होली-जुमे की नमाज पर क्यों मचा है घमासान? अनुज चौधरी का इसमें कितना योगदान? 

रंग और गुलाल लगने पर किसी मुसलमान का रोजा नहीं खराब होता है. इस देश में क्रिश्चियन लोगों का त्योहार क्रिसमस जिस तरह धूम धाम से मनाया जा रहा है उस तरह से ईद भी मनाया जा सकता है. पर दिक्कत यह है कि हिंदू-मुसलमान अगर एक साथ ईद और होली मनाने लगे तो सियासतदानों का क्या होगा?

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सीओ अनुज चौधरी (फाइल फोटो) सीओ अनुज चौधरी (फाइल फोटो)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 11 मार्च 2025,
  • अपडेटेड 6:59 PM IST

करीब 64 सालों के बाद देश में होली और रमजान के जुमे की नमाज एक साथ पड़ रही है. अगर सियासत नहीं होती तो यह कितने सौभाग्य की बात होती. देश के करोड़ों हिंदू और मुसलमान भाई एक साथ अपने त्योहार मनाते. मगर देश के लिए यह सौभाग्य कहीं दुर्भाग्य बनकर सैकड़ों लोगों को आहुति न ले इसके लिए देश को सोचना पड़ रहा है. पिछले दिनों होली और जुमे की नमाज पर शांति की तैयारियों को लेकर यूपी के संभल जिले के सीओ अनुज चौधरी का एक बयान सुर्खियों में आया. जिसमें वो कह रहे हैं कि जिन लोगों को रंगों से दिक्कत है, वो लोग अपने घर पर ही नमाज पढ़ें तो अच्छा रहेगा. इस बयान के बाद यूपी और बिहार से लेकर महाराष्ट्र तक में होली और रमजान को लेकर जमकर हिंदू-मुसलमान हो रहा है. इस बीच देहरादून एसएसपी अजय सिंह ने भी अनुज चौधरी वाली बात दोहराई है. मुस्लिम संगठनों की उपस्थिति में उन्होंने सभी लोगों से अपील की है कि जिन्हें रंगों से दिक्कत है वो जुमे की नमाज घर पर ही पढ़ें तो बेहतर होगा. सवाल यह है कि क्या इस देश के लोग अभी तक इतने मैच्योर नहीं हो सके हैं कि साथ-साथ दो धर्मों के त्योहार को सेलिब्रेट किया जाए? या ये सब जानबूझकर बिहार विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है. आइये देखते हैं.

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अनुज चौधरी का बयान मुसलमानों के कितना खिलाफ

होली के साथ रमजान के जुमे की नमाज पढ़ना सियासतदानों के लिए एक ऐसा मौका है जो कभी कभी ही आता है. जितना भी इस मौके को वो भुना सकें वो भुनाएंगे. इस पिच पर खेलने वालों में केवल हिंदूवादी राजनीतिक पार्टियां ही नहीं हैं बल्कि खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले भी इस पिच पर चौका छक्का पीटना चाहते हैं. हिन्दू और मुसलमानों की शांति समिति की बैठक में सम्भल पुलिस के सर्किल ऑफिसर अनुज चौधरी ने केवल यही कहा था कि जुमे की नमाज़ साल में 52 बार पढ़ी जाती है और होली का त्योहार साल में एक बार मनाया जाता है. इसलिए जिन मुसलमानों को होली के रंगों से दिक्कत है, वो अपने घरों से उस दिन बाहर ना निकलें और अपने घरों पर रहकर ही जुमे की नमाज़ करें. कितनी सीधी बात थी. इस बात को तिल का ताड़ बना दिया गया. सीधी सी बात थी कि होली हर महीने और हर हफ्ते नहीं आती है. ऐसे मौके पर मुस्लिम समुदाय को खुद आगे आकर ये पहल करनी चाहिए थी. तमाम मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस संबंध में सौहार्द बढ़ाने वाला बयान दिया भी. कई क्लैरिक्स ने तो जुमे की नमाज का टाइम भी बदलने की पहल की. पर सियासत करने वाले तो दोनों ही तरफ बैठे हैं.

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समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस नेता उदित राज आदि ने जिस तरह अनुज चौधरी के खिलाफ बयान देना शुरू किया जाहिर है कि उसकी प्रतिक्रिया तो होनी ही थी. उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और महाराष्ट्र तक जिस तरह की जहरीली बयानबाजी हो रही है उससे सबसे ज्यादा नुकसान उन मुस्लिम धर्मगुरुओं का हुआ है जिन लोगों ने शांति का रास्ता दिखाया. विपक्ष  इसे भारत की धार्मिक स्वतंत्रता और मुसलमानों के खिलाफ इस तरह बता रहे हैं कि जो शांतिपूर्ण लोग हैं वो भी रेडिकल हो जा रहे हैं. जब हमारे देश के कुछ नेता इस बयान पर राजनीति करके इसे मुसलमानों के खिलाफ बताने में जुटे हैं, ठीक उसी समय कई मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कहा है कि वो अनुज चौधरी के बयान में कुछ भी गलत नहीं मानते और वो होली के दिन जुमे की नमाज़ का समय बदलने के लिए तैयार हैं.

लखनऊ में ईदगाह मस्जिद के इमाम और इस्लामिक सेंटर आफ इंडिया के सदर ने ऐलान है कि 14 मार्च को जुमे की नमाज़ दोपहर 12 बजकर 45 मिनट पर नहीं बल्कि दो बजे पढ़ी जाएगी. इसी संस्था ने देश की दूसरी मस्जिदों से भी ये अपील की है कि वो हिन्दुओं के साथ अपने भाईचारे को कायम रखते हुए जुमे की नमाज़ के समय को आगे बढ़ा सकते हैं और ऐसा करने से नमाज़ का महत्व कम नहीं होगा. ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने भी देश के सभी इमामों से जुमे की नमाज़ को देर से पढ़ाने की अपील की है. और मुसलमानों से ये भी कहा गया है कि वो होली के दिन दूर की मस्जिदों में नमाज़ पढ़ने के लिए ना जाएं और स्थानीय मस्जिदों में ही जुमे की नमाज़ को अता करें और इसे ही असली धर्मनिरपेक्षता और भाईचारा कहते हैं.

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क्या बिहार चुनाव है निशाने पर

संभव के सीओ अनुज चौधरी के बयान को उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर योगी आदित्यनाथ के एंडोर्समेंट के बाद होली और रमजान को लेकर जबरदस्त बयानबाजी शुरू हुई है. यूपी के एक विधायक ने यहां तक कह दिया कि होली के रंग से अगर दिक्कत है मुस्लिम समुदाय को तो उनके लिए अस्पतालों में अलग वॉर्ड भी बनवाना चाहिए. आखिर जिसका धर्म रंग नहीं बर्दाश्त कर पा रहा है वो हिंदुओं के साथ किस तरह अस्पतालों में इलाज करवाएंगे. इसी तरह के बयान उत्तर प्रदेश के एक मंत्री रघुराज सिंह का भी आया कि जिन लोगों को होली के रंगों से दिक्कत है वो लोग बुरके की तरह का एक तिरपाल बनवा कर ओढ़ लें. बिहार के एक विधायक ने कहा मुस्लिम लोग उस दिन घर से बाहर ही न निकलें. बीजेपी विधायक हरिभूषण ठाकुर बचौल का कहना है कि अगर बाहर निकलना जरूरी हो, तो उन्हें 'कलेजा बड़ा' रखना होगा, क्योंकि होली के दौरान कोई रंग लग सकता है जिसे उन्हें सहन करना चाहिए. उन्होंने आगे कहा, 'जुमा साल में 52 बार आता है, लेकिन होली सिर्फ एक बार. मुसलमान रंग-गुलाल को बुरा मानते हैं, तो उन्हें घर में ही रहना चाहिए. अगर बाहर निकलें, तो रंग सहन करें. जाहिर है कि इस तरह के बयान के बाद अगर थोड़ी भी बवाल होता है तो बीजेपी के पक्ष में माहौल बनेगा. 

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जाहिर है कि बिहार में इस साल अक्टूबर और नवंबर तक विधानसभा चुनाव होने हैं. इन चुनावों में राजनीतिक दलों कि भरपूर कोशिश होगी कि वो अपने कोर वोटर्स को इस तरह एक जुट करें ताकि एक वोट भी इधर उधर न हो जाए. जाहिर है कि बीजेपी हो या आरजेडी दोनों ही अपने अपने कोर वोटर्स के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. चाहे इसके लिए सामाजिक सौहार्द ही क्यों न खराब हो जाए.

क्या रोजेदार रंग नहीं खेल सकता 

होली रंग और गुलाल का त्योहार है. भाइचारे का त्योहार है. एक दूसरे से गले मिलकर गले शिकवे दूर करने का त्योहार है. ठीक इसी तरह रमजान भी भाईचारे का त्योहार है. पर दिक्कत यह है कि हम भाईचारा चाहते ही नहीं है. अगर ऐसा नहीं होता तो रंग और गुलाल लगने पर किसी मुसलमान का रोजा नहीं खराब होता. इस देश में क्रिश्चियन लोगों का त्योहार क्रिसमस जिस तरह धूम धाम से मनाया जा रहा है उस तरह से ईद भी मनाया जा सकता है. पर हिंदू-मुसलमान अगर एक साथ ईद और होली मनाने लगे तो सियासतदानों का क्या होगा?

दूसरे इस्लाम की कट्टर परंपराएं भी कुछ ऐसी हैं को दूसरे धर्म के साथ घुलना मिलना उन्हें मंजूर नहीं है. इस्लाम में गैर-इस्लामिक धार्मिक परंपराओं में भाग लेने को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं, लेकिन आमतौर पर मुस्लिम विद्वान यह सलाह देते हैं कि मुसलमानों को उन गतिविधियों में शामिल नहीं होना चाहिए जो किसी अन्य धर्म की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हों. यही कारण है कि कई सौ साल से हिंदू मुसलमान साथ रह रहे हैं पर एक दूसरे के धार्मिक रीति रिवाजों और त्योहारों को साथ मनाना नहीं सीख पाए हैं.

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