Premanand Maharaj: मासिक धर्म में तीर्थ यात्रा करनी चाहिए या नहीं? प्रेमानंद महाराज ने दिया बड़ा जवाब

Premanand Maharaj: मासिक धर्म के दौरान मंदिर जाने और दर्शन करने को लेकर अक्सर महिलाओं के मन में सवाल रहते हैं. तो आइए जानते हैं कि प्रेमानंद महाराज ने इस विषय पर क्या कहा और तीर्थ यात्रा के दौरान ऐसी स्थिति में क्या करना उचित माना जाता है.

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तीर्थयात्रा में मासिक धर्म आने पर क्या करना उचित माना जाता है? (Photo: ITG) तीर्थयात्रा में मासिक धर्म आने पर क्या करना उचित माना जाता है? (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:46 PM IST

Premanand Maharaj: मासिक धर्म (पीरियड्स) को लेकर मंदिर जाने और पूजा करने से जुड़ी मान्यताएं लंबे समय से समाज का हिस्सा रही हैं. पारंपरिक तौर पर माना जाता था कि इस दौरान महिलाओं को पूजा-पाठ और मंदिर से दूर रहना चाहिए, क्योंकि इसे 'अशुद्धता' से जोड़ा जाता है. हालांकि, कई विद्वानों का मानना है कि यह नियम सीधे धार्मिक ग्रंथों से नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराओं से जुड़े हैं. 

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इसी से जुड़ा एक सवाल एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज से किया. उस महिला भक्त ने महाराज जी से कहा कि, 'जैसे जब हम लोग तीर्थ यात्राओं पर जाते हैं, तो कई महिलाएं हमारे पास एक ही सवाल लेकर आती हैं कि वे बड़ी मुश्किल से यहां तक पहुंची हैं, लेकिन उसी समय उन्हें मासिक धर्म शुरू हो जाता है. ऐसे में उनके मन में दुविधा होती है कि उन्हें दर्शन करने चाहिए या नहीं.'

क्या महावारी में तीर्थयात्रा करनी चाहिए?

प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि, 'दर्शन करने का सौभाग्य तो नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि मासिक धर्म एक शरीर की प्रक्रिया है. जो प्रत्येक माताओं और बहनों के शरीर में महीने में एक बार आती है. अगर ऐसी स्थिति अचानक आ जाए और बार-बार वहां जाना संभव न हो, तो ऐसे में स्नान करके और भगवान का प्रसाद, चंदन या जल छिड़ककर श्रद्धा से दर्शन कर लेना उचित होता है. इस दौरान मंदिर में किसी सेवा सामग्री को न छुएं और न ही किसी चीज का स्पर्श करें, बल्कि दूर से ही श्रद्धा भाव के साथ दर्शन करें. क्योंकि जीवन में दोबारा वहां आने का अवसर मिले या न मिले, यह किसी को नहीं होता है.'

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प्रेमानंद महाराज ने बताई मासिक धर्म की कथा

प्रेमानंद महाराज आगे बताते हैं कि, 'मासिक धर्म कोई निंदनीय बात नहीं बल्कि बंधनीय बात है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि देवताओं के राजा इंद्र द्वारा वृत्रासुर वध के बाद जो ब्रह्महत्या का दोष लगा, उसे ब्रह्मऋषियों ने चार भागों में विभाजित कर दिया था. एक भाग नदियों को दिया गया, जो झाग (फेन) के रूप में दिखाई देता है. दूसरा वृक्षों को मिला, जो गोंद के रूप में प्रकट होता है, तीसरा भूमि को दिया गया, जो बंजरपन के रूप में माना जाता है और चौथा भाग स्त्रियों ने स्वीकार किया, जिसे मासिक धर्म कहा जाता है. इस मान्यता के अनुसार, इसे किसी निंदा या अशुद्धता के रूप में नहीं, बल्कि एक त्याग और वहन के रूप में देखा जाता है. इसलिए यह धारणा भी रखी जाती है कि महिलाओं को इसके कारण किसी धार्मिक लाभ या सम्मान से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.'

'ऐसा नहीं है कि इस कारण उन्हें किसी भी धार्मिक लाभ से पूरी तरह वंचित कर दिया जाए. यदि ऐसी स्थिति में महिलाएं स्नान आदि करके स्वयं को शुद्ध कर लें, तो वे श्रद्धा के साथ दूर से दर्शन कर सकती हैं, यह भी एक तरह का सौभाग्य ही है. क्योंकि हर किसी के लिए बार-बार किसी तीर्थ स्थान पर जाना संभव नहीं होता. कई लोग आर्थिक कठिनाइयों, स्वास्थ्य समस्याओं या व्यस्त जीवन के बीच बड़ी मेहनत से ऐसे धामों तक पहुंचते हैं.'

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करें परंपराओं का आदर

आगे महाराज जी कहते हैं कि, 'हां परंपराओं का सम्मान करते हुए यह ध्यान रखा जा सकता है कि वे किसी वस्तु को न छुएं और न ही कोई सेवा सामग्री अर्पित करें, लेकिन दूर से दर्शन करके अपने मन की आस्था और संतोष को बनाए रख सकती हैं. इसलिए उन्हें पूरी तरह वंचित करना उचित नहीं है, बल्कि उनकी श्रद्धा का सम्मान करते हुए उन्हें यह अवसर मिलना चाहिए.' 

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