पहली बार बीजेपी का साथ छोड़ने का असर नीतीश कुमार को 2014 के लोक सभा चुनाव में समझ आया था. एनडीए में लौटने का मन नहीं था, इसलिए लालू यादव से हाथ मिलाकर महागठबंधन बना लिया और उसके नेता भी बन गये. लालू यादव ने जो उस वक्त बात कही थी, उसका मतलब ये था कि नीतीश कुमार को नेता घोषित करना उनके लिए जहर पीने जैसा था.
और पिछले साल डबल यूटर्न लेकर नीतीश कुमार फिर से लालू यादव के साथ हो गये. ये साथ कुछ कुछ 2019 के सपा-बसपा गठबंधन जैसा ही लगता है, हालांकि, कुछ शर्तें अलग हैं. तब मायावती को उम्मीद थी कि समाजवादी पार्टी उनको प्रधानमंत्री बनने में मदद करेगी, और बदले में अखिलेश यादव को फिर से यूपी का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिलेगा. गठबंधन टूटने के साथ दोनों के सपने भी बिखर गये. अभी तक तो यथास्थिति ही बनी हुई है.
बिहार में भी लालू यादव चाहते हैं कि नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव के लिए मुख्यमंत्री बनने का रास्ता बनायें. नीतीश कुमार रिटर्न गिफ्ट में प्रधानमंत्री की कुर्सी चाहते हैं. वो कुर्सी जिस पर बहुत दूर से ही कांग्रेस की दावेदारी है. बेटे को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश अपनी जगह है, लेकिन कांग्रेस के दबाव में लालू यादव नीतीश कुमार के पर कतरने में लगे हैं.
महागठबंधन के अंदर चल रही गला काट प्रतियोगिता के बावजूद नीतीश कुमार अभी लालू यादव के साथ बने हुए हैं. ये मजबूरी भी है, क्योंकि बीजेपी नेता अमित शाह ने साफ कर दिया है कि नीतीश कुमार के लिए बीजेपी के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं. कहने को तो नीतीश कुमार भी कहते हैं कि मर जाएंगे लेकिन कभी बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे - लेकिन बीच बीच में अपनी स्टाइल में वो छोटे मोटे 'खेला' भी करते रहते हैं.
बिहार में जातिगत गणना से वहां के लोगों को फायदा हो न हो, लेकिन नेताओं को तो लाभ मिलने ही लगा है. बिहार के लिए स्पेशल स्टेटस की मांग को लेकर अब जो कैबिनेट से प्रस्ताव पास हुआ है, वो भी जातिगत गणना के आगे का कदम लग रहा है - क्योंकि केंद्र सरकार से बिहार के लिए विशेष दर्जे की मांग को लेकर नीतीश कुमार ने जो दलील दी है, उसमें जातिगत गणना की अहम भूमिका नजर आती है.
बिहार की पुरानी डिमांड का नया प्रस्ताव
बिहार कैबिनेट ने राज्य के लिए स्पेशल स्टेटस के साथ एक और महत्वपूर्ण मांग की है. बिहार सरकार ने हाल ही में विधानसभा में पारित आरक्षण संशोधन विधेयक को संविधान की नौवीं अनुसूची में डालने की भी गुजारिश की है, ताकि वो न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हो जाये.
रही बात बिहार के लिए स्पेशल स्टेटस की डिमांड की, तो पहले तो ये समझना जरूरी है कि किसी राज्य को विशेष दर्जा मिलने का क्या मतलब और फायदा होता है?
स्पेशल स्टेटस का मतलब फायदा ही फायदा: मोटे तौर पर देखें तो केंद्र की तरफ मिलने वाले अनुदानों में तीन गुणा इजाफा हो जाता है. जिन राज्यों को स्पेशल स्टेटस मिला होता है, उनको केंद्र सरकार की तरफ से 90 फीसदी अनुदान और 10 फीसदी रकम बिना ब्याज के कर्ज के रूप में मिलती है. जबकि अन्य राज्यों को केंद्र की तरफ से 30 फीसदी रकम अनुदान के तौर पर और 70 फीसदी रकम कर्ज के रूप में मिलती है. जाहिर है, कर्ज के रूप में मिली रकम तो एक न एक दिन वापस करनी ही होगी. सोचिये कहां 10 फीसदी और कहां 70 फीसदी का कर्ज.
अब सवाल ये उठता है कि बिहार को स्पेशल दर्जा मिल पाना कितना मुश्किल है? आपको याद होगा 2019 के लोक सभा चुनाव से पहले टीडीपी नेता एन. चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के लिए स्पेशल स्टेटस की मांग पूरी न किये जाने के विरोध में ही एनडीए छोड़ दिये थे. हालांकि, अब वो फिर से बीजेपी के करीब देखे जा रहे हैं.
असल में, संविधान में विशेष राज्य का दर्जा देने का कोई प्रावधान नहीं है. 1969 में पहली बार पांचवें वित्त आयोग के सुझाव पर तीन राज्यों को स्पेशल स्टेटस दिया गया था, लेकिन 14 वित्त आयोग के आने तक ये तय कर दिया गया कि नॉर्थ-ईस्ट और पहाड़ी राज्यों के अलावा किसी भी अन्य राज्य को स्पेशल स्टेटस नहीं मिल सकता.
कुछ ही दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया था कि नॉर्थ-ईस्ट और देश के अन्य क्षेत्रों पर लागू किसी भी कानूनी प्रावधान में संशोधन करने का सरकार का कोई इरादा नहीं है. तुषार मेहता ने ये बात संविधान के अनुच्छेद 371 के प्रसंग में कही है जिसका सीधा मतलब तो ये हुआ कि जम्मू-कश्मीर की तरह किसी और राज्य के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं होने जा रही है. साथ ही, एक मतलब ये भी हुआ कि मणिपुर, असम, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और मिजोरम सहित 12 राज्यों के अलावा फिलहाल किसी और राज्य को विशेष दर्जा मिलने का स्कोप नहीं बचा है. बिहार और आंध्र प्रदेश के अलावा ओडिशा, राजस्थान और गोवा की सरकारें भी केंद्र से अपने लिए विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग कर रही हैं.
नीतीश कुमार की नये सिरे से क्या मांग है: बिहार कैबिनेट की बैठक के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया साइट X पर अपने मन की बात में कहा है कि बिहार के लिए विशेष दर्जे की मांग 2010 से ही हो रही है. नीतीश कुमार ने मांग से जुड़े प्रयासों का सिलसिलेवार ब्योरा भी दिया है.
नीतीश कुमार ने जातिगत गणना के साथ बिहार में आरक्षण की सीमा बढ़ाये जाने का भी खास तौर पर जिक्र किया है. ये भी बताया है कि कैसे अब वो बिहार के लोगों की मदद और राज्य की तरक्की की योजना पर काम कर रहे हैं.
जिन कामों का जिक्र किया है, 'उनको लेकर नीतीश कुमार का कहना है, काफी बड़ी राशि की आवश्यकता होने के कारण इन्हें पांच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है... यदि केंद्र सरकार द्वारा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल जाये तो हम इस काम को बहुत कम समय में ही पूरा कर लेंगे.'
मतलब साफ है, अगर केंद्र सरकार ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया तो 2024 के लोक सभा और 2025 के विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार और लालू यादव घूम घूम कर लोगों को बताएंगे कि कैसे सूबे की तरक्की में बीजेपी बाधाएं खड़ी कर रही है. करीब करीब वैसे ही जैसे बीजेपी चुनावों में लोगों को समझाया करती है कि कैसे कांग्रेस ने राम मंदिर निर्माण के रास्ते में हमेशा ही अड़ंगा लगाने की कोशिश की.
क्या है बीजेपी को घेरने की लालू-नीतीश की तैयारी
बिहार को देश में जातीय राजनीति की उन्नत प्रयोगशाला बनाने की कोशिश रफ्तार पकड़ने लगी है. लालू यादव के साथ मिल कर नीतीश कुमार इसे हर संभव हवा देने का प्रयास कर रहे हैं - और मौके नजाकत देख कर राहुल गांधी मशाल लेकर पहले ही निकल पड़े हैं. विधानसभा चुनावों में कांग्रेस नेता की तरफ से जातिगत जनगणना कराने का वादा बार बार दोहराया जाना इस बात की मिसाल है.
नीतीश कुमार और लालू यादव 2014 में मोदी लहर का अंजाम देख चुके हैं. 2019 में भी नीतीश कुमार को मिला मोदी लहर का फायदा और लालू यादव को हुआ नुकसान भी लोग देख ही चुके हैं - 2024 को लेकर बीजेपी की तैयारी भी विपक्ष के लिए डराने वाली ही है. विधानसभा चुनाव में बीजेपी लोक सभा चुनाव का ट्रेलर भी रिलीज कर चुकी है.
बीजेपी के मंदिर मुद्दे की काट विपक्ष के पास जातीय राजनीति ही है. जैसे पहले 90 के दशक में विश्वनाथ प्रताप सिंह को आगे कर मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गयी थीं - मंडल बनाम कमंडल को चुनावी मुद्दा बनाया गया.
2024 के चुनाव में भी लालू यादव और नीतीश कुमार की कोशिश चुनावी मुद्दे के तौर पर मंडल बनाम कमंडल की लड़ाई ही लोगों को समझाने की कोशिश है. जातिगत जनगणना की मांग के जरिये लोगों को बीजेपी के खिलाफ लामबंद करने की कोशिश है.
ये तो सबको पता है कि जातीय राजनीति बीजेपी की कमजोर कड़ी साबित होती है. हिंदुत्व के एजेंडे के साथ चलने वाली बीजेपी के लिए उसका मातृ संगठन आरएसएस कभी नहीं चाहता कि हिंदू समुदाय अलग अलग वोट दे. वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश भी हिंदू वोट का बिखराव रोकने की कोशिश होती है.
सर्वे रिपोर्ट बताती हैं कि 2009 से ही बीजेपी का ओबीसी वोट शेयर लगातार बढ़ रहा है. हैरानी की बात ये है कि कांग्रेस ही नहीं, आरजेडी और समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों का ओबीसी वोट शेयर भी लगातार घट रहा है.
ऐसे में बीजेपी को जातीय राजनीति के जरिये चैलेंज करने का ही उपाय बचता है, जिसमें राहुल गांधी घूम घूम कर अलख जगाने की कोशिश कर रहे हैं - और लालू-नीतीश बिहार में बीजेपी को घेरने की एक खास रणनीति के तहत धीरे धीरे एक एक कदम बढ़ाते जा रहे हैं.
नीतीश कुमार एक एक करके वैसी ही चीजों के साथ कदम बढ़ा रहे हैं, जिसे केंद्र की बीजेपी सरकार पहले ही मना कर चुकी है - जातिगत जनगणना और बिहार को स्पेशल स्टेटस देने की मांग, दोनों ही मामले ऐसे ही हैं.
मृगांक शेखर