ममता बनर्जी के लिए बंगाल गंवा देने से बुरी है भवानीपुर की हार

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल चुनाव के काफी पहले से ही तैयारी कर रही थीं. अपनी रणनीति के तहत हर मुद्दे को जोर शोर से उठाती थीं. SIR का मुद्दा हो, या माछ-भात खाने का. ममता बनर्जी ने बीजेपी को हर तरह से घेरने की कोशिश की, लेकिन बंगाल ही नहीं भवानीपुर के ही चक्रव्यूह में फंस गईं.

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तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी और बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी. (Photo: PTI) तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी और बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 05 मई 2026,
  • अपडेटेड 5:32 PM IST

ममता बनर्जी अक्सर कहती रही हैं कि वो स्ट्रीट फाइटर हैं. पश्चिम बंगाल चुनाव या भवानीपुर की हार से उनकी फाइटर छवि पर कोई असर नहीं पड़ा है, शायद पड़ेगा भी नहीं. लेकिन, ये डबल हार ममता बनर्जी के लिए बहुत बड़ा सबक जरूर है. 

पश्चिम बंगाल चुनाव के काफी पहले से ही ममता बनर्जी ने अपना कैंपेन शुरू कर दिया था. और, बारी बारी हर वो मुद्दा जोरदार ढंग से उठाती रहीं, जो उनको बीजेपी के खिलाफ कारगर समझ में आ रहा था. ममता बनर्जी ने लंबे समय तक भाषा आंदोलन चलाया. बाद में SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण पर फोकस हो गईं. सड़क पर मार्च से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पैरवी करने भी पहुंच गईं. माछ-भात पर तो ममता बनर्जी ने बीजेपी को बचाव की मुद्रा में भी ला दिया था.

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सवाल है कि सारी तैयारी और लगातार लड़ाई के बाद भी, कहां चूक हो गई? क्या कमी रह गई? गलतियां कहां हुईं? ऐसी कौन सी बात थी जो मामूली लगी, और सबसे भारी पड़ गई?

भवानीपुर में भी ममता का चुनाव हार जाना

ममता बनर्जी का पश्चिम बंगाल चुनाव हार जाना, और भवानीपुर विधानसभा की अपनी सीट भी गंवा देना अलग-अलग बातें हैं. लेकिन, दोनों का एक साथ आफत की तरह तृणमूल कांग्रेस पर टूट पड़ना ममता बनर्जी पर बहुत भारी पड़ा है. 

बीजेपी के डबल इंजन सरकार कैंपेन में ममता बनर्जी को डबल शिकस्त झेलनी पड़ी है. अब इससे बुरा क्या होगा कि पांच साल पहले नंदीग्राम में ममता बनर्जी को 1956 वोटों से हराने वाले बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने ही भवानीपुर में ममता बनर्जी को 15, 105 वोटों से शिकस्त दे डाली है. 

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2021 में नंदीग्राम की हार के बाद, भवानीपुर के ही लोगों ने ममता बनर्जी को उपचुनाव में 58,835 वोटों के फासले से जीत पक्की कर विधानसभा भेजा था, लेकिन इस बार भवानीपुर के लोगों ने पहले से ही ममता बनर्जी को सबक सिखाने का फैसला कर लिया था. 

तभी तो लोकसभा चुनाव के दौरान भवानीपुर के 8 में से 5 वार्डों में बीजेपी को बढ़त मिलने के बाद शुभेंदु अधिकारी को फिर से ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ाने का फैसला हुआ. नंदीग्राम में लड़ने के लिए तो बीजेपी की तरफ से ममता बनर्जी को ललकार कर मजबूर किया गया था, लेकिन भवानीपुर के लिए तो शुभेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी से पहले ही उम्मीदवार घोषित कर दिया गया था. 

बीजेपी को तो बस बंगाल के लोगों को मैसेज देना था, ममता बनर्जी की हार के साथ. 2021 में ममता बनर्जी भले अपनी सीट हार गई थीं, लेकिन पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की जीत पक्की कर दी थी. इस बार ममता बनर्जी बंगाल और भवानीपुर दोनों हार गई हैं. और शुभेंदु अधिकारी को देखिए. भवानीपुर में ममता बनर्जी को तो हराया ही, नंदीग्राम से भी जीत गए हैं. 

जीत के बाद, हार के बाद

भवानीपुर की जीत के बाद शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि ममता बनर्जी को हराना बेहद जरूरी था. बोले, उनका राजनीतिक संन्यास अभी हो गया है. वह 2021 में नंदीग्राम से हारी थीं... ममता बनर्जी को मुसलमानों ने खुलकर वोट दिया. वॉर्ड नंबर 77 में जितने भी मुसलमान वोट देने निकले, सभी ने ममता को वोट किया. मुझे हिंदू, सिख, जैन और बौद्धों ने आशीर्वाद देकर जिताया.

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शुभेंदु अधिकारी ने यह भी दावा किया कि उनको किन लोगों ने वोट दिए,  मुझे, खासकर, बंगाली हिंदुओं ने खुलकर वोट दिया... सीपीएम के सपोर्टर्स ने भी मुझे वोट दिया. भवानीपुर में सीपीएम के 13,000 वोटर थे, जिनमें से 10 हजार ने मुझे वोट दिया... बंगाली हिंदुओं ने खुलकर मुझे वोट दिया... गुजरातियों, जैनियों, मारवाड़ी और पूर्वांचलियों ने भी मुझे वोट दिया... सिख समुदाय ने खुलकर मुझे वोट दिया.

ममता बनर्जी ने मतगणना केंद्र पर अपने साथ मारपीट का गंभीर आरोप लगाया है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) नेता कल्याण बनर्जी ने सोशल मीडिया पर ममता बनर्जी के साथ फोन पर हुई बातचीत का ऑडियो शेयर किया है. बातचीत में ममता बनर्जी बता रही हैं कि 16वें राउंड तक वह शुभेंदु अधिकारी से आगे थीं, केवल कुछ ही राउंड बाकी थे. ममता बनर्जी का आरोप है, इलेक्शन प्रॉसेस कम्प्रोमाइज्ड है, क्योंकि काउंटिंग सेंटर्स में गुंडे घुस आए, अफसरों और एजेंटों को डराया-धमकाया. 

चुनाव नतीजे आने के एक दिन बाद ममता बनर्जी ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा, हम चुनाव हारे नहीं, हराए गए हैं. ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को सबसे बड़ा विलेन करार दिया है. 

ममता बनर्जी कहां चूक गईं?

पश्चिम बंगाल की चुनावी रैली में ममता बनर्जी ने चुनाव कैंपेन के दौरान एक ऐसी कविता पढ़ी थी, जिसे वह लोकसभा चुनाव में भी लोगों को सुना चुकी थीं. फर्क बस यह था कि लोकसभा चुनाव के दौरान कविता में जिस जगह 'जिंदगी' शब्द था, विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने वहां 'तृणमूल' पढ़ा था. 

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तृणमूल कांग्रे की रैली के आखिर में शेरो शायरी वाले अंदाज में ममता बनर्जी ने फिर मुलाकात की बात करते हुए विदा ली. ममता बनर्जी ने कहा, 'फिर मिलेंगे, रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे, फिर जोड़ा फूल खिलेंगे, रहा तृणमूल तो फिर मिलेंगे.'

क्या ममता बनर्जी को चुनाव नतीजों का एहसास तभी हो गया था? ऐसा कोई अचानक तो हुआ नहीं होगा. ये सब तो पहले से ही महसूस हो रहा होगा. फिर कैसे चूक गईं? क्या भूल सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची थी?

1. निश्चित तौर पर ममता बनर्जी की 15 साल की सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर थी, लेकिन क्या उसे काउंटर करने का कोई उपाय नहीं था - या बीमारी वाकई लाइलाज हो चुकी थी?

क्या सत्ता विरोधी लहर को ममता बनर्जी समझ नहीं पाईं? ममता बनर्जी भाषा आंदोलन चलाती रहीं, माछ-भात पर बीजेपी को घेरती रहीं - और बीजेपी वाले मछली खाते हुए जीत का सेहरा ले उड़े.

2. यह ठीक है कि बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार और टीएमसी नेताओं की गुंडागर्दी को मुद्दा बनाया, लेकिन लोग बीजेपी की बात क्यों समझ गए? ममता बनर्जी की बात बिल्कुल नहीं सुनी. मतलब, बंगाल के आम लोग बदलाव चाहते थे.

3. ममता बनर्जी के साथी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप तो 2016 से लग रहे थे, लेकिन 2021 में भी तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता में वापसी कर ली. टीचर्स भर्ती घोटाला, पार्थ चटर्जी की दोस्त के घर से बड़ी रकम मिलना, और उनका जेल जाना - लगता है लोग भूल नहीं पाए.

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4. बीजेपी ने तो लोकसभा चुनाव में भी संदेशखाली की पीड़ित को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन हार मिली. लेकिन, आरजी कर रेप पीड़ित की मां रत्ना देबनाथ का चुनाव जीत जाना तो अलग ही इशारा कर रहा है. यानी, लोगों ने माना कि आरजी कर गैंग-रेप और हत्या केस में ममता बनर्जी ने पीड़ित को इंसाफ दिलाने की कोशिश नहीं की - और, ऐसा तब जबकि आरोपी को सजा भी हो चुकी है. 

5. ममता बनर्जी हमेशा ही मुस्लिम वोट बैंक पर जोर देती रहीं, और हिंदू वोटों का अपने खिलाफ जाना नहीं रोक पाईं. अयोध्या में राम मंदिर उद्घाटन के बहिष्कार की ही तरह, ममता बनर्जी ने प्रयागराज महाकुंभ के लिए 'मृत्युकुंभ' शब्द का इस्तेमाल किया था - और ये सब ममता बनर्जी के खिलाफ गया.

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