Garud Puran: गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु ने गरुड़ को प्राणियों की मृत्यु, यमलोक की यात्रा, नरक योनियों और सद्गति जैसे कई गहरे और रहस्यमयी विषयों पर विस्तार से बताया है. इन्हीं में एक महत्वपूर्ण नियम यह भी बताया गया है कि किसी व्यक्ति का दाह संस्कार करने के बाद उसके परिजनों को श्मशान घाट की ओर पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए. आखिर इसके पीछे क्या धार्मिक कारण है?
आपने अक्सर सुना होगा कि यह जीवन एक किराए का घर है, जिसे एक दिन छोड़कर जाना ही पड़ता है. यानी हर किसी की मृत्यु निश्चित है. इसके बावजूद मनुष्य इस विषय पर बात करने से बचता है और मृत्यु शब्द से डरता है. महाभारत में युधिष्ठिर ने यक्ष से कहा था कि दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि मनुष्य रोज किसी न किसी को मरते हुए देखता है, लेकिन अपने मरने के बारे में कभी नहीं सोचता है, जबकि मृत्यु तो निश्चित है.
दरअसल, हमारा शरीर पांच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, से बना है और एक दिन इन्हीं में विलीन हो जाता है. इसलिए, मनुष्य चाहे कितनी भी दौलत या शोहरत कमा ले, अंत में उसे सब कुछ यहीं छोड़कर जाना पड़ता है. भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण ने कहा है कि, 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु: ध्रुवं जन्म मृतस्य च' अर्थात जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जिसकी मृत्यु हुई है उसका पुनर्जन्म भी निश्चित है. यह एक अनंत चक्र है. हिंदू धर्म में जन्म से मृत्यु तक 16 संस्कार बताए गए हैं, जिनमें अंतिम संस्कार सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. इस संस्कार से जुड़े कई नियम गरुड़ पुराण में वर्णित हैं जैसे सूर्यास्त से पहले दाह संस्कार, कपाल क्रिया, मुंडन, पिंडदान और श्राद्ध कर्म आदि. इसी क्रम में यह भी कहा गया है कि दाह संस्कार के बाद किसी को भी पीछे मुड़कर श्मशान की ओर नहीं देखना चाहिए. इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक कारण है.
दाह संस्कार करने के बाद क्यों नहीं देखना चाहिए पीछे?
गरुड़ पुराण के अनुसार, दाह संस्कार के बाद शरीर भले ही जल जाता है, लेकिन आत्मा का अस्तित्व बना रहता है. गीता में भी कहा गया है कि 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः अर्थात आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है.' मृत्यु के बाद कई बार आत्मा अपने परिजनों के प्रति मोह में बंधी रहती है और उनके आसपास भटकती रहती है. इस मोह के कारण आत्मा को मुक्ति प्राप्त करने में कठिनाई होती है. इसी मोह को तोड़ने के लिए यह नियम बनाया गया है कि कोई भी व्यक्ति पीछे मुड़कर न देखे.
अगर कोई पीछे मुड़कर देखता है, तो आत्मा को यह संकेत मिलता है कि उसके परिजन अभी भी उससे जुड़े हुए हैं, जिससे उसका मोह बढ़ सकता है और वह इस लोक में ही भटक सकती है. लेकिन अगर कोई पीछे मुड़कर नहीं देखता है, तो आत्मा को यह समझने में आसानी होती है कि उसका इस संसार से संबंध समाप्त हो चुका है. अब उसे आगे की यात्रा पर बढ़ना चाहिए. यही कारण है कि 13 दिनों तक चलने वाले कर्मकांड भी आत्मा और इस संसार के बीच के संबंधों को धीरे-धीरे समाप्त करने के लिए किए जाते हैं.
इसके अलावा, मान्यता यह भी है कि श्मशान में पीछे मुड़कर देखने से आत्मा जीवित व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है. विशेषकर बच्चे इस प्रभाव में जल्दी आ जाते हैं, इसलिए उन्हें आगे चलने की सलाह दी जाती है. अंततः, पीछे मुड़कर न देखना एक प्रतीक है और एक संदेश भी है कि अब आत्मा को इस संसार के बंधनों से मुक्त होकर आगे बढ़ना चाहिए.
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