Amarnath Yatra 2026: भगवान नाराज हैं या हम जिम्मेदार! 57 दिन से 5 दिन में क्यों पिघल गए बाबा बर्फानी?

Amarnath Yatra 2026: अमरनाथ यात्रा में बाबा बर्फानी का शिवलिंग इस बार सिर्फ 5 दिन ही दिखाई दिया. हर साल घटते दर्शन के दिनों और पिघलते शिवलिंग ने श्रद्धालुओं की चिंता बढ़ा दी है. जानें इसके पीछे की वजह क्या है क्लाइमेट चेंज, भीड़ या कुछ और?

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अमरनाथ यात्रा (Photo: REUTERS) अमरनाथ यात्रा (Photo: REUTERS)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 12 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 9:02 AM IST

Amarnath Yatra 2026: पहले 57 दिन, फिर 38 दिन, उसके बाद 28 दिन, फिर 7 दिन  और इस बार सिर्फ 5 दिन. ये किसी परीक्षा का काउंटडाउन नहीं है, ये बाबा बर्फानी के दर्शन के दिनों की घटती गिनती है. हर साल ये अवधि कम होती जा रही है, और जिस तेजी से ये गिर रही है, उसने श्रद्धालुओं के मन में एक डर पैदा कर दिया है कि कहीं अगला आंकड़ा शून्य तो नहीं होगा?

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जब गुफा में शिवलिंग ही नहीं मिला

7 जुलाई 2026, हजारों श्रद्धालु बम भोले के जयकारे लगाते हुए गुफा में पहुंचे. लेकिन अंदर का नजारा देखकर सबके कदम ठहर गए. जहां बाबा बर्फानी विराजते थे, वहां सिर्फ गीला पत्थर था. ना चोरी, ना तोड़फोड़, बस शिवलिंग गायब था. करीब 3 लाख श्रद्धालु रास्ते में थे. किसी ने महीनों पहले रजिस्ट्रेशन कराया था तो किसी ने सालों की बचत जोड़ी थी. लेकिन, इस बार उनके हिस्से आई खाली गुफा.

कैसे बनते हैं बाबा बर्फानी?

अमरनाथ की गुफा में शिवलिंग कोई इंसान या मशीन नहीं बनाती है. सर्दियों में छत से पानी की बूंदें टपकती हैं. जो कि गुफा के अंदर तापमान इतना कम कर देती हैं जिससे की हर बूंद जम जाती है. फिर, धीरे-धीरे बर्फ की परतें बनती हैं और फिर बनता है प्राकृतिक शिवलिंग. खास बात यह है कि शिवलिंग चांद के अनुसार घटता-बढ़ता है यानी पूर्णिमा पर बड़ा और अमावस्या पर छोटा हो जाता है. यानी घटना-बढ़ना इसका प्राकृतिक स्वभाव है. लेकिन हर साल जल्दी पिघलना ये सामान्य बात नहीं है.

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2000 साल का इतिहास क्या कहता है?

राजतरंगिणी में जिक्र मिलता है कि प्राचीन राजा यहां पूजा करते थे. यहां तक कि आईने-ए-अकबरी में भी यात्रा का जिक्र मिलता है. साथ ही, स्वामी विवेकानंद भी यहां दर्शन कर चुके हैं. हजारों सालों में राज बदले, सल्तनत बदली, लेकिन बाबा बर्फानी हर बार प्रकट हुए. लेकिन मन में इस बात को लेकर सवाल उठ रहा है कि जो 2000 साल में नहीं हुआ, वो अब क्यों हो रहा है?

भीड़ और डेवलपमेंट का असर

पहले अमरनाथ यात्रा तपस्या मानी जाती थी. आज यह आसान होती जा रही है. गुफा के पास तक लंगर होता है. इन सबका नतीजा यह निकला कि लाखों लोगों के शरीर की गर्मी वहां पहुंचती है. गाड़ियों और जनरेटर का धुआं गुफा तक पहुंचता है. ऐसे में गंदगी बर्फ पर जमकर उसे जल्दी पिघलने पर मजबूर करती है.

आंकड़े क्या कहते हैं?

साल 2013 में यात्रा खत्म होने से पहले शिवलिंग पिघला था. फिर, 2016 में सिर्फ 10 दिन दर्शन हुए थे. उसके बाद 2018 में 29 दिन के लिए बाबा बर्फानी प्रकट हुए थे. फिर, 2022 में केवल 18 दिन के लिए बाबा आए थे. उसके बाद साल 2024 में केवल 7 दिन के लिए और इस साल 2026 में सिर्फ 5 दिन के लिए. डराने वाली बात यह है कि कद भी 22 फीट से घटकर करीब 12 फीट रह गया है.

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क्या भगवान नाराज हैं?

कुछ लोग कहते हैं कि भगवान नाराज हैं और कुछ कहते हैं कि यह सिर्फ क्लाइमेट चेंज है. लेकिन सनातन में दोनों अलग नहीं हैं यानी शिव ही प्रकृति है और प्रकृति ही शिव है. जब प्रकृति को नुकसान होता है, तो वो सिर्फ मौसम नहीं बल्कि आस्था भी प्रभावित होती है.

समाधान क्या है?

- सीमित संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए जाएं.
- प्लास्टिक पर पूरी तरह रोक लगाया जाए.
- गुफा के पास निर्माण पर नियंत्रण किया जाए. याद रखें कि, 'बर्फ बचाना ही असली शिव भक्ति है.'

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