'एडवोकेट' ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को घेरा, और खुद कठघरे में पहुंच गईं!

पश्चिम बंगाल के लोगों से ममता बनर्जी ने वादा किया था कि जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट भी जाऊंगी. और, चुनाव से पहले का वादा पूरा भी कर दिया है. ममता बनर्जी ने कोई नई दलील नहीं पेश की है. जो आरोप वो लगाती रही हैं, फर्क ये है कि वही सब सुप्रीम कोर्ट में कहा है. वहां हुआ ये कि उनके सामने ही चुनाव आयोग के वकील ने बंगाल सरकार के असहयोग का पुलिंदा पेश कर दिया.

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ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के लोगों से कहा था जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट भी जाऊंगी, और कोर्ट में पेश होकर अपनी बात भी रखी. (Photo: PTI) ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के लोगों से कहा था जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट भी जाऊंगी, और कोर्ट में पेश होकर अपनी बात भी रखी. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 05 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:33 PM IST

ममता बनर्जी का सुप्रीम कोर्ट जाना पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस के कैंपेन का ही हिस्सा है. कैंपेन के तहत ही अदालत जाने से एक दिन पहले ममता बनर्जी पूरे लाव-लश्कर के साथ चुनाव आयोग गई थीं. और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए विपक्षी दलों से ममता बनर्जी का संपर्क अभियान भी उसी क्रम में है. सुप्रीम कोर्ट  में उनकी दलीलें SIR की खामियों से आगे बढ़कर राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप की तरह होती जा रही थीं. वे कह गईं कि उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है. और इसी बात पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने उन्हें टोका, कि अब तक SIR के मामले में उन्होंने कई आदेश दिए हैं. और ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका समाधान न हो.

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सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी मौजूदा मुख्यमंत्री ने अदालत में पेश होकर अपनी दलीलें रखी. सरकार या संगठन की तरफ से ऐसे मुकदमों में आमतौर पर मुख्यमंत्री के वकील या सलाहकार ही पेश हुआ करते हैं, और वकील थे भी. लेकिन, ममता बनर्जी की मौजूदगी का असर अलग ही महसूस किया गया. 

सुनवाई चलती रही. करीब 20 मिनट तक ममता बनर्जी कार्यवाही देखती रहीं. लेकिन, उनकी बेचैनी साफ देखी जा सकती थी. उन्होंने कई बार बीच में बोलना चाहा. अदालत ने पहले SIR पर पश्चिम बंगाल के वकील श्याम दीवान की बात सुनी. ममता बनर्जी अपनी बारी का इंतजार करती रहीं. ये बात तब और भी साफ हो गई जब ममता बनर्जी को टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी से कहते सुना गया, ‘बोलबो तो आज (मैं आज बोलूंगी).’

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सुप्रीम कोर्ट के जजों और ममता के बीच जो बातें हुईं

पश्चिम बंगाल में चल रहे SIR केस की सुनवाई देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच में हो रही थी. जब ममता बनर्जी ने बीच में ही अपनी बात रखने की कोशिश की, तो CJI सूर्यकांत ने टोकते हुए कहा कि उनकी ओर से सीनियर वकील कपिल सिब्बल और श्याम दीवान पहले ही सभी दलीलें रख चुके हैं. बाद में ममता बनर्जी को बोलने का मौका भी मिला, और वह बोलीं भी जो सोचकर आई थीं. 

सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने बेंच से कहा, 'मुझे पांच मिनट दीजिए. ममता बनर्जी की बात पर सीजेआई ने बोले, हमें कोई दिक्कत नहीं है, हम 15 मिनट देंगे, लेकिन पहले हमारी बात सुनिए. 

फिर सीजेआई ने ममता बनर्जी को समझाया, हर समस्या का समाधान होता है. इस समस्या का भी हल निकालेंगे... आपकी राज्य सरकार भी यहां मौजूद है... आपकी पार्टी भी यहां है. आपके पास देश के सबसे वरिष्ठ वकील मौजूद हैं. हमने आपकी ओर से उठाई गई समस्याओं को स्वीकार किया है - वे रिकॉर्ड पर हैं. 

ममता बनर्जी की गुजारिश थी, पहले मुझे बोलने और अपनी बात खत्म करने की इजाजत दीजिए... मैं कुछ तस्वीरें देना चाहती हूं. सारे बंगाली अखबारों ने छापा है. 

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अदालत ने इस बात से सहमति जताई कि ममता बनर्जी द्वारा उठाया गया मुद्दा वास्तविक है. कहा, हम यह भी नहीं चाहते कि भाषा संबंधी दिक्कतों या नामों की वर्तनी में अंतर के कारण किसी को मतदाता सूची से बाहर किया जाए.

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, अगर ‘रॉय’, ‘दत्ता’, ‘गांगुली’ को हटाया जा रहा है… तो हमें यह नहीं पता कि ‘टैगोर’ का उच्चारण कैसे किया जाता है… लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ‘टैगोर’, टैगोर नहीं है.

ममता बनर्जी की दलील थी, मैं आपको उदाहरण दे रही हूं... मैं तस्वीरें दिखा सकती हूं... ये मेरी तस्वीरें नहीं हैं, ये प्रमुख अखबारों में प्रकाशित हैं... SIR प्रक्रिया केवल नाम हटाने के लिए है... मान लीजिए बेटी शादी के बाद ससुराल चली जाती है, तो सवाल किए जाते हैं कि वह पति का सरनेम क्यों इस्तेमाल कर रही है? वे यही कर रहे हैं... कुछ बेटियां जो ससुराल चली गईं, उनका नाम हटा दिया गया... कभी-कभी गरीब लोग फ्लैट खरीदते हैं... कभी वे जगह बदल लेते हैं, लेकिन सबको हटा दिया गया... वे आपके आदेश का उल्लंघन कर रहे हैं, और कहते हैं कि ये गलत मैपिंग है.

चुनाव आयोग ने ममता के आरोपों को बंगाल सरकार की ओर मोड़ दिया

सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि बीजेपी शासित राज्यों से माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए हैं. ममता बनर्जी ने कहा, पहले फेज में 58 लाख नाम डिलीट कर दिए गए. बहुतों को मृत बताया गया है... ये चुनाव आयोग, माफ कीजिएगा... व्हाट्सऐप कमीशन... ही ये सब कर रहा है. 

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ममता बनर्जी के आरोपों का जवाब देते हुए चुनाव आयोग के वकील ने कहा, राज्य सरकार से बार-बार डिमांड के बाद भी SIR के काम के लिए पर्याप्त ग्रुप बी अधिकारी नहीं दिए गए... और इसी के चलते माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े. 

चुनाव आयोग ने अदालत को बताया, हमने राज्य सरकार को कई पत्र लिखे हैं कि हमें क्लास 2 अधिकारी दें, ताकि ERO को नियुक्त किया जा सके... उस रैंक के करीब 80 अफसर दिए हैं, बाकी निचले रैंक के हैं... इसलिए हमें माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े... गलती उनकी है... माइक्रो ऑब्जर्वर सही तरीके से नियुक्त किए गए हैं... राज्य सहयोग नहीं कर रहा है, तो कोई दूसरा विकल्प नहीं है... समय कोई समस्या नहीं है.

आखिर में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

चुनाव आयोग का कहना था, सभी नोटिस में कारण होते हैं... जिनके नाम हटे उन्हें अधिकृत एजेंटों को भी लाने की अनुमति दी गई थी.

वस्तुस्थिति को समझते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा, सभी नोटिस वापस लेना अव्यावहारिक है... नाम की स्पेलिंग में गड़बड़ी होने पर चुनाव आयोग नोटिस जारी न करे... चुनाव आयोग अपने अधिकारियों को भी निर्देश दे कि वे संवेदनशील रहें... अगर राज्य सरकार ऐसे लोगों की टीम देती है, जो बांग्ला और स्थानीय बोली जानते हों, और वे जांच करके चुनाव आयोग को बताएं कि गलती स्थानीय बोली के कारण हुई है, तो इसमें मदद मिलेगी.

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कोर्ट ने जोर देकर कहा, अगर स्थानीय बोली के अनुवाद में AI की मदद लेने के कारण अगर ऐसा हो रहा है तो हम समाधान निकालेंगे... इसकी वजह से असली मतदाता को बाहर नहीं किया जाना चाहिए.

ममता सुप्रीम कोर्ट शायद इस उम्मीद से तो नहीं आई थीं कि वे SIR के खिलाफ केस जीत लेंगी. और चुनाव आयोग को मुंह की खानी पड़ेगी. वे दिल्ली आकर दो मोर्चे पर लड़ रही थीं. एक तो देशभर को यह संदेश कि SIR के खिलाफ वे ही लोहा ले रही हैं. सीधे जमीन पर आकर. दूसरे, बंगाल में चुनाव से पहले माहौल तैयार कर रही हैं कि एक महिला मुख्यमंत्री को चुनाव आयोग की मदद से भाजपा कमजोर करना चाहती है. कुलमिलाकर, मामला सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा जनता की अदालत का ही है. फैसला अप्रैल में होने वाले चुनाव में होगा.

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