वेस्ट एशिया की इस पूरी कहानी में अगर कोई देश सबसे मुश्किल हालात में फंसा दिख रहा है, तो वह UAE है. एक तरफ उसका स्ट्रैटेजिक पार्टनर अमेरिका है, तो दूसरी तरफ हाल के सालों में बना इजराइल के साथ उसका गहरा रिश्ता, और तीसरी तरफ ईरान जो इस पूरे इलाके में अपनी ताकत और असर बनाए रखना चाहता है. यानी, तीनों के बीच UAE अब एक ऐसे तिराहे पर खड़ा है, जहां हर कदम जोखिम से भरा है.
28 फरवरी को जैसे ही अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर स्ट्राइक की, जवाबी कार्रवाई में ईरान ने पूरे रीजन में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाना शुरू किया. लेकिन इन हमलों का सबसे ज्यादा असर UAE पर पड़ा. वजह साफ थी कि UAE सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि अमेरिका की मिलिट्री और इकोनॉमिक मौजूदगी का बड़ा हब है.
अबू धाबी के पास अल धफरा एयरबेस और दुबई का जेबेल अली पोर्ट अमेरिकी ऑपरेशन्स के लिए बेहद अहम रहे हैं. खासतौर पर ISIS के खिलाफ कार्रवाई में. ऐसे में ईरान के लिए UAE पर दबाव बनाना, सीधे-सीधे अमेरिका और इजरायल को मैसेज देने जैसा था.
इजराइल से नजदीकी बनी बड़ी वजह
UAE की मुश्किलें सिर्फ अमेरिका की वजह से नहीं बढ़ीं, बल्कि इजराइल के साथ उसकी बढ़ती दोस्ती भी ईरानी हमलों की वजह बनी है. 2020 में अब्राहम अकॉर्ड साइन करके UAE ने इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य कर लिए थे. यह कदम पूरे खाड़ी इलाके की पुरानी पॉलिसी से अलग था.
आज हालत यह है कि UAE, वेस्ट एशिया में इजराइल का सबसे भरोसेमंद पार्टनर बन चुका है. हाल ही में इजराइल ने UAE को आयरन डोम जैसे एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम और अपने सैनिक भेजे. यह दिखाता है कि दोनों देशों के बीच सिक्योरिटी कोऑपरेशन कितना गहरा हो चुका है.
ईरान इसे सीधे-सीधे अपने खिलाफ सैन्य अलायंस के तौर पर देखता है. इसलिए UAE अब उसके निशाने पर है सिर्फ एक लोकेशन के तौर पर नहीं, बल्कि एक ‘मैसेज’ के तौर पर भी है.
‘कांच का घर’ और ईरान की चेतावनी
ईरान ने खुले शब्दों में UAE को चेतावनी दी है. उसके अधिकारियों ने कहा कि UAE ‘कांच के नाजुक घर’ में बैठा है. मतलब, उसकी पूरी इकोनॉमी ट्रेड, टूरिज्म और विदेशी निवेश पर टिकी है, जो किसी भी अस्थिरता से तुरंत प्रभावित हो सकती है.
यूएई सिर्फ एक मिलिट्री या पॉलिटिकल प्लेयर ही नहीं, बल्कि दुनिया के बड़े ऑयल प्रोड्यूसर्स में भी शामिल है. उसके पास ग्लोबल ऑयल रिजर्व का करीब 6% हिस्सा है. साथ ही दुबई और अबू धाबी जैसे शहर इंटरनेशनल ट्रेड, टूरिज्म और हाई-एंड रियल एस्टेट के बड़े केंद्र हैं.
करीब 1.1 करोड़ की आबादी वाले इस देश में लगभग 90% लोग विदेशी नागरिक हैं. ऐसे में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि ग्लोबल लेवल पर महसूस किया जा सकता है.
प्रोजेक्ट फ्रीडम: राहत या नया जोखिम?
अमेरिका ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ लॉन्च करके यह दिखाने की कोशिश की कि वह फंसे हुए जहाजों को निकालने और हालात सामान्य करने के लिए कदम उठा रहा है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में फंसे जहाजों को निकालना एक मानवीय मिशन बताया गया.
लेकिन ईरान इसे अलग नजर से देख रहा है. उसका आरोप है कि अमेरिका इस ऑपरेशन के जरिए स्ट्रेट में अपनी मिलिट्री मौजूदगी बढ़ा रहा है और हालात को और भड़का रहा है.
यही वजह है कि फुजैरा जैसे इलाकों में हमले की घटनाएं सामने आईं. चाहे उन्हें आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया गया हो या नहीं.
सीजफायर का सच: जुबानी अमन, जमीनी टेंशन
8 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच जो सीजफायर हुआ था, वह शुरू से ही कमजोर था. दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी और न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर मतभेद ने इसे टिकने नहीं दिया.
अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम रोक दे, जबकि ईरान इसे अपनी सुरक्षा और संप्रभुता का सवाल मानता है. दोनों के बीच बातचीत बार-बार अटक रही है.
ईरान ने 14 पॉइंट प्लान देकर जंग खत्म करने की बात जरूर कही, लेकिन उसमें भी उसने अपनी शर्तें रखीं. जैसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसका कंट्रोल और रीजन में इजराइल की कार्रवाई का अंत. अमेरिका के लिए यह शर्तें मानना आसान नहीं है.
अब क्या: होर्मुज शांत, लेकिन टकराव का नया मोर्चा ओपन
इस पूरी कहानी का सबसे अहम मोड़ अब सामने आ रहा है. जंग का सबसे बड़ा फ्लैशपॉइंट होर्मुज स्ट्रेट था. वह धीरे-धीरे शांत होता दिख रहा है. जहाजों की आवाजाही फिर शुरू हो रही है, और अमेरिका अपने ऑपरेशन के जरिए वहां स्टेबिलिटी लाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन असली तनाव अब शिफ्ट हो चुका है.
अब यह टकराव सीधे ईरान और UAE के बीच सिमटता जा रहा है. ईरान के लिए UAE सिर्फ एक लोकेशन नहीं, बल्कि अमेरिका और इजराइल का ‘फॉरवर्ड बेस’ बन चुका है. वहीं UAE के लिए यह स्थिति एक डबल ट्रैप है. वह अमेरिका और इजराइल से दूरी नहीं बना सकता, लेकिन ईरान से खुली दुश्मनी भी उसके लिए भारी पड़ सकती है.
यानी, होर्मुज में भले ही पानी शांत दिख रहा हो, लेकिन उसके किनारों पर खड़ी सियासत अब और ज्यादा खतरनाक हो गई है. और इस नई जंग में, सबसे ज्यादा दबाव उसी देश पर है जो खुद जंग का पार्ट नहीं था, लेकिन अब उसका सबसे बड़ा मैदान बन चुका है- UAE.
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