Kamakhya Temple: हर साल 3 दिन के लिए क्यों लाल हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी? गुवाहाटी के अनोखे मंदिर की दिलचस्प कहानी

Kamakhya Temple: गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में हर साल अंबुबाची मेले के दौरान एक अनोखी घटना होती है, जब ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल दिखाई देता है. इसे देवी के मासिक धर्म से जोड़ा जाता है. इस रहस्य के पीछे आस्था, परंपरा और विज्ञान, तीनों की अलग-अलग मान्यताएं हैं.

Advertisement
कामख्या मंदिर (Photo: ITG) कामख्या मंदिर (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 28 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 8:33 AM IST

Kamakhya Temple: गुवाहाटी के नीलाचल पहाड़ियों पर स्थित कामाख्या मंदिर बाकी मंदिरों से काफी अलग माना जाता है. ये मंदिर मां कामाख्या को समर्पित है. यह मंदिर शक्ति का भी एक रूप हैं, जो कि सृष्टि, उर्वरता (fertility) और प्रकृति के चक्र से जुड़ी हुई हैं. यहां किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है, बल्कि एक योनि आकार की शिला की पूजा की जाती है. जो स्त्री शक्ति और जीवन के स्रोत का प्रतीक मानी जाती है. हर साल यहां अंबुबाची मेला लगता है, जो पूर्वोत्तर भारत के सबसे बड़े मेले में से एक है. मान्यता है कि इस दौरान मां कामाख्या अपने वार्षिक मासिक धर्म से गुजरती हैं. इन तीन दिनों में मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, जिसे विश्राम और शुद्धिकरण का समय माना जाता है. 

Advertisement

इस दौरान हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और पूरा माहौल भक्ति से भर जाता है. कहा जाता है कि इसी समय ब्रह्मपुत्र नदी का पानी हल्का लाल हो जाता है, जिसे देवी के मासिक धर्म से जोड़ा जाता है. यह परंपरा स्त्रीत्व और सृजन शक्ति को सम्मान देने का प्रतीक मानी जाती है, जिन विषयों पर आमतौर पर खुलकर बात नहीं होती है.

कामाख्या मंदिर क्यों है विशेष?

कामाख्या मंदिर की खासियत सिर्फ उसकी पूजा पद्धति में ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी प्राचीन कथा में भी छिपी है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था, लेकिन उनके पिता राजा दक्ष इस रिश्ते से खुश नहीं थे. जब दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ कराया, तो उन्होंने जानबूझकर भगवान शिव को नहीं बुलाया. यह अपमान सती सहन नहीं कर पाईं और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए.

Advertisement

जब भगवान शिव को इस घटना का पता चला, तो वे बेहद क्रोधित और दुखी हो गए. उन्होंने सती के शरीर को उठाया और तांडव करने लगे. उनका यह रौद्र रूप इतना भयानक था कि पूरे सृष्टि के नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया. तब स्थिति को संभालने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से कई हिस्सों में विभाजित कर दिया. जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई. कुल मिलाकर 51 शक्तिपीठ माने जाते हैं. इन्हीं में से एक स्थान कामाख्या मंदिर है, जहां माता सती का गर्भ (योनि) गिरा था. यही वजह है कि इस मंदिर को स्त्री शक्ति, सृजन और प्रकृति के सबसे मूल रूप का प्रतीक माना जाता है.

कामाख्या, वो देवी जो रक्त से जुड़ी आस्था का प्रतीक हैं

कामाख्या मंदिर बाकी मंदिरों से बिल्कुल अलग है. यहां आपको कोई पारंपरिक मूर्ति नहीं दिखेगी, न ही किसी देवी का चेहरा या प्रतिमा. इस मंदिर में पूजा का मुख्य केंद्र एक योनि रूपी शिला है, जो स्त्री शक्ति और सृष्टि के मूल स्रोत का प्रतीक मानी जाती है. पहली बार सुनने में यह बात थोड़ी अलग या चौंकाने वाली लग सकती है, लेकिन इसके पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी है. मंदिर के अंदर, एक गुफा जैसे स्थान में यह शिला स्थित है, जहां एक प्राकृतिक जलधारा सालभर इसे नम बनाए रखती है. पुजारी और पुजारिनें इसे कपड़े और फूलों से सुसज्जित रखते हैं.

Advertisement

कई महिलाएं जो यहां दर्शन करने आती हैं, कहती हैं कि उस गुफा में जाते ही एक अलग तरह की ऊर्जा महसूस होती है. एक ऐसी शक्ति, जिसे शब्दों में समझाना आसान नहीं होता है. इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां मासिक धर्म (menstruation) को छुपाने या गलत मानने के बजाय, उसे पवित्र माना जाता है. जहां ज्यादातर जगहों पर इस विषय पर बात करने से भी कतराया जाता है, वहीं यहां इसे देवी की शक्ति के रूप में देखा जाता है. 

लाल होती है ब्रह्मपुत्र नदी

हर साल जून या जुलाई में अंबुबाची मेला के दौरान कामाख्या मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं. मान्यता है कि इस समय देवी कामाख्या मासिक धर्म के दौर से गुजरती हैं. इन दिनों मंदिर में पुजारी प्रवेश नहीं करते और पूरी व्यवस्था महिला सेविकाएं संभालती हैं. इसी दौरान पास बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल रंग का दिखाई देने लगता है. इसे देवी के रजस्वला होने का संकेत माना जाता है. इस अद्भुत घटना को देखने और आशीर्वाद पाने के लिए लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.

तीन दिन बाद चौथे दिन मंदिर के कपाट फिर से खुलते हैं. देवी का विशेष स्नान और पूजा की जाती है, जिसके बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में कपड़ा या पवित्र जल दिया जाता है. माना जाता है कि यह प्रसाद कई तरह की समस्याओं जैसे संतान सुख और स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों में लाभ देता है. यह आस्था है या कुछ और, इसे लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन जो लोग यहां आते हैं, उनके अनुभव इस परंपरा को और भी खास बना देते हैं.

Advertisement

आखिर नदी का पानी लाल क्यों हो जाता है?

कामाख्या मंदिर से जुड़ी इस घटना को लेकर वैज्ञानिकों ने भी कई वजहें बताई हैं. कुछ लोगों का मानना है कि मंदिर के आसपास की पहाड़ियों में सिनाबर (लाल खनिज) पाया जाता है, जो बारिश के मौसम में बहकर पानी में मिल जाता है और उसे लाल रंग दे देता है. वहीं कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि मानसून के दौरान उगने वाली खास तरह की शैवाल (algae) भी इसका कारण हो सकती है. कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इसमें पूजा के दौरान सिंदूर मिलाया जाता है.

इनमें से कौन-सी बात सही है, इसका कोई एक पक्का जवाब नहीं है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यह घटना हर साल बिल्कुल उसी समय होती है, जब अंबुबाची मेला लगता है. सिर्फ उन्हीं तीन दिनों में ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल नजर आता है, बाकी समय नहीं. इसलिए कुछ लोग इसे चमत्कार मानते हैं, तो कुछ इसे संयोग कहते हैं. लेकिन इस कहानी का एक गहरा पहलू भी है. आज भी समाज में महिलाओं के शरीर और मासिक धर्म को लेकर खुलकर बात नहीं की जाती, कई बार इसे शर्म या समस्या की तरह देखा जाता है. वहीं कामाख्या मंदिर इस सोच के बिल्कुल उल्टा खड़ा है. यह हमें याद दिलाता है कि स्त्री शरीर पवित्र है और उसके प्राकृतिक चक्र भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement