अखिलेश यादव के स्लोगन 'बात सीट की नहीं जीत की है' में संदेश किसके लिए है?

अखिलेश यादव ने 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच ‘बात सीट की नहीं जीत की है’ नारे को फिर से दोहराया है. इसके जरिए समाजवादी पार्टी की तरफ से कांग्रेस नेतृत्व को संदेश देने की कोशिश की गई है - कांग्रेस की तरफ से भी पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों के जरिए आईना दिखाने की कोशिश हुई है.

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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव. (Photo: PTI) उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 23 मई 2026,
  • अपडेटेड 10:54 AM IST

PDA फैक्टर के साथ यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे अखिलेश यादव ने 2027 के लिए एक नारा दिया है - 'बात सीट की नहीं जीत की है'. यह नारा नया तो नहीं कहा जाएगा, क्योंकि 2024 के आम चुनाव के बाद हुए 9 विधानसभा सीटों पर उपचुनावों के दौरान सामने आया था.  

सीटों के बंटवारे पर पक्की जीत को तरजीह देते हुए अखिलेश यादव ने यह नारा तब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की मजबूती बताने और जताने के लिए इस्तेमाल किया था. 2024 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का चुनावी गठबंधन बेहद कामयाब रहा. समाजवादी पार्टी ने तो सबसे ज्यादा सीटें जीती ही, कांग्रेस ने भी अमेठी में फिर से जीत हासिल कर बाउंसबैक किया था - और बाद में अखिलेश यादव ने राहुल गांधी के साथ मिलकर अयोध्या में बीजेपी की हार को बढ़ चढ़कर प्रचारित भी किया. फैजाबाद लोकसभा सीट से सांसद अवधेश प्रसाद को अयोध्या में बीजेपी की हार के तौर पर पेश किया गया. 

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अगर इस स्लोगन को अखिलेश यादव का ताजा बयान मान लें, तो यह ऐसे वक्त आया है जब लखनऊ के सियासी गलियारों में एक चर्चा जोरों पर है कि कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं ने बीएसपी नेता मायावती से मुलाकात करने की कोशिश की है - जाहिर है, अखिलेश यादव ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को नए सिरे से संदेश देने का प्रयास किया है. 

सीट और जीत की बातें

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का दावा है कि समाजवादी पार्टी यूपी की सभी 403 सीटों पर मजबूत है, और जो भी साथ आएगा उसे पार्टी के संगठन का पूरा फायदा मिलेगा. निश्चित तौर पर अखिलेश यादव का आशय वोट ट्रांसफर से है. जिस बात से मायावती इनकार करती रही हैं. और, समाजवादी पार्टी का वोट बीएसपी को ट्रांसफर न होने का बहाना बनाकर 2019 में मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया था. 

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अखिलेश यादव ने अपनी तरफ से साफ किया है कि गठबंधन करके जो भी राजनीतिक दल साथ चुनाव लड़ेगा, उसे समाजवादी पार्टी के बूथ स्तर पर मजबूत संगठन का फायदा मिलेगा - और समझाते हैं कि 'बात सीट की नहीं, जीत की है.' स्लोगन का मतलब भी यही है. 

समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव के मुताबिक, आने वाले चुनावों के लिए समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर अपने कार्यकर्ताओं और संगठन को पूरी मुस्तैदी से तैनात कर चुकी है. 

पीडीए फैक्टर को मजबूती देने के लिए मुहिम चला रहे अखिलेश यादव का कहना है, PDA में देश की आबादी के वे 95 फीसदी लोग शामिल हैं जो आज के दौर में पीड़ित, दुखी या अपमानित महसूस कर रहे हैं. पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक को जोड़कर बनाए गए पीडीए को अखिलेश यादव समय समय पर अलग अलग तरीके से पेश करते रहे हैं. 

अखिलेश यादव ने पीडीए आंदोलन को वर्चस्ववाद और भेदभाव के खिलाफ नई आजादी का आंदोलन बताया है. अखिलेश यादव के अनुसार, इसका मकसद संविधान और आरक्षण की रक्षा करना और सामाजिक न्याय की मुहिम को आगे बढ़ाना है. अखिलेश यादव ने पीडीए को प्रेम, दया और अपनापन का संगम भी बताया है. 

अखिलेश यादव की बातों से लगता है कि 2027 में कामयाबी हासिल करने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन को आधार बनाया जा रहा है. अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संदेश भेजा है कि 2024 में मिले वोट से हर बूथ पर पांच वोट ज्यादा दिलाओ, और 2027 में बीजेपी को हटाकर यूपी में सपा सरकार लाओ.

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कांग्रेस को संदेश या चेतावनी

2024 के आम चुनाव के बाद यूपी में 9 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे. लेकिन, अखिलेश यादव ने लोकसभा की तरह उपचुनावों में सीटें शेयर नहीं की. आखिरकार कांग्रेस को सभी सीटों के लिए समाजवादी पार्टी को एकतरफा सपोर्ट करना पड़ा. सीटों के बंटवारे को लेकर कई बार तकरार भी देखने को मिली थी. कांग्रेस 5 सीटें चाहती थी, लेकिन समाजवादी पार्टी 2 से ज्यादा शेयर करने को तैयार नहीं थी. 

उपचुनावों से पहले अखिलेश यादव ने सोशल साइट X पर एक लंबी पोस्ट लिखी थी. अखिलेश यादव ने उसी पोस्ट में ‘बात सीट की नहीं जीत की है’ का जिक्र किया था - और लिखा था, ‘बात सीट की नहीं जीत की है’ इस रणनीति के तहत ‘इंडिया गठबंधन’ के संयुक्त प्रत्याशी सभी 9 सीटों पर समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न ‘साइकिल’ के निशान पर चुनाव लड़ेंगे. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी एक बड़ी जीत के लिए एकजुट होकर, कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़ी है.

उत्तर प्रदेश की मीरापुर, कुंदरकी, गाजियाबाद, खैर, करहल, सीसामऊ, फूलपुर, कटेहरी और मझवां विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में बीजेपी को 9 में से 6 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, जबकि 2 सीटों पर समाजवादी पार्टी और एक सीट पर राष्ट्रीय लोक दल का उम्मीदवार जीता था. 

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सीटों के बंटवारे की जगह जीत पर फोकस करने की सलाह वाले अखिलेश यादव के स्लोगन पर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद की प्रतिक्रिया है, मैं तो कहूंगा कि सीट नहीं तो जीत नहीं... जब सीट ही नहीं होगी तो जीत कहां से होगी? ये सबको सोचना चाहिए... खासकर बंगाल के रिजल्ट से ऐसे लोगों को सबक लेना चाहिए.

इमरान मसूद का कहना है कि अगर सही रणनीति के साथ बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़ा गया होता, तो इंडिया गठबंधन की ही जीत होती. इमरान मसूद ने अखिलेश यादव का नाम तो नहीं लिया, लेकिन सलाह यही दी है कि बंगाल वाली गलती यूपी में दोहराए जाने से बचना होगा. 

यूपी और बंगाल के समीकरण अलग अलग हैं, लेकिन कई बातें कॉमन भी हैं. पश्चिम बंगाल और यूपी दोनों जगह कांग्रेस नेतृत्व और स्टेट यूनिट अलग अलग व्यवहार करते हैं. राहुल गांधी जब चाहते हैं, तो ममता बनर्जी और अखिलेश यादव दोनों से बात करते हैं, नहीं तो मामला प्रदेश इकाई के हवाले हो जाता है. यूपी में लोकसभा का चुनाव राहुल गांधी और अखिलेश यादव साथ लड़े थे, लेकिन उपचुनावों का मामला वैसे ही स्टेट यूनिट के हवाले छोड़ दिया गया था, जैसे 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव में. यूपी के कई कांग्रेस नेता मानते हैं क‍ि गठबंधन पर सपा का हुक्‍म चलता है, और राहुल गांधी इस मामले में नरम पड़ जाते हैं. समाजवादी पार्टी को लेकर अजय राय के तीखे बयानों में इसकी साफ झलक देखने को मिलती है. 

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2017 में अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए बड़े ही आतुर दिखे थे, लेकिन बाद में गठबंधन तोड़ दिया था. तब चर्चा थी कि राहुल गांधी इग्नोर करने लगे थे. लेकिन, वही राहुल गांधी लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद स्पीकर के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार उतार देने पर नाराज ममता बनर्जी को फोन भी किया था, और तृणमूल कांग्रेस नेता मान भी गई थीं - इमरान मसूद की चेतावनी को सिर्फ अखिलेश यादव ही नहीं, राहुल गांधी को भी गंभीरता से लेने की जरूरत है. 

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