोकों में काशिराज, शिखंडी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, सात्यकि, द्रुपद, द्रौपदी के पुत्रों और अभिमन्यु द्वारा भी शंख बजाने का उल्लेख मिलता है. अब आइए इन प्रमुख शंखों के बारे में विस्तार से जानते हैं.
भगवान श्रीकृष्ण का शंख- पांचजन्य
पांचजन्य भगवान श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध शंख था. कथा के अनुसार, जब श्रीकृष्ण और बलराम ने महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा पूर्ण की, तब गुरु दक्षिणा में उन्होंने अपने मृत पुत्र को वापस मांगा. इसी उद्देश्य से वे समुद्र में गए, जहां श्रीकृष्ण ने शंखासुर नामक असुर का वध किया था. उसी के शरीर से प्राप्त शंख को उन्होंने अपने पास रखा, जो आगे चलकर पांचजन्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
भीष्म पितामह का शंख- गंगनाभ
भीष्म पितामह का शंख गंगनाभ कहलाता था, जो उन्हें उनकी माता गंगा से प्राप्त हुआ था. गंगनाभ का अर्थ है गंगा की ध्वनि. जब भीष्म इस शंख को बजाते थे, तो उसकी गर्जना से शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न हो जाता था. महाभारत युद्ध की शुरुआत भी श्रीकृष्ण के पांचजन्य और भीष्म के गंगनाभ के नाद से हुई थी.
युधिष्ठिर का शंख- अनंतविजय
धर्मराज युधिष्ठिर का शंख अनंतविजय था. इसकी ध्वनि को अनंत तक पहुंचने वाला माना जाता है. इसी शंख को साक्षी मानकर पांडवों ने दिग्विजय अभियान किया और युधिष्ठिर के साम्राज्य का विस्तार किया.
भीम का शंख- पौंड्र
भीमसेन का शंख पौंड्र अत्यंत विशाल था. इसे उठाना ही साधारण व्यक्ति के लिए असंभव था, बजाना तो दूर की बात थी. इसकी ध्वनि इतनी प्रचंड थी कि उसके कंपन से देवता भी विचलित हो जाते थे. कहा जाता है कि यह शंख भीम को नागलोक से प्राप्त हुआ था.
अर्जुन का शंख- देवदत्त
अर्जुन का शंख देवदत्त था, जिसे उन्हें वरुण देव से वरदान स्वरूप प्राप्त हुआ था. यह शंख पांचजन्य जितना ही शक्तिशाली माना जाता था. मान्यता है कि इस शंख को धारण करने वाला धर्मयुद्ध में पराजित नहीं होता. जब पांचजन्य और देवदत्त एक साथ बजते थे, तो शत्रु सेना में भगदड़ मच जाती थी.
नकुल और सहदेव के शंख- सुघोष और मणिपुष्पक
नकुल का शंख सुघोष और सहदेव का मणिपुष्पक था. सुघोष अपनी मधुर और शक्तिशाली ध्वनि के लिए जाना जाता था, जबकि मणिपुष्पक मणियों से जड़ा अत्यंत दुर्लभ शंख था. ये दोनों शंख नकुल और सहदेव को अश्विनी कुमारों से प्राप्त हुए थे.
दुर्योधन का शंख- विदारक
दुर्योधन का शंख विदारक था. विदारक का अर्थ है विदीर्ण करने वाला या पीड़ा देने वाला. इसकी ध्वनि शत्रु के हृदय में भय और वेदना उत्पन्न कर देती थी. कहा जाता है कि यह शंख उसे गांधार क्षेत्र से प्राप्त हुआ था.
कर्ण का शंख- हिरण्यगर्भ
सूर्यपुत्र कर्ण का शंख हिरण्यगर्भ कहलाता था. यह उन्हें उनके पिता सूर्यदेव से प्राप्त हुआ था. हिरण्यगर्भ का अर्थ है सृष्टि का प्रारंभ. कर्ण, कुंती के ज्येष्ठ पुत्र थे, इसलिए यह नाम उनके व्यक्तित्व के अनुरूप माना जाता है.
धृष्टद्युम्न का शंख- यज्ञघोष
द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न का शंख यज्ञघोष था. मान्यता है कि यह शंख उनके साथ ही अग्नि से उत्पन्न हुआ था और इसका तेज अग्नि के समान था. इसी शंख के उद्घोष के साथ वे पांडव सेना का संचालन करते थे.
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