निशांत की चुनौतियां, क्या जेडीयू कार्यकर्ताओं के उम्मीदों पर खरे उतरेंगे

निशांत कुमार को राजनीति में लाने का श्रेय निश्चित रूप से उनके पिता बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अधिक पार्टी वर्कर्स का है. निशांत को एक्टिव पॉलिटिक्स में लाने की डिमांड वे पिछले पांच साल से कर रहे हैं. पर वंशवाद के घोर विरोध के चलते नीतीश कुमार निशांत के लिए राजनीति में जगह नहीं बना सके. अब निशांत के लिए इतनी चुनौतियां हैं कि उनसे पार पाना आसान नहीं है.

Advertisement
निशांत के पार्टी में शामिल होने पर खुश हुए ललन सिंह (Photo: x/jdu) निशांत के पार्टी में शामिल होने पर खुश हुए ललन सिंह (Photo: x/jdu)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 09 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:02 PM IST

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार उस शख्सियत का नाम है जो पिछले 2 दशकों से अपनी शर्तों पर राजनीति कर रहे थे. भारतीय राजनीति में वो एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने विधानसभा में सीट कम होने के बावजूद एक बार नहीं बल्कि 4 बार सीएम पद की शपथ ली. जाहिर है नीतीश कुमार करिश्माई व्यक्तित्व वाले नेता रहे हैं. अपनी उम्र के ढलान पर जब उन्हें बीमार कहा जाने लगा, उनके बारे में कहा गया कि उन्हें भूलने की बीमारी है - फिर भी उन्होंने कमाल कर दिया. 2025 के विधानसभा चुनावों में आम लोगों ने उन्हें भर-भर कर वोट दिए. यह भी कहा गया कि बीजेपी को मिली भारी सफलता में भी नीतीश कुमार की लोकप्रियता काम आई . जाहिर है कि अपनी राजनीतिक लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष पर उन्होंने जो फैसला लिया है उससे उनकी पार्टी के लोग भी हतप्रभ हैं. पार्टी के आम कार्यकर्ताओं को लगता है कि नीतीश के न रहने पर पार्टी को बिखरने से बचाने का काम उनके बेटे निशांत ही कर सकते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि वन मैन शो वाली क्षेत्रीय पार्टियों को वंशवाद से निकल कर आए नेता ही बांधे रखने में सफल होते हैं. पर जेडीयू और निशांत कुमार की बात दूसरी पार्टी और नेताओं से अलग है. शायद यही कारण है कि सवाल उठ रहे हैं कि क्या निशांत अपने दम पर पार्टी को बिखरने से बचा लेंगे?

8 मार्च 2026 को पटना में पार्टी मुख्यालय में निशांत का स्वागत किया गया, जहां वरिष्ठ नेता राजीव रंजन सिंह और संजय झा मौजूद थे, लेकिन नीतीश कुमार स्वयं अनुपस्थित रहे. कार्यकर्ताओं ने नारे लगाए, निशांत हैं तो निश्चिंत हैं, जो संकेत देता है कि पार्टी में एक नई पीढ़ी का उदय हो रहा है. लेकिन सवाल यह है कि क्या निशांत कुमार जेडीयू को टूटने और बिखरने से बचा पाएंगे? क्या कुर्मी और अति पिछड़ों को दूसरी पार्टियों या नेताओं के पीछे लामबंद होने से रोक सकेंगे? क्या बीजेपी के बढ़ते प्रभुत्व से पार्टी की सरकार में कमतर होती स्थिति को संभाल पाएंगे? सवाल बहुत हैं जिनके जवाब आम लोग निशांत कुमार में खोजने की कोशिश करेंगे. नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा की ढलान पर निशांत को पार्टी में लाने का यह कदम कितना सफल होगा? इसमें तमाम तरह के किंतु-परंतु जुड़े हैं.

नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा 1970 के दशक से शुरू हुई, जब वे जेपी आंदोलन में सक्रिय हुए. 1994 में उन्होंने समता पार्टी की स्थापना की, जो बाद में जेडीयू बनी. 2005 में उन्होंने लालू प्रसाद यादव के जंगलराज को समाप्त कर बिहार को विकास की पटरी पर लाया. सड़कें, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधारों से उन्हें 'सुशासन बाबू' का खिताब मिला. लेकिन उनकी यात्रा गठबंधनों के उतार-चढ़ाव से भरी रही. उन्होंने भाजपा के साथ कई बार गठबंधन तोड़ा और जोड़ा. 2013 में मोदी के विरोध में अलग हुए, 2017 में वापस आए, 2022 में इंडिया गठबंधन में गए, और 2024 में फिर एनडीए में लौटे. 2025 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू और भाजपा ने बराबर सीटों पर चुनाव लड़ा और करीब-करीब दोनों ही बराबर के मुकाबले में रहे. केवल 4 सीट ही जेडीयू की बीजेपी से कम रही. बीजेपी की मजबूरी थी कि उसे नीतीश कुमार को सीएम बनाना ही थी. पर उम्र और स्वास्थ्य कारणों से नीतीश को राज्यसभा जाना राज्य और पार्टी के हितों को देखते हुए अपरिहार्य लगा.  

क्या निशांत जेडीयू को टूटने से बचा पाएंगे?

40 वर्षीय निशांत इंजीनियर हैं और अब तक राजनीति से दूर रहे. उन्होंने कहा कि वे पार्टी संगठन को मजबूत करेंगे.पार्टी में कुछ नेता उन्हें डिप्टी सीएम बनाने की मांग कर रहे हैं. 7 मार्च को उन्होंने वरिष्ठ नेताओं से बैठक की, जहां भविष्य की रणनीति पर चर्चा हुई.

जेडीयू की वर्तमान स्थिति नाजुक है. पार्टी का आधार कुर्मी, कोइरी और अति पिछड़ा वर्ग है, लेकिन हाल के चुनावों में यह सिकुड़ता जा रहा है. 2010 में जेडीयू ने 115 सीटें जीतीं, लेकिन 2020 में मात्र 45 पर सिमट कर रह गए. हालांकि 2025 में आकर एक बार फिर जेडीयू ने 85 सीटें जीतने में सफलता हासिल की. फिर भी नीतीश के बिना पार्टी का अस्तित्व खतरे में है, क्योंकि उनका करिश्मा ही गठबंधन में वजन देता था. तेजस्वी यादव और चिराग पासवान के विपरीत निशांत कुमार तब राजनीति में आ रहे हैं जब उनके पिता राजनीतिक ढलान पर हैं. दूसरे आज की तारीख में भी वे वंशवाद के खिलाफ बोलते रहे हैं. शायद यही कारण रहा कि आज निशांत जब पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर रहे थे वो अनुपस्थित थे. जाहिर है कि इसका असर निशांत की राजनीति पर पड़ेगा. आम लोगों में यह संदेश आज भी है कि नीतीश कतई नहीं चाहते हैं कि उनका बेटा राजनीति में आए. आम लोगों में यही संदेश जा रहा है कि जेडीयू के दूसरी लाइन के नेता निशांत को सामने रखकर पार्टी को अपने हिसाब से चलाएंगे.

बीजेपी से निपटना मुश्किल होगा

इसके साथ ही भाजपा अब बिहार में अपना मुख्यमंत्री ला सकती है, जिससे जेडीयू जूनियर पार्टनर बन कर रह जाएगी. एक मजबूत नेता के अभाव में जेडीयू के नेता अपने अस्तित्व के लिए बीजेपी नेताओं पर निर्भर रहेंगे. निशांत को इन चुनौतियों से निपटना होगा. निशांत के पक्ष में कुछ बातें हैं. वे युवा हैं, शिक्षित हैं, और नीतीश की विरासत को आगे ले जा सकते हैं. और उनके साथ पार्टी कार्यकर्ता हैं जो उन्हें लेकर उत्साहित हैं. लेकिन अनुभव की कमी के चलते जेडीयू के घाघ नेता उन्हें अपने इशारे पर नचाने की कोशिश करेंगे. निशांत कभी अपने पिता के साथ साया बनकर नहीं रहे , जाहिर है कि अपने पिता के दांव पेच को भी कभी नजदीक से नहीं देख सके हैं. कोढ़ में खाज यह है कि गठबंधन की राजनीति बहुत क्रूर होती है. हर पार्टी अपने सहयोगी को निगलने की फिराक में रहती है. भाजपा से ये उम्मीद करना कि जेडीयू को वो फलने -फूलने में मदद करेगी - एक बहुत बड़ा भ्रम ही है. बीजेपी के साथ संबंध बनाए रखते हुए पार्टी को मजबूत करना बहुत कठिन कार्य होगा. बीजेपी चाहेगी कि भविष्य में जेडीयू का भाजपा के साथ विलय हो जाए. इसके साथ ही यदि भाजपा का मुख्यमंत्री बनते ही जेडीयू का प्रभाव अचानक बहुत तेजी से कम होगा.

अटकलें हैं कि निशांत को डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है, या पार्टी अध्यक्ष/संगठन महासचिव जैसी बड़ी भूमिका मिल सकती है. भाजपा के साथ गठबंधन में सीएम पद भाजपा को जाने के बाद, जेडीयू को मजबूत उप-नेतृत्व चाहिए. निशांत की नियुक्ति से पार्टी में स्थिरता आएगी. इसके साथ ही वे नीतीश के मार्गदर्शन में काम करेंगे, और विधायकों को लगेगा कि परिवार की विरासत सुरक्षित है.  नीतीश ने स्पष्ट किया है कि मैं हूं ना. मतलब साफ है कि वे मार्गदर्शन करते रहेंगे, और दिल्ली से भी पार्टी पर नजर रखेंगे. जाहिर है कि नीतीश कुमार अगर स्वस्थ रहते हैं तो दिल्ली में बैठकर भी निशांत को मजबूत बना लेंगे. कार्यकर्ताओं को निशांत में नीतीश की झलक दिखती है. उन्हें विश्वास है कि निशांत नीतीश की योजनाओं (सुशासन, महिला सशक्तिकरण) को आगे बढ़ाएंगे, जिससे पार्टी बिखरेगी नहीं.

 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement