ट्रंप के लिए ईरान के साथ अपनी शर्तों पर डील करना क्यों मुश्किल है

ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने की डोनाल्ड ट्रंप की कोशिशें फिलहाल अधर में लटकी नजर आ रही हैं, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक बड़े संकट में डाल दिया है.

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ट्रंप के शांति प्रस्तावों पर क्यों भारी पड़ रहा है ईरान? (Photo-ITG) ट्रंप के शांति प्रस्तावों पर क्यों भारी पड़ रहा है ईरान? (Photo-ITG)

नरेश कौशिक

  • नई दिल्ली,
  • 07 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:04 PM IST

मंगलवार रात को अचानक और बड़े बदलाव के तहत, डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से वाणिज्यिक जहाजों को निकालने की अमेरिकी सैन्य योजना को स्थगित करने की घोषणा की. उन्होंने इसे युद्ध समाप्त करने की दिशा में बातचीत में हुई बड़ी प्रगति का परिणाम बताया.

प्रोजेक्ट फ़्रीडम में आया यह ठहराव, जिसका मकसद ईरान पर दबाव डालकर उसे युद्ध खत्म करने के लिए किसी समझौते पर राज़ी करना था,  इसके शुरू होने के ठीक एक दिन बाद ही आ गया. इस योजना में गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर, 100 से ज़्यादा विमान और 15,000 अमेरिकी सैनिक शामिल थे, लेकिन ईरान इस धमकी से ज़रा भी नहीं घबराया और उसने योजना के पहले ही दिन, संयुक्त अरब अमीरात पर एक दर्जन मिसाइल हमले करके इसका जवाब दिया, नाकेबंदी जारी रही.

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लिहाजा, सैन्य योजना को रोकने की ट्रंप की घोषणा और बातचीत में प्रगति के दावों ने वैश्विक बाजारों को बड़ी राहत दी. अमेरिकी मीडिया द्वारा यह रिपोर्ट किए जाने के बाद कि व्हाइट हाउस, तेहरान के साथ एक पन्ने के 14-सूत्रीय समझौते के करीब है, बुधवार को शेयर बाजारों में उछाल देखा गया और तेल की कीमतों में गिरावट आई.

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रिपोर्टों के अनुसार, अगर यह समझौता हो जाता है, तो ईरान परमाणु संवर्धन पर रोक लगाने के लिए प्रतिबद्ध होगा.अमेरिका अपने प्रतिबंधों को हटाने और ईरान की जब्त की गई अरबों डॉलर की धनराशि को मुक्त करने पर सहमत होगा, और दोनों पक्ष होर्मुज जलडमरूमध्य की अपनी नाकाबंदी हटा लेंगे.

बाजार के उत्साह को इस बात से भी बल मिला कि ईरानी विदेश मंत्रालय ने स्वीकार किया कि सरकार अमेरिकी योजना की समीक्षा कर रही है. फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी इस उत्साह को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, उन्होंने कहा कि अपने ईरानी समकक्ष, मसूद पेजेशकियन के साथ जलडमरूमध्य के माध्यम से जहाजों के सुरक्षित पारगमन पर चर्चा की है. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमला किए जाने के बाद शुरू हुई इस नाकाबंदी के कारण 1,500 से अधिक जहाज फंसे हुए हैं.

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ईरान के असली शासक

लेकिन ईरान में संघर्ष को लेकर राष्ट्रपति पेजेशकियन निर्णय लेने वाले व्यक्ति नहीं हैं.  हालांकि वह ईरान के शीर्ष निर्वाचित राजनेता हैं, लेकिन उनकी शक्तियां सीमित रही हैं, खासकर युद्ध शुरू होने के बाद से. असली ताकत ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और अन्य कट्टरपंथियों, जैसे कि ईरान की सुरक्षा समिति के पास है. ट्रंप की घोषणा के बाद दोनों ने ही बेहद सख्त और समझौता न करने वाले बयान जारी किए.

सुरक्षा समिति के एक सदस्य ने अमेरिकी योजना को "अमेरिकी इच्छाओं" की एक सूची बताया. IRGC ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से सुरक्षित मार्ग तभी संभव होगा जब "आक्रमणकारियों की धमकियां" समाप्त हो जाएंगी और "नई प्रक्रियाओं" को लागू किया जाएगा.

ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने संकेत दिया कि ईरान को अमेरिका पर भरोसा नहीं है, उन्होंने कहा कि बातचीत के लिए "कम से कम, विवाद को सुलझाने के दृष्टिकोण के साथ चर्चा में शामिल होने का एक वास्तविक प्रयास" और "सद्भावना" की आवश्यकता होती है, उनके अनुसार, "बातचीत" का अर्थ विवाद, तानाशाही, धोखा, जबरन वसूली या दबाव बनाना नहीं है. इन बयानों से संकेत मिलता है कि युद्ध समाप्त करने के ट्रंप के नवीनतम प्रस्ताव के सफल होने की संभावना कम है.

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होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण क्यों बना रहेगा

जैसा कि IRGC के बयान से स्पष्ट है, इस बात की संभावना बहुत कम है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य के मुद्दे पर कोई समझौता करेगा. इस युद्ध ने ईरान को एक ऐसा 'ट्रंप कार्ड' दे दिया है, जिसे वह छोड़ने वाला नहीं है. जलडमरूमध्य की नाकाबंदी करके, ईरान ने वैश्विक तेल, गैस और हीलियम, एल्युमीनियम एवं यूरिया जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं का 20 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी के भीतर ही रोक दिया है, जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ गई है.

यह 'चोकहोल्ड' 1973 के उस तेल प्रतिबंध से भी बदतर है, जो ओपेक (OPEC) के अरब देशों ने उस वर्ष अक्टूबर में इज़रायल के साथ युद्ध शुरू होने के बाद लगाया था. उदाहरण के तौर पर, एयरलाइनों ने इस महीने दुनिया भर में 13,000 उड़ानें रद्द कर दी हैं. जर्मन विमानन कंपनी लुफ्थांसा (Lufthansa) ने अब तक का सबसे कड़ा कदम उठाते हुए अपने गर्मियों के शेड्यूल से कुल 20,000 शॉर्ट-हॉल उड़ानों में कटौती की है. इसका कारण नाकाबंदी की वजह से विमान ईंधन की कीमतों का दोगुना होना है, अमेरिका में, युद्ध शुरू होने के बाद से पेट्रोल की कीमतें पहले ही लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं.

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ट्रंप के पास अब केवल खराब विकल्प बचे हैं

ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर ट्रंप जलडमरूमध्य में मुक्त नौवहन और कोई भी समझौता चाहते हैं, तो उन्हें पहले अपनी नाकाबंदी हटानी होगी, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाना ट्रंप के लिए अपनी हार स्वीकार करने और ईरान पर भविष्य का नियंत्रण खोने जैसा होगा. तेहरान इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक व्यापक समझौता चाहता है. हालांकि, ऐसे किसी समझौते के लिए बातचीत जारी रहने का मतलब होगा नाकाबंदी का और खिंचना, जिससे वैश्विक ऊर्जा और जलमार्ग से गुजरने वाली अन्य महत्वपूर्ण आपूर्तियों का संकट और गहरा जाएगा.

ट्रंप ने बार-बार ईरान पर फिर से हमले शुरू करने की धमकी दी है, लेकिन इस्लामिक रिपब्लिक अच्छी तरह जानता है कि अमेरिका में यह युद्ध कितना अलोकप्रिय हो चुका है, जिससे सैन्य अभियान फिर से शुरू करना ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से कठिन हो गया है. यहां तक कि उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य भी इसके खिलाफ तेजी से आवाज उठा रहे हैं.

जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन केन के अनुसार, युद्धविराम के बाद से ईरान ने अमेरिकी सेना पर 10 से अधिक बार हमले किए हैं. हालांकि, केन ने यह भी जोड़ा कि ये हमले "फिलहाल बड़े पैमाने पर युद्ध अभियान फिर से शुरू करने की सीमा से नीचे" थे. इससे संकेत मिलता है कि ट्रंप ईरान की उकसावे वाली कार्रवाइयों का जवाब देने के लिए तैयार नहीं हैं. यह एक और उदाहरण है कि इस युद्ध ने अमेरिकी राष्ट्रपति को कितना कमजोर कर दिया है.

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हथियारों के भंडार में कमी 

युद्ध ने अमेरिकी रक्षा शस्त्रागार के कुछ सबसे महत्वपूर्ण और महंगे हथियारों, जैसे कि पैट्रियट मिसाइलें, थाड, इंटरसेप्टर और टॉमहॉक, के भंडार को गंभीर रूप से कम कर दिया है. युद्ध में इन भंडारों का एक-तिहाई से आधा हिस्सा इस्तेमाल हो चुका है. इनमें से कुछ उपकरणों को जापान और दक्षिण कोरिया से हटाना पड़ा है, जिससे वे एशियाई देश चीन के सामने असुरक्षित हो गए हैं.

यूक्रेन और अमेरिका के अन्य यूरोपीय सहयोगी भी चिंतित हैं क्योंकि अमेरिकी हथियारों की उनकी वादा की गई आपूर्ति में देरी हो रही है. कम हो चुके इनमें से कुछ सिस्टम को बदलने में सालों लग जाएंगे. वाशिंगटन में यह डर बना हुआ है कि यदि अमेरिका या उसके सहयोगियों को चीन या रूस के साथ युद्ध का सामना करना पड़ता है, तो उनके पास अपनी रक्षा के लिए पर्याप्त हथियार उपलब्ध नहीं होंगे. दूसरी ओर, ऐसी खबरें आई हैं कि चीन अभी भी ईरान को दोहरे उपयोग वाले उपकरणों की आपूर्ति कर रहा है. इन्हीं कारणों से अमेरिकी सैन्य कमांडर दोबारा युद्ध शुरू करने में संकोच करेंगे और ईरानी इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं.

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ईरान का परमाणु खतरा

इस युद्ध ने ईरान के परमाणु खतरे को खत्म करने के अमेरिका के लक्ष्य को नामुमकिन नहीं तो बहुत कठिन जरूर बना दिया है. ईरान के कट्टरपंथियों ने जोर देकर कहा है कि वे 60 प्रतिशत तक संवर्धित 450 किलोग्राम यूरेनियम को देश से बाहर नहीं जाने देंगे. अब ईरान में परमाणु बम बनाने के प्रति समर्थन बढ़ रहा है, जिसे वे भविष्य में इजरायल या अमेरिका के किसी भी हमले को रोकने के लिए एकमात्र सुरक्षा कवच के रूप में देखते हैं. इससे समझौते के लिए होने वाली बातचीत बहुत मुश्किल हो जाएगी.

ट्रंप भले ही इसे स्वीकार न करें, लेकिन उन्हें अपने पहले कार्यकाल के उस फैसले पर पछतावा हो रहा होगा, जिसमें उन्होंने 2015 के 'जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन' (JCPOA), जिसे 'ईरान परमाणु समझौते' के रूप में जाना जाता है, से हटने का निर्णय लिया था. राष्ट्रपति ओबामा ने बड़े प्रयासों के बाद यह समझौता किया था, ट्रंप के 2018 के फैसले के बाद, ईरान ने यूरेनियम को 20 प्रतिशत तक संवर्धित करना शुरू किया और फिर इसे बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दिया. ईरान के पास 20 प्रतिशत तक संवर्धित लगभग 11 टन यूरेनियम का भंडार भी मौजूद है. यह अभी स्पष्ट नहीं है कि क्या यह भी अब होने वाली बातचीत का हिस्सा होगा.

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अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने मंगलवार को व्हाइट हाउस में पत्रकारों से कहा कि ईरान के साथ युद्ध समाप्त हो चुका है, उन्होंने जोर दिया कि युद्ध के उद्देश्य पहले ही प्राप्त कर लिए गए हैं, जबकि हकीकत यह है कि सैन्य अभियान की शुरुआत में ट्रंप द्वारा बताए गए लगभग सभी उद्देश्य विशेष रूप से यह सुनिश्चित करना कि ईरान के पास कभी परमाणु हथियार न हों अभी भी अधूरे हैं.

एक कमजोर समझौता

संघर्ष को समाप्त करने की एक हताश कोशिश में, ट्रंप JCPOA (2015 के परमाणु समझौते) की तुलना में एक कमजोर समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, भले ही उनके दावे यह हों कि नया समझौता ओबामा द्वारा किए गए समझौते से कहीं बेहतर होगा. वह इसे आगे की बातचीत के लिए छोड़ते हुए केवल होर्मुज जलडमरूमध्य पर एक समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं. इससे यह सवाल उठेगा कि आखिर इस युद्ध ने क्या हासिल किया? क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य तो बंद ही इस युद्ध की वजह से और युद्ध के बाद हुआ था.

लेकिन अगर ईरान परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए सहमत हो भी जाता है, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इस्लामिक रिपब्लिक का नया कट्टरपंथी शासन इसका सम्मान करेगा और मुमकिन है कि वह उत्तर कोरिया के उदाहरण का अनुसरण करते हुए बम बना ले. यह उस युद्ध का सबसे बुरा परिणाम होगा, जिसे ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सलाह पर चुना था.

उनके फैसले ने निस्संदेह ईरान की अर्थव्यवस्था और सेना को भारी नुकसान पहुंचाया है, लेकिन इसने वहां के शासन को पहले से कहीं अधिक साहसी और जिद्दी भी बना दिया है. नोबेल शांति पुरस्कार जीतने के लिए बेताब एक नेता के रूप में, एक संभावित परमाणु-सशस्त्र दुश्मन को छोड़ जाना एक ऐसी विरासत होगी जिसके साथ ट्रंप को जीना पड़ सकता है.

(नरेश कौशिक बीबीसी और एसोसिएटेड प्रेस के पूर्व संपादक हैं। वह लंदन में रहते हैं)

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