ईरान का चेक कश्मीर में भुनाने को बेताब हैं मुनीर!

अमेरिका और ईरान के बीच पीस डील कराने के लिए दौड़-भाग कर रहे आसिम मुनीर बदले में डोनाल्ड ट्रंप से क्या उम्मीद लगाए बैठे हैं? कहा जा रहा है कि वह ट्रंप को भरोसे में लेकर एक बार फिर कश्मीर फ्रंट को गर्म करना चाहते हैं. ये मानकर कि यदि जंग तक आई तो ट्रंप संभाल लेंगे. लेकिन, यदि इस बार कुछ गड़बड़ हुई तो बात सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक तक नहीं रुकेगी.

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जंगी मौसम बदल रहा है... ईरान से उठी गर्म हवा का रुख आसिम मुनीर कश्मीर की ओर मोड़ना चाहते हैं. (फोटो - AI generated) जंगी मौसम बदल रहा है... ईरान से उठी गर्म हवा का रुख आसिम मुनीर कश्मीर की ओर मोड़ना चाहते हैं. (फोटो - AI generated)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 17 जून 2026,
  • अपडेटेड 8:00 AM IST

आसिम मुनीर इन दिनों ईरान पीस डील के लिए जो कूटनीतिक दौड़-भाग कर रहे हैं, उसके बदले वे वास्तव में क्या चाहते हैं? क्या वे सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ बने रहना चाहते हैं, या फिर इसके पीछे कोई और खतरनाक मंसूबा छिपा है? सच तो यह है कि ईरान युद्ध से उठी गरम हवा अब धीरे-धीरे भारत की ओर बढ़ती दिख रही है. यदि खाड़ी देशों में जंग रुकती है, तो अगला फ्रंट दक्षिण एशिया में खुल सकता है.

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मुनीर की पूरी कोशिश डोनाल्ड ट्रंप को शीशे में उतारने की है, ताकि वे ‘कश्मीर’ मुद्दे पर एक बार फिर पाकिस्तान के पाले में खड़े हो जाएं. भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का मुद्दा सिर्फ राजनयिक रस्साकशी का जरिया नहीं, बल्कि कई युद्ध की बड़ी वजह रहा है.

आजादी के बाद से ही पाकिस्तान 'कश्मीर जिहाद' के नाम पर भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर में लगा हुआ है. साल 1948 से अब तक उसने इसी जिहाद के नाम पर तीन खुली जंगें लड़ीं और अनगिनत आतंकी हमलों को अंजाम दिया. वह निर्दोषों का खून बहाने में तो कामयाब रहा, लेकिन सैन्य मोर्चे पर उसे हर बार मुंह की खानी पड़ी.

पाक जनरलों के फ्लॉप फौजी 'इनोवेशन'

‘गजवा-ए-हिंद’ का सपना संजोए पाकिस्तानी जनरलों ने समय-समय पर भारत के खिलाफ कई फौजी प्रयोग किए. 1948 में उन्होंने अफगान कबाइलियों की आड़ लेकर हमला बोला. इसके बाद 1965 में 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' के जरिए जम्मू को भारत से काटकर कश्मीर हथियाने की साजिश रची. यह रणनीति कागज पर जितनी शानदार थी, रणनीतिक रूप से उतनी ही बेवकूफाना साबित हुई. पाकिस्तानी हुक्मरानों ने यह सोचा ही नहीं था कि भारत सिर्फ जम्मू में नहीं लड़ेगा, बल्कि वह जंग को लाहौर तक खींच ले जाएगा. इस युद्ध में पाक जनरलों की करारी हार हुई, लेकिन उन्होंने अपनी आवाम को 'पाकिस्तान डिफेंस डे' का झुनझुना थमा दिया.

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1971 के युद्ध में पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए और बांग्लादेश बना, लेकिन शर्मनाक हार के बाद भी पाकिस्तानी बाज न आया. 1999 में कारगिल में भी पाकिस्तानी सेना ने अपनी भारी फजीहत करवाई. जब सीमाओं पर सीधी जंग जीतना नामुमकिन हो गया, तो अगले दशक में पाकिस्तान ने रणनीति बदल दी. साल 2001 में भारतीय संसद पर हमले से लेकर 2008 के मुंबई आतंकी हमले तक, उसने भारत के भीतर ही टेरर मॉड्यूल विकसित कर खूनखराबा शुरू कर दिया.

टेरर पर भारत का 'जीरो टॉलरेंस'

साल 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पहली शपथ के दौरान नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ को न्योता देकर शांति की पहल की थी. लेकिन, उसके तुरंत बाद पठानकोट एयरबेस पर हमला करवाकर आईएसआई (ISI) ने साफ कर दिया कि पाकिस्तान की असली हुक्मरान वहां की चुनी हुई सरकार नहीं, बल्कि फौज है. पीएम मोदी ने पाकिस्तान को सुधरने का एक और मौका दिया, लेकिन उरी हमले ने भारत को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया. भारत ने आतंकवाद को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई.

उरी और फिर पुलवामा आतंकी हमले का जवाब भारत ने दो बड़ी सर्जिकल और एयर स्ट्राइक से दिया. इसके जरिए पाकिस्तान को यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि नया भारत अब चुप नहीं बैठेगा, बल्कि वह आतंकियों को उनके घर में घुसकर मारेगा.

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मुनीर का 'पहलगाम एडवेंचर' और ट्रंप कार्ड

आसिम मुनीर के आर्मी चीफ रहते हुए पाकिस्तानी फौज ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी सिविल बगावत देखी है. पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और आम नागरिकों ने जनरलों के घरों को फूंक दिया और वहां जमकर लूटपाट की. घरेलू मोर्चे पर घिरे मुनीर को डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बनने से एक नई उम्मीद बंधी. वे देख रहे थे कि ट्रंप किस तरह व्यापारिक टैरिफ के बहाने भारत को लेकर हमलावर रुख अपना रहे हैं. इसी का फायदा उठाने के लिए मुनीर ने 'पहलगाम साजिश' रची. मुनीर चूंकि पहले आईएसआई चीफ रह चुके थे, इसलिए आतंकियों की बिसात बिछाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी.

मुनीर ने ट्रंप की मानसिकता को भांपकर एक बड़ा जुआ खेला था. वे जानते थे कि कश्मीर में कोई बड़ी आतंकी घटना होने पर प्रधानमंत्री मोदी पलटवार जरूर करेंगे. मुनीर को अंदाजा था कि ट्रंप को मध्यस्थता की पंचायत में आसानी से घसीटा जा सकता है, क्योंकि ट्रंप 'नोबेल पीस प्राइज' पाने या बड़े 'डील मेकर' बनने के लिए तड़प रहे हैं. मुनीर ने इस खेल की पटकथा पहलगाम हमले से पहले ही लिख दी थी. वे ट्रंप के भरोसेमंद सहयोगी स्टीव व्हिटकॉफ के बेटे जैक तक पहुंच चुके थे, जिसकी कंपनी में एक पाकिस्तानी कोर कमांडर का दामाद बिलाल बिन साकिब एडवाइजर था. इसी गठजोड़ के जरिए ट्रंप परिवार को खुश करने वाली एक क्रिप्टो डील की भूमिका बनाई गई. जब सब कुछ सेट हो गया, तब 'ऑपरेशन पहलगाम' को अंजाम दिया गया. इस आतंकी वारदात और भारत के साथ संभावित जंग का संकेत मुनीर ने एक हफ्ते पहले ही प्रवासी पाकिस्तानियों के एक सम्मेलन में दे दिया था.

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अधूरे अरमान और साख का संकट

पहलगाम आतंकी हमला कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोबारा गरमाने की साजिश थी. मुनीर का सोचना था कि भारत जब पलटवार करेगा, तो ट्रंप बीच-बचाव करने आएंगे. ट्रंप आए भी, लेकिन उन्हें भारत सरकार से वह रिस्पांस नहीं मिला, जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे. इसके बावजूद मुनीर अपने बुनियादी खेल में कामयाब रहे. उन्होंने और प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने मिलकर ट्रंप को चापलूसी के ऐसे जुमले सुनाए, जो वे सुनना चाहते थे. पाकिस्तानी फौज के अनुरोध पर जंग तो टल गई, लेकिन 'पीस मेकर' बनने के ट्रंप के अरमान अधूरे रह गए. मुनीर अब ट्रंप के इसी अधूरे अरमान को भुनाना चाहते हैं.

पहलगाम हमले के बाद 'ऑपरेशन सिंदूर' में पाकिस्तानी की भारी मरम्मत के बावजूद मुनीर को 'फील्ड मार्शल' का कागजी तमगा तो मिल गया, लेकिन वे अपनी आवाम का खोया हुआ भरोसा वापस नहीं जीत पाए हैं. वैसे, भरोसे की इसी कमी का दंश डोनाल्ड ट्रंप भी झेल रहे हैं. ट्रंप हर मौके पर दावा करते फिरते हैं कि भारत-पाकिस्तान की जंग उन्होंने रुकवाई, लेकिन सिवाय पाकिस्तान के, दुनिया में कोई भी उनकी बात पर यकीन नहीं करता.

ईरान की जंग में अपने हाथ जला चुके ट्रंप को अब वैश्विक मोर्चे पर एक बड़ी राहत चाहिए. दुनिया की सबसे मजबूत सेना के कमांडर-इन-चीफ होने के बावजूद ट्रंप फारस की खाड़ी में अमेरिका की साख डुबो चुके हैं. उन्हें जल्द से जल्द एक ऐसे कूटनीतिक बहाने की तलाश है, जिससे उनकी 'ग्लोबल सरपंच' वाली छवि वापस लौट सके. मुनीर अच्छी तरह जानते हैं कि ईरान के मुद्दे पर ट्रंप को भारत और प्रधानमंत्री मोदी से वह अंधा समर्थन नहीं मिल रहा है, जिसकी वे अपेक्षा कर रहे हैं.

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फुल एंड फाइनल...

अब मुनीर ट्रंप की इसी मजबूरी का फायदा उठाकर भारत के खिलाफ एक और मोर्चा खोलना चाहेंगे. एक ऐसा नियंत्रित मोर्चा, जिस पर ट्रंप आकर एक मुकम्मल ‘पीस डील’ करवा सकें, जो उन्हें नोबेल पुरस्कार दिला सके. पाकिस्तान के लिए भारत के खिलाफ आतंकी मोर्चा खोलना कोई मुश्किल काम नहीं है, लेकिन वे इस बार बड़ी भूल कर रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी पहले ही साफ कह चुके हैं कि पाकिस्तान की ओर से की गई कोई भी छोटी या बड़ी नापाक हरकत भारत पर सीधा हमला मानी जाएगी और उसका वैसा ही विनाशकारी जवाब दिया जाएगा.

भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्धों को दो हिस्सों में बांटकर देखा जा सकता है. पहला, परमाणु ताकत बनने से पहले का दौर और दूसरा, परमाणु शक्ति संपन्न होने के बाद का. परमाणु हथियार आने के बाद दोनों देशों का जंग को लेकर नजरिया बदला. कारगिल संघर्ष से लेकर अब तक भारत ने हर बार बेहद संयम बरता. कारगिल में सेनाएं आमने-सामने थीं, लेकिन भारत ने LoC पार नहीं की. उरी, पुलवामा और पहलगाम के बाद भी मोदी सरकार की स्ट्राइक केवल पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों तक सीमित रही.

लेकिन, क्या आगे भी भारत का रुख सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक तक ही सीमित रहेगा? शायद नहीं. भारत ने पहली बार आधिकारिक रूप से परमाणु हथियारों की तैनाती की घोषणा की है. यह घोषणा सिर्फ एक चेतावनी नहीं है, बल्कि यह आगामी युद्ध के भीषण स्वरूप का संकेत है. ऐसे में यह तय है कि यदि पाकिस्तान ने ट्रंप के भरोसे कोई भी नया एडवेंचर किया, तो इस बार भारत न तो कोई चेतावनी देगा और न ही संभलने की मोहलत. अबकी बार जो जंग शुरू होगी, वह 87 घंटे में खत्म नहीं होगी. वह लंबी खिंचेगी और गहरे निशान छोड़ जाएगी. मुनीर के पास ईरान डील वाला जो चेक है, असल में वह एक 'बाउंस चेक' है. जिसकी कीमत अंततः पाकिस्तान को अपने वजूद से चुकानी पड़ सकती है.

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