बांग्लादेशी नारे, नहीं बने सहारे: ममता हारीं संग्राम, बंगाल बोला- जय श्रीराम

पश्चिम बंगाव विधानसभा चुनावों में टीएमसी को मिली बड़ी हार का मूल्यांकल अब शुरू हो गया है. पिछले तीन विधानसभा चुनाव जीतने में ममता बनर्जी ने जिसे हथियार बनाया वही इस बार टीएमसी की हार का सबसे बड़ा कारण बना है. बांग्लादेशी नारे मां-माटी-मानूष, जय बांग्ला और खेला होबे इस बार उल्टा पड़ गया.

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोलाकाता की एक चुनावी रैली में. (Photo: PTI) पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोलाकाता की एक चुनावी रैली में. (Photo: PTI)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 04 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:14 PM IST

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार एक अनोखा मोड़ आया है. पिछले तीन विधानसभा चुनावों में विजय दर्ज करने वाली टीएमसी के लिए 2026 के विधानसभा चुनाव परिणाम में उल्टी गंगा बह रही है.इतनी बड़ी हार की कल्पना शायद ममता बनर्जी ने बिल्कुल भी नहीं की होगी. दरअसल इस बार के विधानसभा चुनावों में टीएमसी के लिए वही चीजें श्राप बन गईं जो पिछले चुनावों में पार्टी के लिए वरदान साबित हो रहीं थीं. दशकों से बांग्लादेश से उधार लिए गए नारे ‘जय बांग्ला’, ‘मां-माटी-मानुष’ और ‘खेला होबे’ अब जनता के गले नहीं उतरे.1971 के मुजीब युग से लेकर 2013 के अवामी लीग तक के इन नारों को ममता बनर्जी ने अपनी राजनीति का आधार बनाया. लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में जनता ने साफ संदेश दे दिया है कि उधार की चीजें अब काम नहीं कर रहीं. माहौल बदलते ही वही बांग्लादेश के नारे लोगों को चुभने लगे जो पहले लोगों को अच्छे लगते थे.आइये देखते हैं कि आखिर वो कौन से कारण रहे कि ममता को इस बार पुराने नारों ने धोखा दे दिया.  

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उधार के नारे तुष्टिकरण के प्रतीक बन गए

बंगाल की बदलती डेमोग्रेफी और बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न की खबरों ने बंगाल की जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया. ‘जय बांग्ला’ नारा 1971 का है. बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान शेख मुजीबुर्रहमान और मुक्ति वाहिनी का युद्ध-नाद था यह नारा. 7 मार्च 1971 को मुजीब के ऐतिहासिक भाषण में यह नारा गूंजा था. ‘जॉय बांग्ला’ स्वतंत्रता की लड़ाई में बांग्लादेशी राष्ट्रवाद का प्रतीक बना. पश्चिम बंगाल के चुनावों ममता बनर्जी ने इसका इस्तेमाल खूब किया. लेकिन यह मूल रूप से बांग्लादेश की मिट्टी का नारा था. ममता बनर्जी इसे टीएमसी की रैलियों में बार-बार दोहराती थीं. 2021 के चुनाव में ‘जय बांग्ला’ के साथ ‘मां-माटी-मानुष’ का मिश्रण कर उन्होंने बंगाली अस्मिता का ढोल पीटा. लेकिन आज जब बंगाल में हिंसा, घुसपैठ और सांप्रदायिक तनाव की खबरें आती हैं, तो लोग पूछते हैं किसकी जय हो रही है? बांग्लादेशी घुसपैठियों की या बंगाली हिंदुओं की? 

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‘मां-माटी-मानुष’ भी उधार का नारा रहा है. 1991 के बांग्लादेश चुनाव में बेगम खालिदा जिया की बीएनपी ने इसे अपना चुनावी टैगलाइन बनाया था. मां (मातृभूमि की ममता), माटी (जमीन) और मानुष (जनता) को ममता बनर्जी ने 2007-2011 के बीच अपना लिया. नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन में लाल सरकार के खिलाफ यह नारा बहुत चला. 34 साल के वामपंथी शासन का अंत इसी नारे ने किया. ममता ने ‘मां माटी मानुष’ नारा लगाया, लेकिन सत्ता में आने के बाद यही नारा खोखला साबित हुआ. मां (माताएं) आज संदेशखाली में असुरक्षित हैं, माटी (जमीन) पर सिंडिकेट राज कायम है और मानुष (जनता) बेरोजगारी, घुसपैठ और तुष्टीकरण से त्रस्त हैं. 2026 के चुनावी रुझानों में जहां भाजपा 194 सीटों (दोपहर 2.20 तक) पर आगे दिख रही है, वहां टीएमसी का ‘मां-माटी-मानुष’ मॉडल धराशायी हो रहा है.

तीसरा नारा ‘खेला होबे’ 2013 का है. बांग्लादेश की अवामी लीग के नेता शमीम उस्मान ने नारायणगंज में चुनावी सभा में कहा था कि‘ किसको खेला सिखाते हो? हम तो बचपन से खिलाड़ी हैं, खेला होबे’. यह अवामी लीग बनाम बीएनपी-जमात की लड़ाई का नारा था. ममता बनर्जी ने 2021 के बंगाल चुनाव में इसे अपना लिया. ‘खेला होबे’ टीएमसी का आक्रामक नारा बना. लेकिन बाद में बांग्लादेश का खेल बंगाल में चुनावी हिंसा और महिलाओं पर अत्याचार के रूप में आ गया. जनता अब पूछ रही है कि यह कैसा खेल है? 2026 में ‘खेला होबे’ का जवाब जनता ने दिया.‘खेल खत्म, अब हिसाब होगा’.

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बांग्लादेशी राजनीति पर टिकी थी टीएमसी की राजनीति 

टीएमसी की राजनीति का पूरा मॉडल बांग्लादेशी राजनीति की नकल पर टिका रहा. ममता ने बंगाली राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया, लेकिन वह राष्ट्रवाद बांग्लादेशी रंग लिए हुए था. अवामी लीग की तुष्टीकरण की नीतियां, अल्पसंख्यकों पर दबाव और सत्ता के लिए किसी भी हद तक जाना ये सब टीएमसी में दिखे. बंगाल में बंगाली प्राइड को इस स्तर पर ले जाया गया कि जय श्रीराम का नारा लगाने वाले और हिंदी भाषियों को बंगाल का दुश्मन बनाने की कोशिश की गई.  संदेशखाली कांड, आरजी कर रेप-मर्डर, टीएमसी गुंडों का आतंक, बांग्लादेशी घुसपैठियों को पनाह आदि ‘मां-माटी-मानुष’ की हकीकत बन गए. जनता अब समझ गई कि बांग्लादेशी रणनीति पर जोर केवल बांग्लादेशियों को लुभाने की रणनीति है. 

2011 में किया टीएमसी का वादा अधूरा रह गया

 टीएमसी ने पश्चिम बंगाल में परिवर्तन का वादा करके वाम को उखाड़ फेंका था. लेकिन 15 साल बाद बंगाल परिवर्तन की उम्मीद खो चुका है. बेरोजगारी चरम पर है. युवा पड़ोसी राज्यों में पलायन कर रहे हैं. उद्योग नहीं आ रहे क्योंकि सिंडिकेट और तोलाबाजी का राज है. शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है. महिलाओं की सुरक्षा का सवाल सबसे बड़ी समस्या बन चुका है. जब मुख्यमंत्री खुद महिलाओं के मुद्दे पर चुप रहती हैं या दोषियों को बचाती दिखती हैं, तो ‘मां’ का नारा व्यंग्य बन जाता है.

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बंगाली गौरव उल्टा पड़ गया
 
बांग्लादेश से आए नारों का इस्तेमाल ममता ने बंगाली गौरव को जगाने के लिए किया, लेकिन वह गौरव अब टूट रहा है. बंगाल की जनता ने देख लिया कि ‘जय बांग्ला’ का मतलब बांग्लादेशी संस्कृति और राजनीति की नकल है. जबकि असली बंगाली अस्मिता रामकृष्ण, विवेकानंद, रवींद्रनाथ, नेताजी और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत है. टीएमसी ने उसे दबा दिया. हिंदू त्योहारों पर रोक, दुर्गा विसर्जन पर विवाद, मंदिरों पर हमले आदि  बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को चुनौती दे रहे थे. जहां 2021 में टीएमसी ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी, वहां अब भाजपा मजबूती से आगे है. ग्रामीण बंगाल, जहां ‘माटी’ का नारा सबसे ज्यादा चला था, वहां अब परिवर्तन की हवा साफ दिख रही थी. मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भरता ने टीएमसी को हिंदू वोट से दूर कर दिया. ‘बोहिरागतो’ (बाहरी) बनाम ‘घर का’ का खेल भी उलटा पड़ रहा है. जनता समझ गई कि असली खतरा अंदर है.भ्रष्टाचार, तुष्टीकरण और सांप्रदायिक विभाजन.


ममता बनर्जी की राजनीति का सबसे दुखन पहलू यह रहा कि उन्होंने बंगाल को विकास की राह से हटाकर वोट बैंक की राजनीति पर ले आईं. ‘मां-माटी-मानुष’ का नारा अब व्यंग्य बन गया है. जब मां रो रही है, माटी बेची जा रही है और मानुष पलायन कर रहा है, तो नारे कैसे काम करेंगे? बांग्लादेश में भी अवामी लीग के खिलाफ जनता ने विद्रोह किया था. इस चुनाव में बंगाल की जनता ने साबित किया कि नारों से ज्यादा हकीकत मायने रखती है. टीएमसी को अगर सत्ता में फिर से आना है तो उसे अपने मूल नारों को छोड़कर असली विकास, सुरक्षा और समावेश की राजनीति करनी होगी.

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एसआईआर के विरोध ने ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार की सबसे बड़ी वजह बना एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) का विरोध. ममता बनर्जी ने मतदाता सूची के इस विशेष गहन पुनरीक्षण को बीजेपी की साजिश और एनआरसी का रूप बताकर घोर विरोध किया. धरना, रैली, सुप्रीम कोर्ट में याचिका सब कुछ आजमाया. लेकिन जनता ने इसे बांग्लादेशियों की बचाने की रणनीति समझा.
एसआईआर में करीब 90 लाख नाम मतदाता सूची से हटे. टीएमसी ने इसे मुस्लिम और बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम बचाने की लड़ाई बना दिया. लेकिन ग्रामीण बंगाल और हिंदू बहुल इलाकों में जनता ने देख लिया कि घुसपैठ, फर्जी वोटर और सिंडिकेट राज को चुनौती मिल रही है. ममता का विरोध असल में अपने तुष्टीकरण के मॉडल की रक्षा थी. भाजपा ने इसे साफ-सुथरी मतदाता सूची और असली बंगाली हित की लड़ाई बनाया. नतीजतन ममता की रणनीति उल्टी पड़ गई. जनता को लगा कि बीजेपी उनके हित की बात कर रही है जबकि दीदी बांग्लादेशियों के हित की बात कर रही हैं.  
 

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