साहित्य आजतक 2019: सुरेंद्र मोहन पाठक ने अपने किरदारों पर की बात, हिंदी पर जताई चिंता

सुरेंद्र मोहन पाठक ने साहित्य आजतक 2019 के सत्र मेरे पसंदीदा किरदार में शिरकत की. उन्होंने इस दैरान अपनी कहानियों के किरदारों पर बातें कीं. साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि मौजूदा समय में हिंदी भाषा की क्या स्थिति है.

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साहित्य आजतक 2019- सुरेंद्र मोहन पाठक साहित्य आजतक 2019- सुरेंद्र मोहन पाठक

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 02 नवंबर 2019,
  • अपडेटेड 7:43 AM IST

सुरेंद्र मोहन पाठक का नाम हिंदी पाठकों के लिए नया नहीं है. सुरेंद्र ने क्राइम शैली में ना जाने कितने सारे नॉवल लिखे और आज भी ये नॉवल लोगों के बीच काफी पॉपुलर हैं. सुरेंद्र मोहन पाठक ने साहित्य आजतक 2019 के सत्र 'मेरे पसंदीदा किरदार' में शिरकत की. उन्होंने इस दैरान अपनी कहानियों के किरदारों पर बातें कीं. साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि मौजूदा समय में हिंदी भाषा की क्या स्थिति है.

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सुरेंद्र मोहन ने बताया कि नॉवल लिखने का शौक उन्हें बचपन से था. उन्हें शॉर्ट स्टोरी लिखना अच्छा लगता था. लिखते समय सबसे बड़ा सवाल था कि हीरो किसे बनाना है. उन्होंने सुनील को अपने हीरो के रूप में चुना. बता दें कि सुनील एक इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टर रहता है. सुरेंद्र ने बताया कि इसका इतना मजाक बनाया गया कि डेढ़ साल तक लिखने की हिम्मत नहीं हुई.




सुरेंद्र ने बताया कि- मैंने 1963 में अपने हीरो को खोजी पत्रकार बनाया था जबकि 80 के दशक में भारत में ये चलन शुरू हुआ. पत्रकारिता के क्षेत्र में इनवेस्टिगेटिंग रिपोर्टर बनना फख्र की बात होती है. सुरेंद्र के जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब उन पर मोनोटोनी को लेकर शिकायत करने लगे.


उनके शुरुआती 42 नॉवल एक जैसे ही थे. इसके बाद सुरेंद्र ने अपने किरदारों में बदलाव करने शुरू किए. जिसके बाद सुधीर किरदार आया और पिर विमल. इन दोनों किरदारों की भी खूब प्रशंसा हुई. सुरेंद्र के मुताबिक सबसे ज्यादा उन्हें जिस नॉवल से प्रशंसा मिली वो थी विमल. इस नॉवल के आने के बाद उनकी पॉपुलैरिटी दोगुनी हो गई.

हिंदी पर जताई चिंता-

सुरेंद्र मोहन पाठक ने बातचीत के दौरान कहा कि- हिंदी की सबसे ज्यादा अनदेखी हिंदुस्तान में ही है. विश्वभर में बोले जाने वाली भाषाओं में अंग्रेजी चौथे नंबर पर आती है. कहां गए हिंदी पढ़ने वाले, साल में 15 दिन हिंदी पखवाड़ा बनाया जाता है बस. हिंदी सिर्फ उत्तर भारतीय भाषा बनकर रह गई है. भारत की भाषा रह ही नहीं गई है हिंदी.

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