15 साल तक के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन, मैक्रों की सलाह मानेगा भारत?

भारत में बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन से नए तरह का संकट खड़ा हो सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट एक्सेस सीमित है, लेकिन जहां है, वहां सोशल मीडिया शिक्षा और कम्युनिकेशन का माध्यम भी है. बैन से बच्चों को इंफॉर्मेशन, ऑनलाइन लर्निंग और सोशल कनेक्शन से वंचित किया जा सकता है.

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बच्चों के लिए सोशल मीडिया बना खतरा. (AI-generated image) बच्चों के लिए सोशल मीडिया बना खतरा. (AI-generated image)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 20 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:10 AM IST

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एआई इंपैक्ट समिट 2026 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक अनोखा न्यौता दिया है. दरअसल हाल ही कुछ देशों में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया गया है. फ्रांस में भी इस तरह प्रतिबंध लगाने की तैयारी चल रही है. मैक्रों ने कहा कि फ्रांस जल्द ही ऐसा कानून लागू करने वाला है, स्पेन भी साथ है, और भारत को इसमें शामिल होकर बच्चों की डिजिटल सुरक्षा मजबूत करनी चाहिए

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जाहिर है कि इस तरह की मांग भारत में अभिभावक करते रहे हैं. पर संगठित रूप से अभी तक बच्चों और किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की मांग अभी नहीं आई है. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि इस तरह का बैन बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, एआई के दुरुपयोग और मेंटल हेल्थ आदि के लिए सकारात्मक हो सकता है.  लेकिन यह एक विचार करने योग्य सवाल है कि क्या भारत जैसे विविध और युवा-प्रधान देश के लिए इस तरह का प्रतिबंध वाकई फायदेमंद साबित हो सकता है? 

सबसे पहले, इस पहल के सकारात्मक पक्षों पर नजर डालते हैं. आज की डिजिटल दुनिया में सोशल मीडिया बच्चों के लिए एक दोधारी तलवार है. इंस्टाग्राम, टिकटॉक, ट्विटर (अब X) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की बाढ़ है, जिसमें हिंसा, सेक्सुअल एब्यूज, फेक न्यूज और साइबर बुलिंग शामिल हैं. UNICEF की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में 10-19 साल के 40% से ज्यादा युवा ऑनलाइन बुलिंग का शिकार होते हैं, जो डिप्रेशन, एंग्जाइटी और यहां तक कि सुसाइड तक ले जाता है.

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15 साल से कम उम्र के बच्चों का ब्रेन अभी विकसित हो रहा होता है, और एडिक्टिव अल्गोरिदम उन्हें घंटों स्क्रीन पर बांधे रखता है. जाहिर है कि इससे बच्चों की पढ़ाई और फिजिकल एक्टिविटी प्रभावित हो रही है. फ्रांस जैसा बैन बच्चों को इन खतरों से बचाएगा, अभिभावकों को राहत देगा और शिक्षा पर फोकस बढ़ाएगा.  मैक्रों इसलिए ही इस तरह के बैन को G7 देशों के लिए प्रायोरिटी बताते हैं.

लेकिन क्या इस पहल को भारत के लिए अच्छा माना जा सकता है.जाहिर है कि इसके लिए हमें सिक्के के दूसरे पहलू को भी देखना होगा. भारत में डिजिटल डिवाइड बड़ा मुद्दा है. ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट एक्सेस सीमित है, लेकिन जहां है, वहां सोशल मीडिया शिक्षा और कम्युनिकेशन का माध्यम भी है. बैन से बच्चों को इंफॉर्मेशन, ऑनलाइन लर्निंग और सोशल कनेक्शन से वंचित किया जा सकता है.

घर में बुराई का प्रवेश न हो जाए इसके लिए हम घर के दरवाजे को बंद नहीं कर सकते. क्योंकि जब अच्छाई आनी चाहेगी तो उसके लिए भी दरवाजा बंद मिलेगा. समुद्र पार करने से बाहर की बुराइयां भारत में आ सकती थीं, इसके लिए हमारे पूर्वजों ने कभी ऐसे नियम बनाए कि समुद्र पार करने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है. जाहिर है कि इसका नुकसान हमारे देश और समाज को उठाना पड़ा. आज यू ट्यूब के जरिए सुदूर देहातों में बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं. तमाम कोचिंग ट्यूटोरियल्स का लाभ आज बच्चे घर बैठे उठा रहे हैं.

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इसके अलावा कई व्यवहारिक परेशानियां भी इस फैसले को लागू करने में सामने आएंगी.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (आर्टिकल 19) पर असर पड़ेगा, और इंप्लिमेंटेशन मुश्किल होगा. एज वेरिफाई करना मुश्किल होगा. आधार जैसे सिस्टम से प्राइवेसी रिस्क बढ़ सकता है. साथ ही, बैन से अंडरग्राउंड ऐप्स या VPN का इस्तेमाल बढ़ेगा, जो और ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है.

भारत में परिवार-केंद्रित सोसाइटी है, जहां पैरेंट्स खुद इस तरह का कंट्रोल करते हैं. मैक्रों का न्यौता भारत के लिए एक विचारणीय अवसर है. पर इसे सावधानी से लागू करने की शर्त होगी. पर भारत जैसे विकासशील देश में बहुत महत्वपूर्ण काम के लिए संसाधनों की कमी पड़ जाती है. जाहिर है कि सोशल मीडिया पर बैन के लिए कहां से संसाधन आएगा. अनावश्यक रूप से मुकदमों की बाढ़ आएगी. हां यह हो सकता है कि सख्त बैन की बजाय रेगुलेटेड एक्सेस की बात की जाए. डिजिटल एजुकेशन और पैरेंटल गाइडलाइंस के साथ बच्चों को यह सुविधा उपलब्ध कराई जाए. यह पहल अच्छी हो सकती है, लेकिन इसका सफल होना नीतिगत स्मार्टनेस पर निर्भर करेगा.

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