घट‍िया ग्लूकोमीटर, झूठी रिपोर्ट और...! इस 20 करोड़ के घोटाले ने हेल्दी लोगों को बना दिया 'शुगर' पेशेंट

राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में 20 करोड़ के खराब ग्लूकोमीटर की सप्लाई से बड़ा घोटाला सामने आया है. इन उपकरणों ने करीब 15 हजार स्वस्थ लोगों को डायबिटीज का मरीज बता दिया. जांच में गलत रीडिंग की पुष्टि हुई है. बावजूद इसके अब तक कंपनी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, जबकि सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं.

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सरकारी अस्पतालों में ग्लूकोमीटर सप्लाई का बड़ा घोटाला सामने आया (Photo: Representational) सरकारी अस्पतालों में ग्लूकोमीटर सप्लाई का बड़ा घोटाला सामने आया (Photo: Representational)

शरत कुमार

  • जयपुर ,
  • 16 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 8:14 PM IST

राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसने मरीजों की सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड की तरफ से सप्लाई किए गए करीब 20 करोड़ रुपये के ग्लूकोमीटर में भारी गड़बड़ी सामने आई है. इन खराब गुणवत्ता वाले उपकरणों ने पिछले दो साल में करीब 15 हजार स्वस्थ लोगों को डायबिटीज का मरीज बना दिया.

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यह मामला तब सामने आया जब जयपुर, भरतपुर, सीकर, झालावाड़, डीग और चौमूं समेत प्रदेश के करीब 20 सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जांच के दौरान रिपोर्ट में लगातार गड़बड़ी दिखने लगी. चिकित्सा विभाग की टीम ने जब जांच की, तो पाया गया कि ग्लूकोमीटर गलत रीडिंग दे रहे हैं. इसके चलते कई ऐसे लोगों को भी डायबिटीज का मरीज बताया गया, जिन्हें वास्तव में यह बीमारी नहीं थी.

जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद सरकार ने शुरुआती स्तर पर ही जांच के आदेश दे दिए थे. जयपुर समेत पूरे प्रदेश में सीएमएचओ और पीएमओ स्तर पर जांच करवाई गई. जांच में यह स्पष्ट हुआ कि हजारों मरीजों की रिपोर्ट में ग्लूकोमीटर से गलत रीडिंग दर्ज की गई. सभी जिलों ने अपनी रिपोर्ट चिकित्सा विभाग को सौंप दी.

घटिया ग्लूकोमीटर से हजारों लोगों की गलत रिपोर्ट

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चौंकाने वाली बात यह है कि रिपोर्ट सामने आने के बावजूद ग्लूकोमीटर सप्लाई करने वाली कंपनी सेंसाकोर मेडिकल इंस्ट्रूमेंटेशन प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है. इससे पूरे मामले में लापरवाही और जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं. हेल्थ सेक्रेटरी गायत्री राठौड़ ने कहा है कि यदि गड़बड़ी पाई जाती है तो मामले की जांच करवाई जाएगी और जो भी जिम्मेदार होगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. हालांकि, अब तक इस मामले में कोई स्पष्ट कार्रवाई नहीं हुई है.

जांच के दौरान कई चौंकाने वाले उदाहरण सामने आए हैं. एक केस में जहां सामान्य ब्लड शुगर रेंज 80 से 110 एमजी प्रति डीएल होती है, वहां एक मरीज की रीडिंग 133 एमजी प्रति डीएल बताई गई, जबकि उसकी वास्तविक शुगर 75 एमजी प्रति डीएल थी. इस गलत रिपोर्ट के कारण उसे दो साल तक बेवजह डायबिटीज की दवाएं खानी पड़ीं. इसी तरह एक अन्य मरीज की सही रीडिंग 160 थी, लेकिन ग्लूकोमीटर ने उसे 266 दिखाया. वहीं मनदीप नाम के व्यक्ति की सही रीडिंग 112 थी, जबकि मशीन ने 167 एमजी प्रति डीएल बताया. यह केवल कुछ उदाहरण हैं. जांच में हजारों मरीजों की रिपोर्ट में इसी तरह की गड़बड़ी सामने आई है.

चिकित्सा विभाग की जांच टीम में चिकित्सा अधिकारी, प्रभारी अधिकारी, बायोमेडिकल इंजीनियर, लैब टेक्नीशियन और स्टोर इंचार्ज शामिल थे. टीमों ने अस्पतालों में मरीजों की ग्लूकोमीटर से दो-दो बार जांच की और फिर सही रिपोर्ट से तुलना की. इस प्रक्रिया में स्पष्ट हुआ कि मशीनें लगातार गलत रीडिंग दे रही थीं. भरतपुर के सीएमएचओ डॉक्टर विजय फौजदार ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कई मामलों में ग्लूकोमीटर की रीडिंग या तो शून्य आ रही थी या फिर तीन से चार गुना तक बढ़ी हुई दिख रही थी. सैंपल जांच में भी गड़बड़ी सामने आई. उदाहरण के तौर पर सैंपल नंबर 51767 में मशीन ने 158 की रीडिंग दी, जबकि सही रीडिंग 123 थी. इसी तरह कई अन्य सैंपल में भी त्रुटियां पाई गईं.

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सबसे गंभीर बात यह है कि इस पूरे मामले में चार महीने बीत जाने के बाद भी कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है. आरएमएससीएल के अधिकारियों पर आरोप है कि वे कार्रवाई से बचने की कोशिश कर रहे हैं और सरकार के निर्देशों की भी अनदेखी कर रहे हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बिना डायबिटीज के दवा लेना बेहद खतरनाक हो सकता है. अगर कोई व्यक्ति बिना जरूरत के डायबिटीज की दवा लेता है, तो कुछ महीनों के भीतर उसे पेट दर्द, डायरिया और मांसपेशियों में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसके अलावा विटामिन बी12 की कमी, त्वचा पर रैश और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं.

रिपोर्ट के बावजूद कंपनी पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं

विशेषज्ञ बताते हैं कि मेटफार्मिन जैसी दवाएं शुगर लेवल को काफी कम कर देती हैं. ऐसे में यदि किसी व्यक्ति का शुगर लेवल पहले से सामान्य है और वह यह दवा लेता है, तो उसे बेहोशी तक हो सकती है और गंभीर मामलों में वह कोमा में भी जा सकता है. यह पूरा मामला स्वास्थ्य व्यवस्था की बड़ी खामी को उजागर करता है. एक तरफ जहां सरकारी अस्पतालों में मरीज भरोसे के साथ इलाज कराने आते हैं, वहीं दूसरी तरफ ऐसे उपकरण उनकी सेहत के लिए खतरा बन रहे हैं. फिलहाल, सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं और आगे की कार्रवाई का आश्वासन दिया है. अब देखने वाली बात यह होगी कि इस गंभीर मामले में जिम्मेदार लोगों पर कब और क्या कार्रवाई होती है.

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