Neem Karoli Baba & Steve Jobs: कहते हैं कि इंसान के जीवन में बदलाव आने से पहले उसे बहुत उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं. कड़ी मेहनत और संघर्ष व्यक्ति को मजबूत बना देते हैं, फिर जाकर उसे सफलता मिलती है. ऐसा ही कुछ स्टीव जॉब्स की कहानी भी है. जिन्होंने दुनिया की बड़ी टेक कंपनी एप्पल की स्थापना की. जब वे सिर्फ 19 साल के थे, तो वे काफी उलझन और भटकाव की स्थिति में थे. उसी दौरान वे उत्तराखंड के कैंची धाम आश्रम पहुंचे, जो नीम करौली बाबा का स्थान है. माना जाता है कि इस यात्रा ने उनको नई सोच और जीवन में एक नई दिशा दी. कुछ सालों बाद उन्होंने एप्पल की शुरुआत की, जो आज दुनिया की सबसे बड़ी और प्रभावशाली टेक कंपनियों में से एक है.
कैसे बना एप्पल ब्रैंड?
1 अप्रैल 1976 को स्टीव जॉब्स ने अपने दोस्त स्टीव वॉजनियाक के साथ मिलकर एप्पल की शुरुआत की थी. शुरुआत में यह काम जॉब्स के घर के गैरेज से शुरू हुआ था, लेकिन आज यही कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में गिनी जाती है. iPhone, Mac, iPod और एप्पल वॉच जैसे कई प्रोडक्ट्स इसी कंपनी ने लोगों को दिए, जो आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं.
लेकिन इस सफलता की असली शुरुआत कई साल पहले हो चुकी थी. साल 1974 में स्टीव जॉब्स ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी, क्योंकि वे अपने जीवन का असली मकसद समझना चाहते थे. बाद में उन्होंने कहा था कि यह उनके लिए खुद को जानने और समझने की एक गंभीर खोज थी. इसी तलाश में वे अपने दोस्त डैनियल कोटके के साथ भारत आए. दोनों की मुलाकात 1972 में रीड कॉलेज में हुई थी. इसके बाद वे भारत में आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में निकल पड़े और उत्तराखंड के नैनीताल में स्थित नीम करौली बाबा के कैंची धाम आश्रम पहुंचे. यहीं से उनके जीवन की सोच में बड़ा बदलाव आया.
गुरु की तलाश और बदलती सोच
जब स्टीव जॉब्स और उनके दोस्त आश्रम पहुंचे, तब वहां का माहौल काफी शांत था. क्योंकि, नीम करौली बाबा का एक साल पहले, सितंबर 1973 में ही निधन हो चुका था. फिर भी जॉब्स कुछ दिनों तक वहीं रुके और बाबा की सीखों से प्रेरणा लेते रहे. इसके बाद उन्होंने भारत में कई जगहों की यात्रा की. वे कभी मंदिरों में रहे, कभी आश्रमों में और कभी गांव के लोगों के साथ समय बिताया. उनके पास ज्यादा पैसे नहीं थे, इसलिए वे पैदल ही अलग-अलग जगहों पर घूमते रहे. उन्होंने हरिद्वार, नैनीताल और मनाली जैसे कई धार्मिक स्थानों की यात्रा की.
जॉब्स का मानना था कि भारत के लोग दिमाग से ज्यादा अपने 'अंतर्ज्ञान' यानी intuition पर भरोसा करते हैं, और यही चीज उन्हें खास बनाती है. उनके अनुसार, अंतर्ज्ञान कई बार बुद्धि से भी ज्यादा ताकतवर होती है और इस सोच का उनके काम पर गहरा असर पड़ा. भारत में उन्होंने करीब 7 महीने बिताए और इस दौरान यहां की संस्कृति को करीबी से समझा. इस यात्रा के दौरान उनके पास एक ही किताब थी-परमहंस योगानंद की Autobiography of a Yogi, जिसे उन्होंने पढ़ा था. भारत में सादगी भरी जिंदगी और अंतर्ज्ञान पर विश्वास ने उनकी सोच को पूरी तरह बदल दिया, जिसका असर उनके आगे के जीवन और काम में साफ दिखाई दिया.
स्टीव जॉब्स ने ऐसे रखी थी एप्पल कंपनी की नींव
भारत से वापस लौटने के बाद स्टीव जॉब्स ने अपने दोस्त स्टीव वॉजनियाक के साथ मिलकर छोटे-छोटे कंप्यूटर बनाना शुरू किया. शुरुआत में वे इन्हें शौक के तौर पर बनाने वाले लोगों को बेचते थे. सिर्फ 1300 डॉलर की छोटी सी रकम से उन्होंने अपने घर के गैरेज में एप्पल कंपनी की नींव रखी. आज यही कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल है, जिसकी वैल्यू ट्रिलियंस में पहुंच चुकी है.
जॉब्स के करीबी लोगों का मानना था कि भारत की उनकी यात्रा और नीम करौली बाबा के आश्रम का अनुभव उनके जीवन में हमेशा बना रहा. भले ही वे बाबा से सीधे नहीं मिल पाए, लेकिन उनकी सीखों का असर जॉब्स की सोच पर लंबे समय तक रहा. कहा जाता है कि भारत से उन्होंने सादगी, अंतर्ज्ञान (intuition) और भावनात्मक समझ सीखी, जो आगे चलकर एप्पल के डिजाइन और उनके लीडरशिप स्टाइल में भी दिखाई दी.
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