Jagannath Rath Yatra Secrets: भगवान श्री जगन्नाथ की रथ यात्रा हर साल बड़े धूमधाम के साथ निकाली जाती है. इस पावन दिन का भक्त पूरे साल बेसब्री से इंतजार करते हैं. इस वर्ष रथ यात्रा का आरंभ आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि, यानी 16 जुलाई से होगा, जिसमें लाखों श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है. धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति इस पवित्र यात्रा का हिस्सा बनता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. साथ ही, उसे काम, क्रोध और लोभ जैसे दोषों से भी मुक्ति मिलती है.
मूर्ति बदलने की परंपरा
श्री जगन्नाथ मंदिर से जुड़े कई ऐसे रहस्य हैं, जो लोगों को आश्चर्यचकित कर देते हैं. पूरी दुनिया में उड़ीसा के पुरी का जगन्नाथ मंदिर इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां भगवान की काठ (लकड़ी) की अधूरी मूर्तियां स्थापित हैं और जिन्हें हर 12 साल में (कभी-कभी 19 साल में) पूरी तरह बदल दिया जाता है.
इसी महत्वपूर्ण परंपरा को नवकलेवर कहा जाता है. यह अनुष्ठान लगभग हर 12 साल में किया जाता है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की मूर्तियों को बदला जाता है.
क्या है नवकलेवर प्रथा?
नवकलेवर का अर्थ होता है नया शरीर. इस परंपरा के तहत मंदिर में स्थापित पुरानी प्रतिमाओं की जगह नई प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि ये मूर्तियां लकड़ी से बनी होती हैं, जो समय के साथ खंडित हो सकती हैं. इस अनुष्ठान की सबसे खास बात इसकी गोपनीयता है. मान्यता के अनुसार, जब मूर्तियों को बदला जाता है, उस समय पूरे शहर की लाइट बंद कर दी जाती है, ताकि चारों ओर अंधेरा रहे और इस प्रक्रिया को कोई देख न सके. इसे बेहद गुप्त तरीके से संपन्न किया जाता है.
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की नई प्रतिमाएं नीम की लकड़ी से बनाई जाती हैं. इन पेड़ों का चयन मंदिर के मुख्य पुजारी करते हैं. मान्यता है कि ये पेड़ करीब 100 साल पुराने होने चाहिए और उनमें किसी प्रकार का दोष नहीं होना चाहिए. यह परंपरा आस्था, रहस्य और श्रद्धा का अद्भुत संगम है, जो जगन्नाथ धाम को और भी विशेष बनाती है.
यह कब होता है?
यह प्रक्रिया हर साल नहीं होती है. पंचांग के अनुसार, जब आषाढ़ महीने में मलमास यानी अधिकमास पड़ता है मतलब यानी जिस साल आषाढ़ के दो महीने होते हैं, उसी साल नवकलेवर उत्सव मनाया जाता है. आमतौर पर यह अंतराल 12 से 19 वर्ष का होता है.
ब्रह्म पदार्थ का सबसे बड़ा रहस्य
मूर्तियां बदलने की इस प्रक्रिया में सबसे रहस्यमयी घटना है ब्रह्म पदार्थ को पुरानी मूर्ति से निकालकर नई मूर्ति में स्थापित करना.
महाअंधकार के बीच अनुष्ठान
जिस रात यह काम होता है, पूरे पुरी शहर की बिजली काट दी जाती है. मंदिर परिसर में पूरी तरह अंधेरा कर दिया जाता है.
आंखों पर पट्टी और हाथों में दस्ताने
मंदिर के सबसे प्रधान पुजारी (दइतापति) आंखों पर रेशमी पट्टी बांधकर और हाथों में मोटे कपड़े लपेटकर पुरानी मूर्ति के सीने से 'ब्रह्म पदार्थ' निकालते हैं और उसे नई मूर्ति के सीने में रख देते हैं.
अद्भुत एहसास
जिन पुजारियों ने यह काम किया है, उनका कहना है कि उन्होंने कभी इस पदार्थ को देखा नहीं, लेकिन जब वे इसे हाथ में लेते हैं, तो ऐसा महसूस होता है जैसे कोई चीज धड़क रही हो (जैसे कोई जीवित दिल). मान्यता है कि यह साक्षात श्री कृष्ण का हृदय है, जो आज भी धड़कता है.
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