आज के दौर में लोग मोबाइल से टिकट बुक करते हैं, ऑनलाइन टिकट दिखाते हैं और आराम से ट्रेन में सफर कर लेते हैं. लेकिन अगर आपने पुराने रेलवे टिकट देखे हों, तो एक बात जरूर नोटिस की होगी. उन टिकटों के दोनों किनारों पर एक सीधी लाइन में छोटे-छोटे गोल छेद बने होते थे. बहुत से लोग इन्हें सिर्फ डिजाइन समझते हैं, लेकिन असल में इन छेदों का रेलवे की तकनीक में बेहद महत्वपूर्ण रोल हुआ करता था.
दरअसल, उस समय रेलवे टिकटों की प्रिंटिंग आज की तरह एडवांस प्रिंटर से नहीं होती थी. तब रेलवे में डॉट मैट्रिक्स प्रिंटिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता था. यह वही प्रिंटर थे, जो प्रिंट करते समय खट-खट की आवाज करते थे. इन प्रिंटरों में सामान्य कागज नहीं, बल्कि कंटीन्यूअस पेपर इस्तेमाल होता था. यह एक लंबी कागज की पट्टी होती थी, जो लगातार प्रिंटर के अंदर चलती रहती थी.
डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर से छपते थे टिकट
इसी कंटीन्यूअस पेपर के दोनों किनारों पर छोटे-छोटे गोल छेद बनाए जाते थे. तकनीकी भाषा में इन्हें स्प्रॉकेट होल कहा जाता है. प्रिंटर के अंदर दांतों वाले छोटे पहिए लगे होते थे. ये पहिए टिकट के किनारों पर बने इन छेदों में फंस जाते थे और कागज को बिल्कुल सीधी दिशा में आगे बढ़ाते थे. इसका सबसे बड़ा फायदा यह था कि टिकट पर छपने वाली जानकारी सही जगह पर प्रिंट होती थी. अगर ये छेद नहीं होते, तो कागज बार-बार फिसल सकता था और टिकट पर नाम, ट्रेन नंबर, तारीख या सीट की जानकारी टेढ़ी-मेढ़ी छप सकती थी. आसान शब्दों में कहें तो जैसे ट्रेन को सही रास्ते पर चलाने के लिए पटरी की जरूरत होती है, वैसे ही डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर को कागज सही दिशा में चलाने के लिए इन छेदों की जरूरत होती थी.
ट्रेन की पटरी जैसे थे ये छोटे छेद
इन छेदों की वजह से प्रिंटिंग की स्पीड भी तेज रहती थी और हजारों टिकटों को बिना किसी परेशानी के लगातार छापा जा सकता था. प्रिंटिंग पूरी होने के बाद टिकट के दोनों किनारों पर लगी छेद वाली पट्टियों को फाड़कर अलग कर दिया जाता था.यही कारण है कि पुराने रेलवे टिकटों के किनारे अक्सर थोड़े खुरदुरे दिखाई देते थे. दिलचस्प बात यह है कि इन छेदों का इस्तेमाल सिर्फ प्रिंटिंग के लिए ही नहीं होता था, बल्कि सुरक्षा के लिए भी किया जाता था. रेलवे द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला यह स्पेशल पेपर और उसका डिजाइन बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होता था. कई बार इन छेदों की खास बनावट और पैटर्न के जरिए टिकट की पहचान की जाती थी. इससे नकली टिकट बनाना मुश्किल हो जाता था और फर्जी टिकटों को पकड़ने में आसानी होती थी.
अब क्यों नहीं दिखते ऐसे टिकट?
समय के साथ रेलवे में टेक्निक बदल गई. अब डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर की जगह थर्मल प्रिंटर, ऑटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीन (ATVM) और ई-टिकट सिस्टम ने ले ली है. इसलिए अब कंटीन्यूअस पेपर और उसके किनारों पर बने इन छेदों की जरूरत नहीं पड़ती. हालांकि पुराने रेलवे टिकट आज भी रेलवे इतिहास और तकनीकी विकास की एक दिलचस्प याद माने जाते हैं. यानी अगली बार अगर आपको कोई पुराना रेलवे टिकट दिखे, तो समझ जाइए कि उसके किनारों पर बने छोटे-छोटे छेद सिर्फ डिजाइन नहीं थे, बल्कि रेलवे की पूरी प्रिंटिंग व्यवस्था की रीढ़ थे. छोटे दिखने वाले ये छेद उस दौर की बड़ी तकनीक का अहम हिस्सा थे, जिनकी मदद से करोड़ों यात्रियों के टिकट सही और सुरक्षित तरीके से छापे जाते थे.
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